लेह परिषद चुनावों में देरी से नाख़ुश नागरिक समाज, कहा- भाजपा को फ़ायदा पहुंचाना प्रशासन का मक़सद

बीते महीने लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद-लेह (एलएएचडीसी-एल) के विघटन के बाद अस्थिर लेह क्षेत्र पर नौकरशाही का नियंत्रण है और लद्दाख में राजनीतिक अनिश्चितता और भी गहराती जा रही है. इस बीच लेह एपेक्स बॉडी ने स्थानीय प्रशासन द्वारा एलएएचडीसी-एल चुनाव को अनिश्चितकाल के लिए स्थगित करने के निर्णय की आलोचना की है.

फाइल फोटो: लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लकरूक अन्य सदस्यों के साथ. (फोटो: पीटीआई)

श्रीनगर: बीते महीने लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद-लेह (एलएएचडीसी-एल) के विघटन के बाद अस्थिर लेह क्षेत्र पर नौकरशाही के नियंत्रण के साथ ही लद्दाख में राजनीतिक अनिश्चितता और भी गहराती जा रही है.

लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी), जो लद्दाख में करगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के साथ मिलकर संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए आंदोलन का नेतृत्व कर रही है, ने स्थानीय प्रशासन द्वारा एलएएचडीसी-एल चुनाव को अनिश्चित काल के लिए स्थगित करने के निर्णय की आलोचना की है.

द वायर से बात करते हुए एलएबी के सह-अध्यक्ष चेरिंग दोरजे लकरूक ने मांग की कि प्रशासन बिना किसी देरी के चुनाव का कार्यक्रम घोषित करे.

उन्होंने तत्काल चुनाव की मांग करते हुए कहा, ‘एलएएचडीसी लद्दाख में लोकतंत्र का एकमात्र रास्ता था, जहां लोग अपनी शिकायतें लेकर जा सकते थे. अब यहां लोकतंत्र का नामोनिशान तक नहीं है.’

केडीए ने भी जल्द लेह परिषद के चुनाव कराने की मांग की

केडीए नेता सज्जाद हुसैन ने भी मांग की कि प्रशासन जल्द से जल्द लेह परिषद के चुनाव कराए.

उल्लेखनीय है कि केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख के कानून एवं न्याय विभाग द्वारा 1 नवंबर को जारी एक आदेश में परिषद की शक्तियां लेह के उपायुक्त रोमिल सिंह डोंक को सौंप दी गईं, जिससे ज़िले में एकमात्र लोकसभा सांसद हनीफ़ा जान को छोड़कर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि नहीं रहा.

एलएएचडीसी-एल का कार्यकाल 31 अक्टूबर को समाप्त हो गया, जबकि करगिल ज़िले में 2023 में गठित दूसरे पर्वतीय परिषद का कार्यकाल 2028 में समाप्त होने वाला है.

मालूम हो कि ये अर्ध-स्वायत्त परिषदें दुनिया के सबसे कम आबादी वाले क्षेत्रों में से एक, जो हाल ही में राजनीतिक तनावों से ग्रस्त रहा है, में शासन और नागरिक मुद्दों से संबंधित दिन-प्रतिदिन की शिकायतों का समाधान करती हैं.

मौजूदा समय-सारिणी के अनुसार, लेह प्रशासन को सितंबर में पर्वतीय परिषद चुनाव के कार्यक्रम की अधिसूचना जारी करनी थी और 1 नवंबर तक प्रक्रिया पूरी करनी थी.

हालांकि, ‘प्रतिनिधित्व संबंधी संशोधनों और प्रशासनिक बदलावों’ का हवाला देते हुए विधि विभाग के आदेश में कहा गया है कि परिषद में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने और लद्दाख में पांच नए ज़िलों के निर्माण जैसे मुद्दों के कारण चुनाव में देरी हुई है.

ज्ञात हो कि पांच नए ज़िलों का निर्माण और दोनों पहाड़ी परिषदों के लिए नई आरक्षण नीति, पिछले साल भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली (भाजपा के नेतृत्व वाली) केंद्र सरकार द्वारा एलएबी-केडीए गठबंधन की चार मांगों के जवाब में की गई कई घोषणाओं में शामिल थीं.

हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह द्वारा एक साल से भी ज़्यादा समय पहले की गई घोषणा के बाद से लद्दाख में ज़मीनी स्तर पर कोई नई प्रशासनिक इकाइयां स्थापित नहीं की गई हैं.

शाह ने पिछले साल 26 अगस्त को घोषणा की थी कि लद्दाख में द्रास, ज़ांस्कर, नुब्रा, चांगथांग और शाम नामक पांच नए ज़िले बनाए जाएंगे.

इस संबंध में लकरूक ने आरोप लगाया कि चुनाव में देरी का फैसला भाजपा की मदद करने के लिए किया गया है और नए ज़िलों के गठन और क़ानून विभाग द्वारा अपने आदेश में उठाए गए अन्य मुद्दे ‘सिर्फ बहाने’ हैं.

लेह बौद्ध संघ के अध्यक्ष लकरूक ने आगे सवाल उठाया कि अगर ये वजह नहीं है, तो लेह के लोगों को अपने प्रतिनिधि चुनने के उनके लोकतांत्रिक अधिकारों से वंचित करने का क्या मतलब है?

भाजपा का अपनी राजनीतिक ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष 

गौरतलब है कि भाजपा 2020 में एलएएचडीसी-एल चुनावों के बाद सत्ता में आई थी, जब 30 सदस्यीय परिषद चुनावों में उसके 26 में से 15 पार्षद जीते थे. बाकी चार पार्षद लद्दाख के उपराज्यपाल द्वारा नामित किए जाते हैं.

हालांकि, लद्दाख में नागरिक समाज के नेताओं और जाने-माने लोगों द्वारा 24 सितंबर की हिंसा के लिए भाजपा को व्यापक रूप से दोषी ठहराया गया है, जिसमें सुरक्षा बलों की गोलीबारी में चार नागरिक प्रदर्शनकारियों की मौत हो गई थी, जबकि दर्जनों, जिनमें ज्यादातर नाबालिग थे, घायल हुए थे.

बताया जा रहा है कि पार्टी को इस क्षेत्र में अपनी राजनीतिक ज़मीन बचाने के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है, क्योंकि 2020 के चुनावों में भाजपा के समर्थन से जीते कई पार्षद या तो छिप गए हैं या घातक विरोध प्रदर्शनों के बाद पार्टी से खुद को अलग कर लिया है.

हिंसा के एक महीने से ज़्यादा समय बीत जाने के बावजूद लेह के चोगलामसर रोड पर स्थित पार्टी का लद्दाख इकाई मुख्यालय, जिसे प्रदर्शनकारियों ने आग लगा दी थी, सुरक्षा बलों की भारी तैनाती के बीच बंद है.

खबरों के मुताबिक, केंद्रीय गृह मंत्रालय और एलएबी-केडीए गठबंधन के बीच चल रही बातचीत के बीच चुनाव जल्द होने की संभावना नहीं है.

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना ​​है कि चुनाव में देरी से भाजपा के लिए राहत की एक खिड़की खुलने की संभावना है, जो लद्दाख में भारी जनाक्रोश का सामना कर रही है.

विश्लेषकों और नागरिक समाज के नेताओं ने आरोप लगाया कि यह फैसला भाजपा को लाभ पहुंचाने और 24 सितंबर की हिंसा के बाद उसे अपनी ‘खोई हुई ज़मीन’ वापस पाने का मौका देने के लिए लिया गया है.

लेह स्थित एक राजनीतिक टिप्पणीकार ने नाम न बताने की शर्त पर कहा, ‘पार्टी आंतरिक सत्ता संघर्षों के कारण पूरी तरह से अव्यवस्थित है. इससे (चुनाव में देरी से) पार्टी नेतृत्व को चुनाव से पहले अपनी स्थिति दुरुस्त करने में मदद मिलेगी.’

वहीं, पर्यावरणविदों और वन्यजीव विशेषज्ञों को डर है कि नए ज़िले लद्दाख के काराकोरम और चांगथांग वन्यजीव अभयारण्यों में अतिक्रमण करेंगे, जो वन्यजीवों की कुछ सबसे विदेशी और कुछ लुप्तप्राय प्रजातियों का घर हैं और संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्र में सैन्य उपस्थिति का विस्तार करेंगे.

गौरतलब है कि लद्दाख को 2019 में जम्मू-कश्मीर से अलग कर दिया गया था और बिना विधानसभा वाले केंद्र शासित प्रदेश में बदल दिया गया था.

हालांकि, पिछले कुछ वर्षों में भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा लद्दाख की सबसे पुरानी मांगों में से एक को पूरा करने पर शुरुआती उत्साह संवैधानिक सुरक्षा उपायों और लोकतंत्र की बहाली के लिए एक व्यापक आंदोलन में बदल गया है.

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