नई दिल्ली: उड़ीसा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एस. मुरलीधर को संयुक्त राष्ट्र द्वारा अधिकृत फ़िलिस्तीनी क्षेत्र पर तीन सदस्यीय स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच आयोग का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है.
इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष के बीच जस्टिस मुरलीधर अब पूर्वी यरुशलम और इज़रायल सहित आयोग के अधिकार क्षेत्र में संयुक्त राष्ट्र की ऐसी मानवाधिकार जांचों में से एक की अध्यक्षता करेंगे, जिस पर दुनिया की नज़र तिकी हुई है.
बार एंड बेंच के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद के अध्यक्ष राजदूत जुर्ग लॉबर ने नियुक्ति की घोषणा करते हुए पुष्टि की है कि जस्टिस मुरलीधर तीन सदस्यीय निकाय का नेतृत्व करेंगे, जिसका काम संघर्ष के दोनों पक्षों द्वारा अंतरराष्ट्रीय मानवीय और मानवाधिकार कानूनों के कथित उल्लंघनों की जांच करना है.
आयोग के अन्य सदस्य ज़ाम्बिया की फ्लोरेंस मुम्बा और ऑस्ट्रेलिया के क्रिस सिडोटी हैं.
उल्लेखनीय है कि मुम्बा एक ज़ाम्बियाई न्यायविद हैं, जिनके पास दशकों का अनुभव है और वे पूर्व यूगोस्लाविया के लिए अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण की न्यायाधीश और उपाध्यक्ष भी रह चुकी हैं. उन्होंने बलात्कार को युद्ध अपराध मानने वाले अंतरराष्ट्रीय प्रावधानों का मसौदा तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
आयोग के तीसरे सदस्य सिडोटी, एक ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार वकील हैं, जिन्होंने अतीत में कई संयुक्त राष्ट्र निकायों और राष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं को सुझाव दिए हैं. वे इससे पहले ऑस्ट्रेलियाई मानवाधिकार आयुक्त के रूप में भी कार्यरत रहे हैं.
मालूम हो कि इस आयोग का गठन 2021 में संकल्प S-30/1 के तहत किया गया था और इसे 13 अप्रैल, 2021 से ‘पूर्वी यरुशलम सहित कब्ज़े वाले फ़िलिस्तीनी क्षेत्र और इज़रायल में’ हो रही घटनाओं की निरंतर जांच करने का अधिदेश प्राप्त है. विशिष्ट घटनाओं के साथ-साथ आयोग को ‘बार-बार होने वाले तनाव के मूल कारणों’ की भी जांच करने का अधिकार है, जिसमें पहचान, जातीयता, नस्ल या धर्म से जुड़ा प्रणालीगत भेदभाव भी शामिल है.
मानवाधिकार परिषद ने पिछले साल आयोग की ज़िम्मेदारियों का विस्तार भी किया था, जिसमें आयोग से इज़रायल से आकर बसने वालों के साथ-साथ वैश्विक हथियारों के हस्तांतरण पर अतिरिक्त रिपोर्ट दाखिल करने को कहा गया था, जिसमें 7 अक्टूबर, 2023 के बाद गाजा में इज़रायली सैन्य अभियानों के दौरान इस्तेमाल किए गए हथियार भी शामिल हैं.
इस वर्ष सितंबर में प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट में आयोग ने निष्कर्ष निकाला था कि इज़रायल ने गाज़ा में फ़िलिस्तीनियों के विरुद्ध नरसंहार किया था.
जस्टिस मुरलीधर की नियुक्ति उन्हें इन जांचों के केंद्र में रखेगी.
गौरतलब है कि जस्टिस मुरलीधर ने लगभग दो दशकों तक भारत के सर्वोच्च न्यायालय में वकालत की है. उन्होंने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के वकील के रूप में कार्य किया और कई जनहित मामलों में न्यायमित्र के रूप में पेश हुए हैं.
जस्टिस मुरलीधर को मई 2006 में दिल्ली उच्च न्यायालय का न्यायाधीश नियुक्त किया गया था और बाद में 6 मार्च, 2020 को पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय में स्थानांतरित कर दिया गया.
उन्होंने 4 जनवरी, 2021 को उड़ीसा उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली. 2023 में सेवानिवृत्त होने के बाद वे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा वरिष्ठ अधिवक्ता के पद पर नियुक्त होने के साथ ही कानूनी पेशे में लौट आए.
ये आयोग संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद और संयुक्त राष्ट्र महासभा दोनों को वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा.
