यह रोना तो अब थोड़ा पुराना है कि भारत में जितनी विविध और विपुल कला है, उतनी उसके समकक्ष विविध-विपुल आलोचना नहीं है. कई भाषाओं में शायद कलालोचना है ही नहीं या कि कहने भर को है जबकि उनके क्षेत्रों में कई तरह की कला सक्रिय है. असलियत तो यह है कि बांग्ला-मराठी-मलयालम के अलावा ज़्यादातर क़ायदे की आलोचना अंग्रेज़ी में ही लिखी जा रही है.
विडंबना यह है कि अंग्रेज़ी में लिखी जा रही अधिकांश आलोचना जातीय स्मृति से वंचित है: उसे पढ़कर लगता है कि हमने अपनी परंपरा में कला के बारे में न तो कोई चिंतन किया और न ही ऐसी कोई अवधारणाएं विकसित कीं जिनका, आज की कला को समझने के लिए, पुनराविष्कार किया जा सकता है. इस आलोचना को जब-तब आनन्द कुमार स्वामी याद आते हैं पर उनसे पहले का कोई नहीं.
समकालीन कला उतनी स्मृतिहीन नहीं है जितनी समकालीन आलोचना. एक और पक्ष यह है कि अधिकतर युवा आलोचना समकालीन कला और कलाकारों पर केंद्रित है: उसमें स्वयं आधुनिकता के लगभग सौ वर्ष के इतिहास और भारत में आधुनिकता के स्थापित मूर्धन्यों पर कम ही ध्यान दिया जाता है.
रज़ा फाउंडेशन ने पिछले सप्ताह दिल्ली में ‘सप्तक’ नाम से युवा कलालोचकों का एक समागम आयोजित किया जिसमें सात मूर्धन्यों- हुसैन, रज़ा, सूज़ा, रामकुमार, तैयब मेहता, गायतोंडे और कृष्ण खन्ना पर लगभग दो दिनों में बीस से अधिक युवा कला-लेखकों ने विचार किया. ये भारत के विभिन्न अंचलों से आए. उनमें उत्साहित, गुरु गंभीर, हंसमुख, नर्वस, मनहूस, एकाग्र सभी तरह की भंगिमाएं दिखीं. प्रायः सभी में अकादेमिक क़िस्म की गंभीरता थी: विनोद या क्रीड़ा भाव लगभग अनुपस्थित रहा.
दिलचस्प था कि शास्त्रीय संगीत, मनोविश्लेषण, आदिवासी-लोक अनुष्ठान कला, आगा शाहिद अली की कविता और सआदत हसन मंटो के गद्य आदि का सहारा लेकर कुछ ने विचार किया. कलाकारों के जीवनवृत्त, उनकी कलाकृतियों की नीलामी क़ीमत आदि का ज़िक्र भी हुआ. कई रोचक संयोगों का, जैसे हुसैन-रामकुमार की बनारस-यात्रा, गायतोंडे पर ज़ेन दर्शन के प्रभाव, हुसैन के आत्मनिष्कासन का.
वरिष्ठ कलालोचक यशोधरा डालमिया, गायत्री सिन्हा, मीरा मेनेजीज़, किशोर सिंह, उमा नायर और उदयन वाजपेयी ने विभिन्न सत्रों में प्रस्तुतियों पर और संबंधित कलाकारों पर टिप्पणियां कीं. यह थोड़ा खेदजनक था कि प्रतिभागी युवाओं ने अपने साथियों की प्रस्तुतियों पर बहुत कम विचार व्यक्त किए, न कोई जिज्ञासा की या स्पष्टीकरण चाहा. फिर भी, माहौल में वैचारिक उत्तेजना बनी रही और अनेक युवा, इस बहाने, एक-दूसरे से पहली बार मिले.
यह भी समझ में आया कि कई युवा बंधुओं ने जिन कलाकारों पर लिखा, उनकी वास्तविक कलाकृतियां उन्होंने या तो बिल्कुल नहीं देखीं या बहुत कम देखीं. शायद उनमें कलाकृतियां देखने से जो चाव-समझ आदि जागते हैं, उनका कम प्रमाण उनके लिखे में था. हालांकि सभी सात कलाकारों का लंबा संग-साथ और लंबी दोस्ती जगज़ाहिर है और उनके जीवन और कलावृत्त का अनिवार्य हिस्सा हैं, उनकी कला में परस्पर संबंध-तनाव-संवाद का अन्वेषण कम ही हुआ है.
सातों पर एक ही आयोजन में विचार भी पहले शायद नहीं हुआ है. सिर्फ़ एक कलालोचक ने सूज़ा और रज़ा के बीच एक कला-संवाद स्थापित-खोजने की कोशिश की और यह रोचक स्थापना की कि सूज़ा अपनी कला में ‘केऑस’ तक और रज़ा ‘कॉस्मास’ तक पहुंचते हैं.
अंग्रेज़ी कलालोचना उत्तर-आधुनिक अवधारणाओं और शब्दावली से भरी पड़ी है. गीता कपूर आदि के प्रभाव में ख़ासी जटिल पर साझी आलोचना-भाषा विकसित हो गई है. उसमें अनेक अवधारणाएं स्वयंसिद्ध मान ली जाती हैं जैसे आधुनिकता, उत्तर आधुनिकता, औपनिवेशिकता और उत्तर औपनिवेशिकता, अमूर्तन आदि. प्रायः किसी आलोचक ने इस मकड़जाल से अलग होकर कुछ कहने की कोशिश नहीं की. इस सामूहिक भाषा में किसी निजी चमक या निजी खोज की आभा कम ही नज़र आई.
कला आलोचना की एक बड़ी समस्या यह है कि कला में, इन दिनों, घन है. आलोचना का एक बड़ा हिस्सा गैलरियों के आग्रह और उनके द्वारा दिए गए मोटे पारिश्रमिक पर लिखा जाता है. इसलिए उसमें विश्लेषण और प्रशंसा तो होती है, किसी तरह की कमी का उल्लेख नहीं होता.
कुछ यही मानसिकता इस समागम में देखने को मिली. कलाकार-सप्तक की किसी विफलता या कमी का ज़िक्र तक नहीं आया. भारत में अंग्रेज़ी कलालोचना के एक तरह से संस्थापक बम्बई के निस्सीम एज़किएल और दिल्ली के रिचर्ड बार्थोलोम्यू रहे हैं: दोनों ही कवि थे और उन्होंने ‘सप्तक’ के कलाकारों पर विस्तार से लिखा था. ऐसा नहीं लगा कि युवाओं ने उनमें से किसी को पढ़ा हो, याद करना तो दूर.
हिंदी आलोचना की तरह, कलालोचना में, ‘नितान्त समसामयिकता’ का लगभग वर्चस्व-सा है.
बहुत सारे कलाकारों ने अपने विशिष्ट रंगबोध की प्रेरणा मिनिएचर चित्रकला से ली है, इसका हवाला खुद दिया है, अपने वक्तव्यों या पत्रों में. किसी युवा ने न तो इसका नोटिस लिया, न ही किसी के रंगबोध को मिनिएचर कला से जोड़कर कुछ खोजने की कोशिश की. यह भी दिखाई पड़ा कि कई युवाओं ने मूल पुस्तकें या संदर्भ पढ़े नहीं हैं और गूगल-एआई आदि से सामग्री ली है जिसकी ज़्यादातर प्रामाणिकता संदिग्ध होती है. बहुत कम अवसर ऐसे आए जब लगे कि किसी युवा ने कोई नई बात की है या कि कुछ अप्रत्याशित खोजा-पाया है.
इस मुक़ाम पर यह कहना कठिन है कि पढ़े गए निबंधों को लेकर या उनमें से कुछ को चुनकर सात मूर्धन्यों पर एक रोचक पुस्तक बन सकती है या नहीं, जो उन पर युवाओं द्वारा विचार की, मेरे जाने पहली पुस्तक होगी. देखते हैं कि क्या बात बनती है.
कबियन की वार्ता
एक अच्छे युवा कवि ने एक कम अच्छे युवा कवि के बारे में यह लिखा कि इस कम अच्छे ने उनके बारे में एक बेहद ख़राब कविता लिखी थी. प्रसंग यह हुआ है कि इस कम अच्छे कवि की किसी उक्ति या वक्तव्य के कारण चार युवा कवियशः प्रार्थियों ने, जिनमें से एक अच्छा कवि भी है, उनसे अपने सार्वजनिक मंच से उनकी कविताएं और संदर्भ हटाने का आग्रह किया है. अच्छे ने जवाब में पुनर्विचार का आग्रह किया है.
इन दिनों यह सब सोशल मीडिया पर हो रहा है. पहले यह कविता में हुआ है. याद आता है कि अज्ञेय ने नये कवियों को अपनी कविता में लताड़ा था और श्रीकान्त वर्मा ने अपनी एक कविता में ‘नकली कवियों की वसुन्धरा’ का ज़िक्र करते हुए कहा था, ‘उल्लू के पट्ठे स्त्री-रिझाऊ कविताएं लिख’ रहे हैं.
आगे चलकर दूसरे कवियों को खलनायक बताने, उनका नाम लिये बग़ैर पहचाने जाने वाले अनेक ब्योरे देने का चलन शुरू हुआ जिसमें राजेश जोशी, वीरेन डंगवाल, आग्नेय आदि की कुछ कविताएं आईं. यह सब देखें तो सिरे से अनैतिक है. इसलिए कि जिनके बारे में कुछ कहा अक्सर आरोपा जा रहा है उन्हें उसका प्रत्याख्यान करने का कोई अवसर नहीं है. अगर गद्य में हो, कुछ विश्लेषण और साक्ष्य के साथ लिखा जाए तो समझ में आता है. उसका प्रत्याख्यान गद्य में ही करने का अवसर होगा अगर कोई करना चाहे.
कवियों की आपस में चिढ़-जलन आदि होती हैं. उसे व्यक्त करने के निजी अवसर भी आते रहते हैं. अपनी भड़ास निकालकर सुखी होना जैसे आम नागरिकों को ठीक लगता है, वैसा ही कवियों को. पर उसे सोशल मीडिया पर ज़ाहिर करना, अपनी कविताओं में जगह देना, फ़ैसलाकुल फ़तवेबाज़ी करना आदि सामाजिक कार्रवाइयां से क्या हासिल होता है, इसे समझना मुश्किल है. सिवाय इसके कि ऐसे कवियों की जमात बन गई है जो ऐसे बचकाना उत्पातों पर चीयर करते रहते हैं.
क़ानूनी उलझन
एक सज्जन अकस्मात् मिल गए जिन्हें एक क़ानूनी उलझन सता रही है और उन्हें, जाने कैसे, यह भ्रम था कि मैं अपने प्रशासनिक अनुभव के आधार पर उसे सुलझा सकूंगा. उलझन यह है कि पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय का, राष्ट्रपति द्वारा कुछ मुद्दों पर मांगी सलाह पर पांच न्यायाधीशों की एक बेंच द्वारा दिया गया उत्तर.
संक्षेप में, यह उत्तर इस न्यायालय के दो न्यायाधीशों द्वारा दिए गए फ़ैसले से बिल्कुल उलट है. दो न्यायाधीशों ने फ़ैसला दिया था कि राज्यपाल और राष्ट्रपति किसी विधानसभा द्वारा पारित क़ानून को औपचारिक मंजूरी देना अनिश्चित अवधि के लिए रोक नहीं सकते और इस फ़ैसले के दोनों के लिए समयसीमा निर्धारित की. केंद्र सरकार ने, राष्ट्रपति के माध्यम से, यह प्रश्न उठाया कि क्या संवैधानिक पदाधिकारियों, राष्ट्रपति और राज्यपाल, के लिए ऐसी समयसीमा तय करना संवैधानिक है.
पांच न्यायाधीशों ने उत्तर दिया है कि ऐसी समयसीमा निर्धारित नहीं की जा सकती है; अपवाद यह होगा कि अगर मंजूरी देने में अनिश्चित और बहुत देर होने लगे तो उसकी सीमित न्यायिक परीक्षा की जा सकती है.
इस फ़ैसले पर, उचित ही, बहस हो रही है कि यह एक पश्चगामी क़दम है और न्यायालय ने विधानसभाओं, यानी निर्वाचित संस्थाओं, के ऊपर सत्ता द्वारा नियुक्त पदाधिकारियों को असीमित अधिकार दे दिया है जिसके अनेक दुरुपयोग हाल के वर्षों में देखे गए हैं.
यह भी एक सवाल है कि अगर समयसीमा तय नहीं की जा सकती तो फिर अपवाद कैसे लागू होगा? जो आधार बताए गए हैं, वे पूरी तरह से अस्पष्ट हैं. पर असली उलझन यह है कि दो न्यायाधीशों ने तो बाक़ायदा ‘फ़ैसला’ दिया था और पांच न्यायाधीशों ने ‘सलाह का उत्तर’ दिया है जो शायद फ़ैसले की श्रेणी में नहीं आता. क्या यह सलाह का उत्तर फ़ैसले को रद्द या अतिक्रमित कर सकता है? अगर कोई राज्य फ़ैसले के तहत कोई मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लाए तो न्यायालय उसे सलाह के इस उत्तर के तहत ख़ारिज कर सकता है या कि वह फ़ैसले के अंतर्गत विचार करने को बाध्य होगा?
इस उलझन में बारीकी है पर क़ानून तो तरह-तरह की बारीकियों का ही मामला होता है. मैं, अपने तथाकथित लंबे अनुभव की रोशनी में, इस उलझन को सुलझाने में असमर्थ हूं.
(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)
