स्याह और अभेद धुंध: सुधा भारद्वाज का बंदी जीवन

सुधा भारद्वाज अपनी जेल डायरी, ‘फाँसी यार्ड से’, में बतलाती हैं कि उस चारदीवारी के पीछे किस तरह का सामाजिक भेदभाव होता है, यंत्रणा की कितनी परतें मौजूद हैं, कैसे एक यंत्रणा दूसरी को गाढ़ा कर देती है. किताब का चयनित अंश.

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सुधा भारद्वाज अपनी जेल डायरी में उस जीवन में मौजूद मानवीय उष्‍णता के मामूली से मामूली अहसास को दर्ज करना भी नहीं भूलतीं. (फोटो साभार: releasesudhabharadwaj.net/जगरनॉट/ इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

वर्तमान भारतीय जेलों के भीतर जीवन कैसा है, इसके विवरण हमारे सामाजिक दायरे में बहुत कम हैं. सुधा भारद्वाज अपनी जेल डायरी – ‘फाँसी यार्ड से’ – में जेल के जीवन को बहुत संवेदनशीलता और सहृदयता के साथ दर्ज करती हैं. वे बताती हैं कि वहां किस तरह का सामाजिक स्तरीकरण मौजूद है, यंत्रणा की कितनी परतें मौजूद हैं, कैसे एक यंत्रणा दूसरी को गाढ़ा कर देती है.

वे उस जीवन में उपस्थित मानवीय उष्‍णता के मामूली अहसास को दर्ज करना भी नहीं भूलतीं – चाहे फिर वह कपड़े रखने के लिए साथी कैदी द्वारा अपना थैला दिया जाना ही क्‍यों न हो. यही दृष्टि इस डायरी को महत्‍वपूर्ण और कलात्मक बना देती है.

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अक्टूबर 2018 को, फ़रीदाबाद में मेरे घर पर मेरी दो महीने की नज़रबंदी का अंत हुआ. मुझे पुणे ले जाया गया है और 6 नवंबर 2018 तक दस दिनों के लिए पुलिस हिरासत में भेज दिया गया.

पुणे शहर के फरासखाना पुलिस स्टेशन से सटा फरासखाना लॉक-अप गंदा है. छत पर कालिख से भरे मकड़ी के जाले लटके हुए हैं, दीवारें पान और तंबाकू के दागों से रंगी हुई हैं, कंबल खटमलों से भरे हुए हैं और शौचालयों में गन्दगी साफ करने के लिए कोई बाल्टी तक नहीं है. मैं मन ही मन सोचती हूं, हे भगवान, मैं यहां कैसे रह पाऊंगी. हर दिन नई महिलाएं आती हैं और चली जाती हैं. एक भला सिपाही मुझे बाल्टी और मग दिलाने में मदद करता है. दिन में मुझे पूछताछ के लिए सहायक पुलिस आयुक्त के कार्यालय में ले जाया जाता है, मगर वहां मुश्किल ही कोई पूछताछ होती है और जैसे-तैसे दस दिन बीत जाते हैं.

जिस शाम मैं यरवदा महिला जेल में प्रवेश करती हूं, वहां अंधेरा और ठंड है. दुर्जेय किले जैसी ऊंची दीवारें हैं. बाहरी दीवारों और बैरक की ओर जाने वाले विशाल लोहे के गेट के बीच लॉबी जैसी जगह में, जिसे मैंने बाद में गेटकहना सीखा, सिपाहियों ने वहां मेरे झोले से सामान को निकाल कर पत्थर के फर्श पर यूं ही डाल दिया और मेरी ज्यादातर चीजों को बाहर फेंक दिया– कोई टी-शर्ट और ट्रैक पैंट पहनने की इजाजत नहीं है, सिर्फ सलवार-कुर्ता या साड़ी पहनने होंगे, बालों के लिए कोई क्लचर नहीं.

एक मोटी भद्दी औरत की चौकस निगरानी में मुझे बगल वाले गंदे कमरे में कपड़े उतारने को कहा जाता है, ‘हां सब कुछ उतार दो’, ‘बैठो’, ‘अपने बाल खोलो’. मैंने शरीर से ही नहीं, अपने आप को हर तरह से नंगा महसूस किया. मैंने फिर कपड़े पहने और अब मुझे वह सामान सौंपा गया, जो अबसे मेरी बुनियादी सांसारिक चीजें होने वाली हैं: बिस्‍तर – एक संकरी पट्टी, पतली दरी, एक बुना हुआ मोटा कम्बल जो घोंघरी कहलाता है, एक चादर और मेरे बर्तन– एल्‍यूमिनियम की प्‍लेट, कटोरी और मग.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मेरी पहली (नींद रहित) रात अस्पताल बैरक में बीती, जहां मुझे बड़ी अनिच्छा से उस औरत जगह दी गई, जिसे संभवतः कोई पसंद नहीं करता. उसके पास भी मेरे ही जितनी चौड़ी पट्टी है. मुझे यह जानकर बड़ी राहत मिली कि यहां शौचालय बहुत साफ-सुथरे हैं.

अगली सुबह मैंने देखा कि सुबह 5.30 बजे सुबह की पाली में (हां, मैं एकदम नई शब्दावली सीख रही हूं) औरतें कतारों में ठंडे पत्थर फर्श पर पालथी मार कर बैठी हैं, जहां कैदियों की गिनती होती है, झिझकते हुए मैं उनमें शामिल हो जाती हूं. पीली साड़ी वाली एक वार्डर बातें करते, खिलखिलाते हुए आने वाले सुबह की पारी वाले सिपाहियों को मेरी तरफ इशारा कर बताती है, यह माओवादी,’ (मैं उसे मैडमजेल अधिकारी समझती हूं. बाद में मुझे पता चलता है कि वह स्‍वयं भी सज़ायाफ्ता कैदी है.) सुबह 7 बजे बैरक का ताला खोला जाता है और सभी लोग बाहर भागते हैं.

जब मैं बैरक के पीछे एक तनी पर कपड़े सुखाने लगी तो एक कैदी ने मुझे डांटा, ‘अरे, तुम अपने कपड़े वहां नहीं सुखा सकती’. पता चला कि तनी के अलग-अलग हिस्से, अलग-अलग कैदियों के लिए आरक्षित किए हुए हैं. जेल के जीवन की असंख्‍य बंदिशे, पराधीन होने का एक अलग ही आस्‍वाद देती हैं.

कुछ ही देर में मैं नए आए कैदियों के बीच अपना विचारधीन (यूटी- अंडरट्रायल) वाला पहचान पत्र सीने से लगाए गेट के पास कतार में खड़ी हो जाती हूं. (इस जेल पहचान पत्र में तस्‍वीर नहीं लगी होती, बस अपराध संख्‍या व कानूनी धाराओं का उल्‍लेख होता है.) जेल अधीक्षक व उनके अधीनस्‍थ हमारा निरीक्षण करते हुए कतार में आगे बढ़ते चले जाते हैं. वे किसी-किसी को अच्छा बर्ताव करने के लिए उपदेशात्‍मक भाषण झाड़ते हैं. मुझे ध्‍यान से देखते हैं और हम्‍म’, बोलते हुए आगे बढ़ जाते हैं.

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जिस दिन धूप निकल आती है उस दिन हालात इतने बुरे नहीं लगते. खपरैल की छतों वाली एक मंजिला बैरक, पेड़ और फूलों की क्यारियां, खेलते बच्चे, हरी साड़ियों में सुबह के काम निपटाती महिलाएं … मैं मन ही मन सोचती हूं, यह कोई आश्रम हो सकता है. मुझे बाद में पता चला कि हरे रंग की साड़ियां हत्या के मामलों में विचाराधीन या सज़ायाफ्ता कैदियों द्वारा पहनी जाती हैं.

मैं एक कैदी के साथ बातचीत शुरू करने की कोशिश करती हूं. किसी से उसके केस के बारे में मत पूछो. यहां ऐसा करना ठीक नहीं है‘, एक युवा महिला ने मुझे अपने संरक्षण में लेते हुए यह सलाह दी. एक बुजुर्ग कैदी मुझे कपड़े का थैला देती है. उसने कहा, ‘इसमें अपने कपड़े रख लो’. यहां हर किसी की ड्यूटी लगती है, जैसे सिर पर रखकर भत्ता (खाना) लाना और बैरक में झाड़ू-पोंछा लगाना. तुम्‍हारे लिए यह काम मैं कर दूंगी. इसमें अनकही बात यह है कि यह मुफ़्त नहीं है– किसी के श्रम का भुगतान कैंटीन से उसके लिए सामान खरीदकर किया जाता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

अनुभवी लोगों ने मुझे मध्यमवर्गीय और भोली-भाली करार दे दिया है.

मुलाकात कक्ष से मेरा नाम पुकारा जाता है. मेरी बेटी मायशा आ गई है. टेलीफोन पर मुझसे बात करते हुए वह रोने लगती है. हम दोनों एक-दूसरे को महसूस करने की कोशिश करते हुए हमारे बीच लगे शीशे पर हाथ फिराते हैं. उसके साथ आए यूनियन के मेरे साथी मुझसे नहीं मिल सकते. यूएपीए के तहत जेल में बंद कैदियों पर अन्य की तुलना में अधिक पाबंदियां होती हैं. हमें केवल रक्त संबंधियोंऔर वकीलों से मिलने की अनुमति है.

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मुझे अस्पताल वाले बैरक में रहने की आदत पड़ने लगी है, कुछ दोस्त बनाने लगी हूं और भत्ता खाना सीख रही हूं. मुझे उस गुप्‍त जगह का भी पता चल गया है जहां वार्डर बैरक में आने वाले मराठी अखबार को रखती हैं – इससे मुझे पढ़ने के लिए कुछ मिल जाता है, और मैं इसे समझने की कोशिश करती हूं. अचानक एक शाम जब हमें अंदर बंद करने का समय होने को था उससे ठीक पहले लगभग 4.30 बजे एक सिपाही ने रुखाई के साथ मुझे अपने झोले सहित बाहर आने का आदेश सुनाया. मुझे फांसी यार्ड तक ले जाया गया. सिपाही एकल कैदी वाली कोठरी का दरवाज़ा खोलती है. मैं अंदर प्रवेश करती हूं और धड़ाक से – सलाखों वाला गेट बंद  हो जाता है और ताला जड़ दिया जाता है.

घर छोड़ने के बाद पहली बार, इस अनुचित व्‍यवहार पर मेरी आंखों में आंसू छलक आए. मैं अपनी पट्टी बिछाए बिना पत्थर के ठंडे फर्श पर लेट जाती हूं. तभी मुझे दीवार के पार से एक आवाज़ सुनाई देती है, ‘सुधा, क्या तुम ठीक हो?‘ यह प्रोफेसर शोमा सेन की आवाज़ है. हम एक-दूसरे को जानते हैं मगर हमारे बीच घनिष्ठता नहीं रही. वे ड्यूटी पर तैनात गार्ड के हाथों मेरे लिए अपने डिनर में से कुछ हिस्सा भेजती हैं.

मुझे अपना खाना लाने का वक्‍त नहीं मिला था. आने वाले दिनों में यही दोस्ती हमारा मुख्य सहारा बनने वाली है.’हां, मैं ठीक हूं,‘ मैं चिल्‍लाकर जवाब देती हूं.

नियम, नियम, नियम

जेल में व्यक्ति सबसे पहली चीज़ नियमों का पालन करना सीखता है. ऐसे नियम जो लिखित या सुसंगत नहीं होते, उनका कानूनी होना भी आवश्यक नहीं हैं, और कभी-कभी वे तर्कसंगत भी नहीं होते. इसका एहसास मुझे शुरुआत में ही हो गया जब मैंने एक महिला सिपाही को हवालात में एक कैदी पर चिल्लाते हुए देखा, ‘यहां कोई क्‍लचर नहीं लगाना है’. चीज़ों की यह सूची लंबी है जैसे – नेल कटर, कैंची, सुई, चम्मच, सेफ्टी पिन, प्लास्टिक की खाली थैलियां, बालों का क्लिप, किसी प्रकार का खमीर वाला भोजन (इस डर से कि यह विषाक्त हो सकता है), डिस्‍पेंसरी से दवाओं का नहीं दिया जाना आदि…

ऐसी किसी भी चीज़ का जेल में इस्तेमाल करने की इजाज़त नहीं है जिसका इस्तेमाल खुद को या दूसरों को नुकसान पहुंचाने के लिए हथियार के रूप में किया जा सकता है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

मैंने सुना है कि पुरुष जेलों में, जहां भ्रष्टाचार व्याप्त है वहां, ताकतवर या अमीर कैदियों को ड्रग्स, मोबाइल फोन और विशेष भोजन सहित सभी प्रकार की चीजें उपलब्‍ध हो जाती हैं, लेकिन ईमानदारी से कहूं तो मैंने महिला जेलों में मामूली पक्षपातपूर्ण व्यवहार के अलावा इस तरह का कोई लाभ उठाते किसी को नहीं देखा.

कब, कौन-से नियम यहां किसके लिए लागू किए जाएंगे, इसकी एक जटिल दर्जाबंदी  है. शीर्ष पर वरिष्ठ मैडम, यानी जेलर और उनकी सहायक हैं; उनके बाद हवलदार और सिपाही यानी बाई होती हैं; उनके नीचे वार्डर यानी ताई होती हैं – ऐसी अभियुक्त जिन्‍हें 1,500 रुपये के मासिक वेतन पर सुपरवाइज़र की भूमिका दी गई है और जिन्हें पीली साड़ियों के कारण पहचान लिया जाता है. इसके बाद वे कैदी आती हैं जो जेल में दिहाड़ी मजदूरी पर काम करती हैं और कभी-कभी मुफ्त में भी मददकरती हैं. ताइयों और बाइयों से मिलने वाले छोटे-मोटे फ़ायदों के लिए वे अपनी साथी कैदियों पर नज़र रखती हैं. इस तरह परत दर परत निगरानी कैदियों के बीच फूट डालती है और प्रत्येक कैदी दूसरी कैदी पर संदेह करने लगती हैं.

और कोई एक छोटा-सा कंकर भी इस शांत नज़र आते तालाब में बड़ी हलचल पैदा कर सकता है. अ ने ब से बात क्यों की? स ने कैंटीन से कौन सा सामान द को दिया? य ने र के कपड़े पहने हैं!! कुछ समय के लिए पूरी जेल में तनाव का माहौल बन जाता है, और फिर, जैसे-जैसे दिन बीतते हैं तनाव हल्का होने लगता है. लोग आपस में घुलने-मिलने, हंसीमज़ाक करने और चालाकी से नियमों का उल्लंघन करने की मानवीय आदतों में सहजता से वापस लौट आते हैं.

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यरवदा में कुछ हफ्तों के बाद मुझे एहसास हुआ कि इस व्यवस्था को जो बात सबसे ज़्यादा मनमानीपूर्ण बनाती है वह है मैडम, गार्ड या वार्डर के बदलने के साथ नियमों का बदल जाना…. ‘गेट पर अपना दुपट्टा पहनकर जाओ.’ ‘अपनी चप्पल वहीं रखो.’   ‘खर्राटे मत लो’ (मैंने अपने अनुभव से पाया कि इसका पालन करना बहुत कठिन है). ‘जब तक वार्डर ताई न पढ़ लें, तब तक आप बैरक के लिए आने वाला अखबार नहीं पढ़ सकतीं.’ ‘अपने बैरक के बगीचे को पार मत करो.’ ‘वहां कौन गपशप कर रहा है?‘ ‘ओह, तो ये सीढ़ियां (मंच तक) आप औरतों के धूप सेकने लिए बनाई गई हैं, है ना? वहां से तुरंत दफ़ा हो जाओ.’ ‘उससे बात मत करो.’ ‘अपने कपड़े वहां मत सुखाओ.’

लेकिन कभी-कभी जब महिलाएं बैरक के बाहर इकट्ठा होकर बड़बड़ाती हैं, जोर-जोर से बहस करती और हंसती हैं, और लॉक-अप का समय होने के बाद भी बैरक के अंदर जाने में देर लगा रही होती हैं, तो उन्‍हें अंदर  भेजने की कोशिश कर रही कर्मचारियों की आवाज़ में बेचैनी, घबराहट और चिंता महसूस की जा सकती है. उनके निर्देश तेज़ और बेचैनी भरे हो उठते हैं – ‘अरे! तुम! चुपचाप अंदर जाओ.‘ ‘लाइन में खड़ी रहो.‘ ‘चुप रहो शांत रहो.अंततः, नियमों की ज़रूरत भय से पैदा होती है – एक अनजानी सामूहिकता की संभावित शक्ति का भय.

झगड़े यहां जीने का एक तरीका हैं

 जैसा कि शोमा दी कहती हैं, ‘झगड़े यहां जीने का एक तरीका हैं. और उम्मीद भी क्या की जा सकती है?

एक बैरक में पचास या साठ महिलाओं को बंद कर दिया गया हो, जिनमें बहुत सारी सख्त मिज़ाज हों, कई तीखी जुबान वाली और कुंठित हों और कुछ रोती और उदास रहती हों. सभी पत्थर के फर्श पर पास-पास बिछी पट्टियों पर जिनकी नींद में एक-दूसरे के खर्राटों, बच्चों, बुरे सपनों और शौचालय के लिए आने-जाने से के कारण खलल पड़ता रहता हो. जो एक-दूसरी पर चप्पल, बिस्कुट, ‘अच्‍छी वाली हरी साड़ियां, ‘अच्‍छे वालेबर्तन चुराने का आरोप लगाती रहती हों. जो इस बात पर झगड़ती रहती हों कि झाड़ू या पोंछा लगाने, भत्ता लाने या कचरा खाली करने की आज किसकी बारी है.

हर कोई क्षेत्र, भाषा, समुदाय या अपने मामले के प्रकार (जैसे एक समूह एनडीपीएस का है, जिन पर नारकोटिक ड्रग्स और साइकोट्रोपिक पदार्थ अधिनियम के तहत आरोप लगाया गया है) के आधार पर गुटबाजी करने में लगी रहती हैं, ताकि इकट्ठा होकर भुनभुना सकें और दूसरों को गाली दे सकें. इसलिए, नियमित झगड़े होना लाजमी है. आम तौर पर, इनमें चिल्लाना और गाली देना दोनों होता है, और लड़ाकों को शांत करने के लिए तुरंत सिपाही हस्तक्षेप करती हैं, फिर वे पोस्टमार्टम और अगले युद्ध की योजना बनाने के लिए अपने-अपने कैंपों में लौट जाती हैं.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

लेकिन एक बार आधी रात को विचाराधीन कैदियों वाले परिसर में बैरक पर ताला लगने के बाद हाथापाई हो गई और खूब शोर-शराबा और चीख-पुकार मची, जो हमें भी सुनाई देती है. हम अपनी कोठरियों की सलाखों के पास खड़े सिपाहियों को भागादौड़ी करते और हरकत में आते देखते हैं. वरिष्ठ जेलर मैडम और जेल के डॉक्टर को फोन लगाए जाते हैं. झगड़ने की अगुआई करने वलियों को घसीटकर गेट के पास कार्यालय तक लाते हैं तब भी वे पूरे समय बहस करती रहती हैं.

संयोग से किसी को गंभीर चोट नहीं आई और डिस्पेंसरी में उनकी जांच करने के बाद डॉक्टर चले जाते हैं. संबंधित बैरक के लोगों को सामूहिक डांट पड़ती है और उसकी निगरानी करने वाली सिपाहियों को अतिरिक्त सतर्कता बरतने के लिए कहा जाता है. जेल में शांति छा जाती है.

लेकिन अब इससे आगे की कहानी:

अगले दिन, शाम 5 बजे ठीक ताला लगने से पहले करीब 50 महिलाओं की बैरक नंबर 4 और बैरक नंबर 2 के बीच अदला-बदली की जाती है. यह समय-समय पर दी जाने वाली तयशुदा सजा है. महिलाएं अपना बिछाने का बिस्तर, एल्युमीनियम के बर्तन, पानी की बोतलें, सभी आकार और प्रकार के कपड़ों के बंडल और अनिच्छुक बच्चों को अपने साथ खींचते हुए दोनों दिशाओं में दो परिसरों के बीच दो टेढ़ी-मेढ़ी पंक्तियों में आगे बढ़ती हैं.

घोषणा, हमेशा की तरह, अचानक होती है. कैदी केवल मन ही मन कोस सकते हैं. आधे घंटे के अंदर ही यह अदला-बदली समाप्त हो जाती है. कोई सवाल-जवाब नहीं. यह जेल है. नई बैरक, नए समायोजन, नए पड़ोसी, नई शिकायतें, नए झगड़े … आखिर, कल एक नया दिन होगा‘ (स्कारलेट ओहारा से क्षमायाचना के साथ).

(मूल रूप से अंग्रेज़ी में प्रकाशित इस पुस्तक का हिंदी में अनुवाद देवयानी भारद्वाज व प्रमोद पाठक द्वारा किया गया है.)

(साभार: जिल्द बुक्स)