जहानाबाद: बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए को भीषण बहुमत मिला है. गठबंधन ने 202 सीटें जीत ली हैं. वहीं राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने 2010 के अपवाद को छोड़कर इतिहास का अपना सबसे खराब प्रदर्शन किया है. 143 सीटों पर चुनाव लड़ते हुए पार्टी ने केवल 25 सीट पर जीत दर्ज की है. ऐसे में सवाल के घेरे में पार्टी नेता और महागठबंधन की ओर से मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार तेजस्वी यादव हैं.

साल 2020 में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था और 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. तब माना जा रहा था कि तेजस्वी अपने पिता लालू यादव की तरह बिहार की राजनीति के दिग्गज नेता के तौर पर उभरे हैं. यादव जाति के अलावा अन्य जातियां भी उन्हें अपना नेता के रूप में देखने लगी थी. 2020 के चुनाव से कुछ महीने पहले तेजस्वी ने अपने पिता लालू प्रसाद यादव या मां राबड़ी देवी के नेतृत्व में राजद के 15 साल के शासन काल के दौरान ‘हुई गलतियों’ के लिए सार्वजनिक माफ़ी भी मांगी थी.
तेजस्वी यादव ने कहा था, ‘जब मेरी पार्टी (राजद) सत्ता में थी, तब मैं बहुत छोटा था और सरकार का हिस्सा नहीं था, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि लालू प्रसाद यादव ने सामाजिक न्याय नहीं किया.. वह एक बिल्कुल अलग दौर था. फिर भी, अगर हमारे 15 साल के शासनकाल में हमसे कोई गलती हुई हो, तो मैं उसके लिए माफी मांगता हूं.’
लोगों ने कुछ हद तक उनकी माफ़ी स्वीकारी भी की थी, जिसका नतीजा चुनाव के परिणाम में भी देखने को मिला था.
लेकिन इस बार तेजस्वी अपनी पार्टी के ऊपर लगे ‘जंगलराज’ के बोझ से खुद को अलग नहीं कर सके. नीतीश कुमार 20 साल से मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जनता अभी भी राजद के शासनकाल का ही विरोध करती दिख रही थी. चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सहित एनडीए के तमाम स्टार प्रचारक 15 साल के ‘लालू-राबड़ी शासनकाल का ख़ौफ़’ जनता के बीच उभारने में सफल रहे.
समय बदलने के साथ क्या तेजस्वी बदले?
2020 के चुनावों में तेजस्वी के अच्छे प्रदर्शन पर द वायर के पॉलिटिकल एडिटर अजॉय आशीर्वाद कहते हैं, ‘साल 2020 का चुनाव पूरी तरह अलग परिस्थितियों में लड़ा गया था. कोरोना काल में प्रवासी मजदूरों का मुद्दा बेहद अहम था. दूसरे राज्यों में काम कर रहे लोगों की नौकरियां छिन रही थीं और इसे लेकर जनता के बीच नीतीश सरकार के प्रति गुस्सा बढ़ रहा था. इसका असर चुनाव में साफ़ दिखा और विपक्षी दलों को इसका लाभ मिला. उसी समय तेजस्वी एक नए नेतृत्व के रूप में उभर रहे थे.’
‘लेकिन पांच साल बाद भी तेजस्वी की छवि में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया. तब भी उनकी छवि एक उभरते हुए नए नेता की थी और आज भी वही स्थिति बनी हुई है.’
तेजस्वी की दूसरी समस्या यह रही कि वे खुद को सभी तबकों और वर्गों के नेता के रूप में स्थापित कर पाए. उन्होंने कहा जरूर कि उनकी पार्टी सिर्फ़ एम-वाई (मुस्लिम–यादव) की पार्टी नहीं है, लेकिन लोगों को इस दावे पर भरोसा नहीं हुआ, क्योंकि इसे साबित करने के लिए उन्होंने कोई ठोस कदम नहीं उठाया.
राजद ने इस चुनाव में 143 सीटों पर उम्मीदवार उतारे, जिनमें से 53 सीटों पर यादव और 18 सीटों पर मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया गया. अगर तेजस्वी वास्तव में सभी तबकों के नेता बनने का दावा कर रहे थे, तो उन्हें समाज के अन्य पिछड़ा वर्गों के विभिन्न समुदायों को भी उचित प्रतिनिधित्व देना चाहिए था.
गोरखपुर न्यूज़लाइन वेबसाइट के संपादक और वरिष्ठ पत्रकार मनोज सिंह कहते हैं, ‘जो 53 सीटें यादव उम्मीदवारों को दी गईं, अगर उनमें से कुछ सीटें अति-पिछड़ा वर्ग के लोगों को दी जातीं, तो यह संदेश जाता कि तेजस्वी सभी समुदायों के नेता हैं. लेकिन तेजस्वी शायद इस दबाव में थे कि यदि उन्होंने यादवों को पर्याप्त टिकट नहीं दिया, तो उनका वोट भाजपा की ओर खिसक सकता है.’
क्यों विफल हुए तेजस्वी
मनोज सिंह कहते हैं, ‘तेजस्वी यादव का प्रचार प्रबंधन इस बार बेहद कमजोर रहा. चुनाव की घोषणा हो जाने के बाद भी वे लंबे समय तक शांत रहे, और खुद को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित किए जाने के बाद ही उन्होंने रैलियां शुरू कीं. चुनाव प्रचार के दौरान जब बारिश हुई, उस दौरान वह प्रचार को नहीं निकले. उनसे कई साल बड़े नीतीश कुमार ने उस दौरान रोड शो किया. लेकिन तेजस्वी हेलीकॉप्टर उड़ने का इंतज़ार करते रहे. फिर चुनाव प्रचार के आख़िरी दिन उन्होंने एक ही दिन में 17-18 रैलियां कर डालीं.’
इस पर मनोज सिंह कहते हैं, ‘यह सब दिखाता है कि तेजस्वी चुनाव परिणाम को लेकर ओवरकॉन्फिडेंट थे.’
वे आगे कहते हैं, ‘इसके अलावा तेजस्वी चुनावों के अलावा फील्ड में बहुत कम दिखाई देते हैं. उन्हें मालूम है कि कांग्रेस उनके गठबंधन की कमजोर कड़ी है, फिर भी वे ज़मीन पर मेहनत नहीं करते.’

इसके अलावा एक और बड़ी वजह, जिसका खामियाज़ा तेजस्वी और महागठबंधन को भुगतना पड़ा, वह था सीट बंटवारे को लेकर आख़िरी समय तक समन्वय का भाव. इस असहमति का असर जनता पर पड़ा, गठबंधन भरोसेमंद विकल्प के रूप में स्थापित नहीं हो पाया और एम-वाई समूह के अलावा अन्य सामाजिक वर्गों को अपने पाले में खींचने में विफल रहा.
गठबंधन निर्माण को लेकर तेजस्वी कुछ हद तक अपरिपक्व भी दिखे. जब एआईएमआईएम से संभावित गठबंधन की चर्चा चल रही थी, उसी दौरान उन्होंने असदुद्दीन ओवैसी को ‘एक्सट्रीमिस्ट’ कहा था. ऐसे बयान न केवल संवाद कमजोर करते हैं, बल्कि सहयोगी दलों के साथ समन्वय को भी कमजोर कर देते हैं. तेजस्वी को ऐसी बयानवाज़ी से परहेज करना चाहिए था.
तेजस्वी टिकट न मिलने से नाराज़ होकर बागी बने अपने ही पार्टी नेताओं को मनाने में नाकाम रहे. इसका भी सीधा नुकसान उन्हें चुनाव में उठाना पड़ा.
साल 2024 लोकसभा का प्रदर्शन
2024 के लोकसभा चुनावों में भी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन नहीं किया था. राजद इंडिया गठबंधन की एक प्रमुख पार्टी थी, कहा जा रहा था कि तेजस्वी द्वारा किए गए चुनाव प्रचार ने इंडिया गठबंधन को बढ़त प्रदान करने में अहम भूमिका निभाई थी, लेकिन वह पार्टी को उम्मीद के अनुरूप सीटें दिलाने में नाकाम रहे.
पार्टी ने बिहार में 23 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन महज 4 सीटें जीतने में कामयाब रही. इस दौरान भी टिकट बंटवारे को लेकर तेजस्वी के ऊपर सवाल उठे थे. विशेषज्ञों का कहना था कि अखिलेश यादव की तरह विभिन्न जातियों को प्रतिनिधित्व देने में तेजस्वी असफल रहे.
साल 2020 का चुनाव
साल 2020 में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया था और 75 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी. भाजपा 74 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही. जदयू को 43 सीटें मिलीं, जबकि कांग्रेस को 19 सीटों पर जीत हासिल हुई.
वहीं, वाम दलों (सीपीआई, सीपीएम और सीपीआई-एमएल) ने कुल 9 सीटें जीतीं और एआईएमआईएम को उस समय भी 5 सीटों पर सफलता मिली थी.
राजनीति में प्रवेश
महज 26 वर्ष की उम्र में तेजस्वी यादव ने साल 2015 में पहली बार राघोपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. उस समय राजद और नीतीश कुमार की जनता दल (यूनाइटेड) के बीच गठबंधन था. इस चुनाव में राजद 81 सीटें जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनी थी. इस जीत के बाद तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की सरकार में उपमुख्यमंत्री बनाया गया. वे बिहार के सबसे युवा उपमुख्यमंत्री बने थे. हालांकि बाद में साल 2017 में नीतीश कुमार महागठबंधन का साथ छोड़ भाजपा के साथ चले गए.
तेजस्वी प्रसाद यादव लालू यादव और राबड़ी देवी की नौ संतानों में सबसे छोटे हैं. उनकी प्रारंभिक शिक्षा पटना में हुई, जिसके बाद वे दिल्ली चले गए जहां उन्होंने डीपीएस वसंत विहार और आरके पुरम में पढ़ाई की. हालांकि उन्होंने औपचारिक शिक्षा पूरी नहीं की और दसवीं कक्षा में ही क्रिकेट में करिअर बनाने के लिए पढ़ाई छोड़ दी थी. वे आईपीएल में दिल्ली की तरफ से खेल भी चुके हैं.

इस चुनाव में हार के बाद उनके राजनीतिक करिअर पर प्रश्न खड़ा हो गया है.
हालांकि कुल मतों का 23% हासिल कर उनकी पार्टी का मत प्रतिशत किसी भी पार्टी से अधिक रहा, लेकिन फिर भी वे बुरी तरह हारे हैं. मतों को सीट में कैसे तब्दील किया जाए, समीकरण किस तरह बुने जाएं, मुस्लिम-यादव के सीमित आधार को कैसे विस्तार दिया जाए.. यह चुनौती उनका भविष्य तय करेगी.
