केसव सुनहु प्रबीन: वह जो रीतिकाल था

रीति साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ. बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रजभाषा के बजाय नई संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राष्ट्र-निर्माण की कार्रवाई के तौर पर देखा गया. ब्रज के ग्रंथ संदिग्ध बन गए. ब्रजभाषा को कठघरे में खड़ाकर इस हिंदी ने अपनी जगह बना ली.

ऐलिसन बुश की किताब इन स्थापनाओं को नकारती हैं कि रीति साहित्य पतनशील साहित्य था, आडंबरपूर्ण और नैतिक रूप से संदिग्ध था. (फोटो साभार: सोशल मीडिया)

हर दशक में कुछ आधारभूत किताबें आती हैं जो जिनका जादू देर तक बना रहता है. इक्कीसवीं सदी में जो उल्लेखनीय किताबें हिंदी में आईं, उनमें रीतिकालीन कवि केसव के माध्यम से रीतिकाल पर ऐलिसन बुश द्वारा लिखित ‘केसव सुनहु प्रबीन’ दीर्घजीवी किताब है. इसका अनुवाद रेयाजुल हक़ ने किया है और प्रस्तावना दलपत राजपुरोहित ने लिखी है. कवि केशव के बहाने यह मुगल कालीन और राजपूत परिवेश और ब्रजमंडल का गंभीर विहंगावलोकन हैं.

ऐलिसन बुश की किताब इन स्थापनाओं को नकारती हैं कि रीति साहित्य पतनशील साहित्य था, आडंबरपूर्ण और नैतिक रूप से संदिग्ध था.

इस किताब का एक उद्देश्य परंपरागत साहित्यिक मार्गों या पद्धतियों के एक विशेष समूह की छानबीन करना भी है, वे पद्धतियां जो 1600 से 1800 ई. के बीच ब्रजभाषा में लिखने वाले दरबारी बुद्धिजीवियों के बीच प्रचलित थी.

वे लिखती हैं कि ‘मैनें अध्ययन की अधिक विवरण केंद्रित शैली से बचने की कोशिश की है. मैंने अलग-अलग पेड़ों पर ध्यान केंद्रित करने बजाय एक व्यापक दृष्टि को अपनाते हुए पूरे वन को देखने की कोशिश की है’.

बुश कहती हैं कि दरबारी लेखकों ने श्रृंगार और भक्ति, दोनों विधाओं में लिखा. रीति साहित्य ने सांस्कृतिक बाधाओं को पार करके अनेक समुदायों को संबोधित किया जो फ़ारसी और संस्कृत नहीं कर सकीं. कई रीति रचनाकार मुस्लिम दरबार के संपर्क में थे, लेकिन कितनी फ़ारसी विधाएं, बिम्ब और छंद रूप ब्रजभाषा का हिस्सा बन पाये?

केसवदास और उनके उत्तराधिकारियों की वजह से ब्रजभाषा उस सांस्कृतिक स्थान का अतिक्रमण करने लगी जिस पर कभी संस्कृत का एकाधिकार था. उसने संस्कृत की जगह ले ली.

मुगल दरबार में रीति साहित्य की अपनी हस्ती थी. गंग कवि अकबर के दरबार में थे. केशवदास, कविन्द्राचार्य की मुगल दरबार में उपस्थिति थी. भले ही मुगल कुलीन लेखकों ने फ़ारसी ग्रंथों में इन ब्रज कवियों की कविताओं पर ध्यान न दिया हो ( उदाहरण अबुल फजल की आईन-ए-अकबरी एवं अन्य ) और फ़ारसी लेखकों की तुलना में ब्रज भाषा के कवियों को मिलने वाली बख़्शीश दसवें हिस्से के बराबर हो, फ़ारसी स्त्रोतों में मौन का मतलब ऐतिहासिक अनुपस्थिति नहीं है.

लेकिन अकबर ने फ़ारसी में रामायण, महाभारत,  हरिवंश, पंचतंत्र और कथासरितसागर का अनुवाद कराया और रहीम भारतीय भाषाओं, वैष्णव भक्ति, हिंदू गाथा और भारतीय साहित्य के तकनीकि ब्योरों में दक्ष थे. फ़ारसीदां कुलीन भी रीति साहित्य के प्रति उदार थे. इस समुदाय के सदस्यों द्वारा रीति कविता पर टीकाएं लिखीं गईं अथवा लिखवाई गईं. ऐसे टीकाकारों में सैयद ग़ुलाम नबी बिलग्रामी जो ब्रज में रसहीन नाम से लिखते थे असाधारण हैं. उनका ‘रसप्रबोध’ ग्रंथ प्रसिद्ध है.

शहंशाह शाह आलम द्वितीय फ़ारसी में आफ़ताब और ब्रज में शाह आलम के नाम से लिखते थे. आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर उर्दू शायर के साथ-साथ ब्रज कवि के रूप में याद किये जाते हैं. औरंगज़ेब के बेटे आज़म शाह को हिंदवी शायरी की जानकारी थी और बे बेहतरीन संगीत रचनाओं के लिए मशहूर थे. उन्होंने ही मिर्ज़ा ख़ान से तुहफ़त-अल-हिंद लिखवाई.

ब्रजभाषा की लगभग एक समानान्तर दुनिया मुग़ल दरबार में देखी जा सकती है. मुग़लकाल ब्रजभाषा और फ़ारसी के बीच का वह दौर था जब भाषा के स्तर पर फ़ारसी की कुलीन जड़ताएं टूट रही थीं और राजसत्ता उसे स्वीकार कर अपनी उदारता का परिचय दे रही थी.

 

रीति साहित्य का सामाजिक आधार व्यापक था और इसके श्रोता- दर्शकों-पाठकों में रईस तब़कों के सदस्य, बुद्धिजीवी, सैनिक और व्यापारी वर्ग शामिल थे. साहित्यिक ब्रजभाषा एक समुदाय या एक जगह में सीमित नहीं थी. इस संदर्भ में भिखारीदास की टिप्पणी देखी जा सकती है. ‘ब्रजभाषा हेत ब्रजबास ही न अनुमानो’, यानि ब्रज में लिखने के लिए ब्रज में रहने की जरूरत नहीं है. रीति कवि एक दरबार से दूसरे दरबार, एक शहर से दूसरे शहर यात्राएं करते थे.

फौजों के दक्षिण अभियान में शामिल उत्तर भारतीय योद्धा अपने साथ अपनी भाषा और रीति कवियों को भी ले गये. मतिराम, भूषण और चिंतामणि का उत्तर से दक्षिण के दरबारों में ब्रज भाषा और रीति काव्य के प्रसार में उल्लेखनीय योगदान है. ब्रजकवि भूषण शिवाजी के दरबार में सम्मानित थे.

अठारहवीं सदी आते-आते उत्तर भारत में लगभग हरेक राजा और दक्कन के राजाओं के पास रीति काव्य उपलब्ध था. मुग़ल और राजपूत अभिजात तब़कों ने ब्रज लेखकों को आश्रय दिया जिससे दरबारों के बीच उनका संपर्क बनता रहा. रीतिकाव्य गम्भीर रूप से सबसे पहले मुग़ल दायरों में विकसित हुआ इसके बाद पूरे भारत के अधिनस्थ दरबारों में इसका प्रसार हुआ.

ब्रजभाषा के लेखक क्लासिकल अतीत को मुगल वर्तमान में आगे बढ़ा रहे थे. रीति विधाएं सत्रहवीं सदी के लगभग मध्य से मनसबदारी दरबारी संस्कृति का हिस्सा बन गई थीं. आरंभिक आधुनिक काल में भारतीय दरबारों में साहित्य एक अनिवार्य बुनियाद हुआ करता था. मुगल मनसबदारों के रूप में राजपूत राजाओं के पास दो साहित्यिक परंपराएं उपलब्ध थीं-संस्कृत और फारसी. संस्कृत और ब्रज लेखकों को राजपूत दरबारों से आश्रय मिलता था. ऐलिसन बताती हैं रीति साहित्य के आरंभ का कोई एक बिंदु नहीं था, बल्कि ‘एक लंबी लकीर सा’ था. रीति कविता सत्रहवीं सदी के उत्तरार्द्ध से दरबारों के लिए अनिवार्य बन गयी.

राजपूत दरबार भी रीति लेखकों के केंद्र थे. जिन दरबारों में राजपूत पेंटिंग शैलियों का विकास हुआ उन्हीं दरबारों ने भी रीति साहित्य को भी आश्रय दिया. रीतिग्रंथ और मिनिएचर पेंटिंग क्षेत्रीय राजाओं की सांस्कृतिक आकांक्षाओं को सिंचित करती थीं. मगर अकादमिक क्षेत्र में ‘राजपूत चित्रकला’ का जितना नाम हुआ उतना राजपूत साहित्य का नहीं.

 लगातार दो सदियों तक ब्रज कविकुल अपनी उपलब्धियों को लेकर जीता रहा और रीतिपरंपरा ने एक सुव्यवस्थित रूप ले लिया. मगर ब्रज कविता की उपनिवेश से मुलाकात दुर्भाग्यपूर्ण रही. यहां से ब्रजभाषा की हार की कहानी प्रारंभ होती है. ऐलिसन बुश के अनुसार पुरानी व्यवस्था के पैरोकार आधुनिक हिन्दी बुद्धिजीवियों के सामने लड़ाई हारने वाले थे. ये सुधारवादी साहित्य को लेकर आमूलचूल नये नजरिये को सामने रख रहे थे. ब्रजभाषा के खिलाफ तीन प्रमुख हमले हुए. पहला, विक्टोरिया काल की नैतिक बंदिशें जिसने एंद्रिकता पर पाबंदी लगाने की कोशिश की. दूसरा, ऐसे उपनिवेशवादी और राष्ट्रवादी विचारों का मजबूत होना कि मुस्लिम शासन सांस्कृतिक रूप से कमजोर था. तीसरा प्रोटेस्टेंट मत और उपयोगितावाद के तहत दरबारी संस्कृति और साहित्यिक आडंबर को लेकर आम असहजता.

 

इसके साथ ब्रज कविता के बाहर दुनिया नाटकीय रूप से बदलने लगी थी और सत्ता के नये दावेदार अपने दावे पेश कर रहे थे. इस नये हालात में ब्रज लेखक रचनात्मक रूप से नये आश्रयदाताओं के अनुरूप भी ढले. हिंदी की प्रिंट संस्कृति के जन्म लेने के बाद हरिश्चंद्र, राजा शिवप्रसाद सिंह का काम खड़ी बोली के विकास में उल्लेखनीय है. केशवदास, कविन्द्राचार्य भूषण, मतिराम और लालकवि इस बदले राजनैतिक माहौल के प्रति अत्यन्त संवेदनशील थे. ऐसे लेखकों के चलते औपनिवेशिक युग में भी लंबे समय तक रीति साहित्य एक जीवन्त उद्यम बना रहा.

आधुनिक हिंदी के जनक भारतेंदु हरिश्चंद्र के लिए परंपरागत साहित्य असंगत या प्रतिकूल नहीं था. हरिश्चंद्र के मित्र ठाकुर जगमोहनसिंह (ओमकारचंद्रिका) अपनी साहित्यिक विरासत को खारिज करने के स्थान पर औपनिवेशिक सोच के विस्तार से जूझ रहे थे. लेकिन धीरे-धीरे ब्रज का साहित्य आधुनिक हिंदी के सामने पिछड़ गया और दरबारी ग्रंथ संदिग्ध दिखने लगे.

छायावादी कवियों में राष्ट्रवाद और रीति के अतीत के प्रति एक जटिल संबंध दिखता है. सुमित्रानंदनपंत ने छायावादी सौंदर्यबोध को रीति साहित्य से अलगाने की कोशिशकी. छायावाद के कुछ दशकों बाद रीति साहित्य के प्रति कुछ समय के लिए एक सकारात्मक नजरिया जन्मा.

विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (हिंदी साहित्य का अतीत : दो खंड) ने प्रस्ताव दिया कि रीतिकाल का नाम श्रृंगारकाल कर दिया जाये. डॉक्टर नगेन्द्र ने रीति परंपरा की प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करने का महत्वपूर्ण कार्य किया. उन्होंने रीति साहित्य को लेकर फैली गलतफहमियों को चुनौती दी. लेकिन डॉक्टर नगेन्द्र ने भी रीति साहित्य को मुसलमान शासन के तहत हिंदू पतन और सामंतवादी सांस्कृतिक जीवन की अफ़सोसजनक एंद्रिकता के तर्क की तरह पेश  किया.

ऐलिसन बुश के अनुसार रीति साहित्य के साथ न्याय नहीं हुआ. बीसवीं सदी की शुरुआत में ब्रजभाषा के बजाय नयी संस्कृतनिष्ठ हिंदी को राष्ट्र-निर्माण की कार्रवाई के तौर पर देखा गया. ब्रज के ग्रंथ संदिग्ध बन गये. उन्नीसवीं सदी के अंतिम दौर और बीसवीं सदी के आरंभ में ब्रजभाषा की क्लासिकल परंपरा को एक पूरी तरह से भिन्न बोली से ( हिंदी) बदल दिया गया. ब्रजभाषा को कठघरे में खड़ाकर यह हिंदी अपनी जगह हासिल करने में कामयाब रही.

एलिसन बुश की किताब उस ब्रजभाषा को केंद्र में लाती है जो उत्थान, वैभव, क्षरण और अपमान के बावजूद बची रही है.

(लेखक कवि हैं, सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं.)