नई दिल्ली: रायपुर नगर निगम ने विरोध प्रदर्शन या धरना-प्रदर्शन करने पर 500 रुपये का अनिवार्य शुल्क लगा दिया है.
रिपोर्ट के मुताबिक, विपक्ष और आलोचकों ने इसकी निंदा करते हुए इसे अलोकतांत्रिक और ‘असहमति पर टैक्स’ करार दिया है.
मालूम हो कि यह फैसला ऐसे समय में आया है जब शहर के मुख्य धरना स्थल, टूटा धरना स्थल पर रायपुर कलेक्टर डॉ. गौरव सिंह ने चल रहे रखरखाव कार्य का हवाला देते हुए दो महीने के लिए प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया है.
इससे नागरिकों के पास फिलहाल विरोध प्रदर्शन के लिए कोई स्वीकृत स्थान नहीं रह गया है, और प्रतिबंध हटने के बाद उन्हें अपनी असहमति व्यक्त करने के लिए भुगतान करना होगा.
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) नेता और महापौर मीनल चौबे ने इस नए शुल्क का बचाव करते हुए कहा कि यह राज्य सरकार के निर्देशों पर आधारित है.
उन्होंने कहा कि यह नीति विरोध स्थलों की ‘सफाई और रखरखाव’ के लिए आवश्यक है और अनुमति प्रक्रिया प्रशासन को किसी भी जुलूस के ‘मार्ग के बारे में पूरी जानकारी’ प्राप्त करने में भी मदद करती है.
वहीं, विपक्षी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा है कि यह नीति लोगों को सार्वजनिक मुद्दों पर अपनी आवाज़ उठाने से हतोत्साहित करने के लिए बनाई गई है.
आम बैठक में पारित प्रस्ताव के अनुसार, मंच या पंडाल लगाने के लिए 5 रुपये प्रति वर्ग फुट का अलग से शुल्क भी लिया जाएगा.
अधिकारियों ने यह भी संकेत दिया है कि विरोध प्रदर्शन शुल्क जल्द ही दोगुना करके 1,000 रुपये किया जा सकता है. यह प्रस्ताव कथित तौर पर उसी नगरपालिका बैठक में सर्वसम्मति से पारित किया गया था.
