(यह रिपोर्ट पुलित्जर सेंटर फॉर क्राइसिस रिपोर्टिंग के सहयोग से की जा रही ‘द वायर’ की ‘द फोर्स्ड गिल्ट प्रोजेक्ट’ श्रृंखला का पहला भाग है.)
मुंबई: केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने इस साल 21 मार्च को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के अन्य सांसदों के साथ राज्यसभा में बड़े गर्व के साथ दो घंटे से अधिक लंबा भाषण दिया, जिसमें उन्होंने ‘आतंकवाद से निपटने’ में एनडीए सरकार की प्रगति का बखान किया.
इस दौरान कई उपलब्धियों के बीच अमित शाह ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) द्वारा मामलों को दर्ज करने और अदालत में दोषियों को सजा दिलाने के शानदार रिकॉर्ड के बारे में विस्तार से बताया. उन्होंने एजेंसी की सफलता का श्रेय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आतंकवाद के प्रति ‘ज़ीरो टॉलरेंस’ नीति को दिया. उन्होंने दावा किया कि एनआईए ने ‘वैश्विक स्तर पर मौजूद सभी आतंकवाद निरोधी संगठनों में खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित किया है.’
अमित शाह के भाषण में एनआईए द्वारा 31 दिसंबर 2024 को की गई उस घोषणा का जिक्र था, जिसमें एजेंसी ने ‘साल के आखिर’ में अपनी प्रेस विज्ञप्ति में दावा किया था कि उसने 2024 में 100 प्रतिशत दोषसिद्धि दर हासिल की है. 15 साल पुरानी एजेंसी के पहले से ही स्थापित प्रभावशाली मानकों के हिसाब से भी यह एक असाधारण और अद्भुत उपलब्धि थी.
इससे पहले एनआईए की दोषसिद्धि दर ‘केवल’ 94-95% थी. व्यापक रूप से चर्चित इस प्रेस विज्ञप्ति में इस तथ्य का खास ज़िक्र था कि देश में आतंकवाद के खतरे से निपटने के लिए विशेष रूप से स्थापित की गई इस एजेंसी ने उस वर्ष 25 मामलों में दोषसिद्धि सुनिश्चित की थी.
लगातार आगे बढ़ रही एजेंसी
मालूम हो कि एनआईए की स्थापना 2008 के मुंबई आतंकवादी हमलों के बाद एक महीने के भीतर हुई थी. इस हमले में 166 लोग मारे गए थे और 300 से ज़्यादा घायल हुए थे. तब तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने संसद से आवश्यक प्राधिकरण पारित करने पर ज़ोर दिया था. जब एनआईए विधेयक राज्यसभा में चर्चा के लिए आया, तो कुछ असहमति के स्वर उठे, जिनमें भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के सीताराम येचुरी की भी चिंताएं शामिल थीं.
सीताराम येचुरी ने संघवाद के सिद्धांतों की गिरावट को लेकर चिंता जताते हुए अपराधों की जांच और सुनवाई में राज्य सरकारों के सहयोग को अनिवार्य बनाने के लिए एक संशोधन का सुझाव दिया था. चिदंबरम ने इसे खारिज कर दिया था. तब उनका कहना था, ‘लोग हमें देख रहे हैं. आज जब मैं बोल रहा हूं, लोग हमें देख रहे हैं. कल लोग हमें टेलीविज़न पर देखेंगे. लोग पूछ रहे हैं, ‘क्या यह भारत की संसद है जो टीवी पर प्रहरी है? क्या भारत की संसद हमारी आज़ादी की रक्षा के लिए उपयुक्त प्रहरी है?’ और इस तरह इस विधेयक को बिना किसी पर्याप्त चर्चा के पेश किए जाने के चार दिन बाद ही पारित कर दिया गया.
कुछ ही महीनों के भीतर– विकीलीक्स के जरिये द हिंदू को मिले अमेरिकी विदेश विभाग के एक गोपनीय केबल के अनुसार – चिदंबरम ने एक उच्च पदस्थ अमेरिकी अधिकारी को बताया था कि केंद्र-राज्य संबंधों पर संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन के आधार पर इस कानून की शक्तियों को अदालतों में चुनौती दी जा सकती है.
बाद में पता चला कि ये आशंकाएं पूरी तरह निराधार थीं क्योंकि बीते डेढ़ दशक में एनआईए का काम संवैधानिक चुनौतियों के बिना जारी है. वास्तव में, इसके मूल अधिनियम का और विस्तार किया गया है, जो आंतरिक सुरक्षा और केंद्रीकृत आतंकवाद-विरोधी प्रयासों के प्रति भारत सरकार के दृष्टिकोण में एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देता है.
जांच एजेंसी की तरह ही गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए), जिसके तहत एनआईए मामलों का मुकदमा चलाती है, में भी कई संशोधन हुए हैं – एनआईए के गठन से पहले चार बार और उसके बाद से तीन बार (2008, 2012 और 2019 में). 2019 के संशोधन ने विस्फोटकों से जुड़े मामलों के दायरे को बढ़ाया और हाईजैक को एनआईए के अधिकार क्षेत्र में लाया गया. मानव तस्करी और जाली मुद्रा अपराध जैसे मामले, जो तब तक भारतीय दंड संहिता और अनैतिक व्यापार (रोकथाम) अधिनियम के तहत निपटाए जाते थे, अब एनआईए कानून में शामिल हो गए.
इस कानून में 2019 के संशोधन के बाद साइबर आतंकवाद और हथियारों की तस्करी से संबंधित अपराध भी शामिल हैं. इस एजेंसी का अधिकार क्षेत्र, जो पहले केवल भारतीयों तक सीमित था, को 2019 में और संशोधित किया गया ताकि विदेशों में भारतीयों और भारतीय हितों को निशाना बनाने वाले आतंकवादी हमलों की जांच की जा सके.
नई दिल्ली स्थित अपने मुख्यालय से एनआईए अब गुवाहाटी और जम्मू में दो क्षेत्रीय कार्यालयों और देश भर में 21 शाखाओं का संचालन करती है, जिसमें 13 शाखाएं और दोनों क्षेत्रीय कार्यालय पिछले पांच वर्षों में ही स्थापित किए गए हैं. एनआईए का विस्तार इसके कानूनी ढांचे में भी दिखाई देता है, जहां एनआईए मामलों के लिए 51 विशेष अदालतें हैं, जिनमें रांची और जम्मू में एजेंसी के लिए विशेष रूप से दो अदालतें शामिल हैं.
इसी अवधि में एजेंसी के स्वीकृत कर्मचारियों की संख्या लगभग 33% बढ़कर 1,237 से 1,901 हो गई है, और इसका बजट 3,183% बढ़कर 2009-10 के 12.09 करोड़ रुपये से 2024-25 में 394.66 करोड़ रुपये हो गया है.
केंद्र सरकार की प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) जैसी जांच एजेंसियों के बीच, एनआईए अदालतोंं में अपने मामलों में लगातार जीत के लिए उल्लेखनीय बना हुआ है.
हालांकि, अन्य एजेंसियों की शर्मनाक विफलताओं के बावजूद एनआईए की अभूतपूर्व सफलता का राज क्या है? क्या इसकी उच्च दोषसिद्धि दरें गहन और सावधानीपूर्वक जांच-पड़ताल और साक्ष्य जुटाने के साथ-साथ उचित प्रक्रिया का कड़ाई से पालन करने के कारण हासिल हुई हैं, या ये कुछ और अधिक चिंताजनक बात की ओर इशारा करती हैं?
इन सवालों के जवाब एजेंसी द्वारा अपने मामलों को संभालने के तरीके में देखे गए एक स्पष्ट पैटर्न से स्पष्ट हो जाते हैं. लगभग दो सालों से द वायर ने एनआईए की वेबसाइट पर इसकी स्थापना से लेकर सितंबर 2025 तक प्रकाशित हुए आंकड़ों का विश्लेषण किया है. इसमें एक विशिष्ट प्रवृत्ति उभरकर सामने आती है.
धीमी शुरुआत
2009 में एनआईए द्वारा मामले दर्ज करना शुरू करने के बाद, कुछ मामलों को छोड़कर, पहले छह से सात वर्षों तक मुकदमे शुरू नहीं हुए. 2008 में यूएपीए में जोड़ी गई प्रतिबंधात्मक जमानत धारा 43 डी(5) के कारण, आरोपी व्यक्ति की जमानत पर रिहाई लगभग असंभव हो गई, जिससे यह सुनिश्चित हुआ कि आरोपी इस दौरान जेल में ही रहे.
इस धारा के बावजूद कुछ उच्च न्यायालयों के जज जमानत देने के मामले में उदार दृष्टिकोण अपनाते रहे. यह स्थिति सर्वोच्च न्यायालय के 2019 के राष्ट्रीय जांच एजेंसी बनाम ज़हूर अहमद शाह वटाली मामले के फैसले से बदल गई, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने घोषणा की थी कि जमानत तभी दी जा सकती है जब यह पाया जाए कि आरोपपत्र ‘प्रथमदृष्टया सत्य नहीं है.’
आपराधिक मामलों को देखने वाले वकील निहाल सिंह राठौड़ कहते हैं कि वाटाली फैसले में यूएपीए के प्रतिबंधात्मक जमानत प्रावधानों की इस तरह व्याख्या की गई है कि ‘जमानत याचिका पर विचार करते समय अदालतों को यह मानना ही होगा कि प्रथमदृष्टया कोई सच्चा मामला नहीं बनता, साथ ही आरोपपत्र में मौजूद सामग्री को भी सच मानना होगा.’
वे बताते हैं, ‘इससे आरोपी प्रतिकूल स्थिति में आ जाते हैं क्योंकि उन्हें अभियोजन पक्ष की ही सामग्री का उपयोग करके यह साबित करना होता है कि आरोप सत्य नहीं हैं, जबकि वे बचाव पक्ष की किसी भी सामग्री पर भरोसा नहीं कर सकते.’
राठौड़ आगे कहते हैं कि यहां जमानत के मापदंड, बरी होने के मापदंड के समान निर्धारित किए गए हैं. ‘हालांकि, अदालत कहती है कि यह बरी होने के समान नहीं है.’
दिल्ली के वकील अभिनव सेखरी कहते हैं कि यह ऐसा है जैसे किसी व्यक्ति को दोनों हाथ पीछे बांधकर गहरे पानी में फेंकने के बाद तैरने के लिए कहना.
इस संबंध में बाद में आए एक फैसले, केए नजीब (2021) ने कुछ उम्मीद जगाई, लेकिन यहां भी सर्वोच्च न्यायालय द्वारा ‘अत्यधिक देरी’ और ‘उचित समय’ की व्याख्या को पूरी तरह से स्वीकार नहीं किया गया, जिसके चलते निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में भी तब तक जमानत नामंजूर कर दी जाती है जब तक कि आरोपी हिरासत में काफी साल न बिता चुका हो. और यह ‘काफी साल’ अदालत की व्याख्या पर निर्भर करता है.
उदाहरण के लिए, एल्गार परिषद मामले में बॉम्बे हाईकोर्ट ने कहा कि दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर हेनी बाबू , जिन्होंने साढ़े चार साल से अधिक समय जेल में बिताया था, को पांच साल बाद ही जमानत मिलेगी, क्योंकि अदालत ने इसे ‘अत्यधिक देरी’ की सीमा माना था.
यूएपीए के तहत एक बार मामला दर्ज होने और जेल जाने के बाद व्यक्ति को मुकदमा शुरू होने से पहले ही लंबे समय तक में हिरासत में रहना पड़ता है. कई मामलों में ये हिरासत लगभग दस साल तक चली है और कुछ मामलों में तो 14 साल की अवधि को भी पार कर गई है – जो भारतीय कानून के तहत ‘आजीवन कारावास’ की अवधि है.
उदाहरण के लिए, 2008 से कई मुस्लिम पुरुषों को आतंकवादी समूह इंडियन मुजाहिदीन में कथित संलिप्तता के आरोप में कई मामलों में गिरफ्तार किया गया है और वे अभी भी मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहे हैं. इनमें से कई देश भर में कई मामलों में आरोपी हैं, जिन्हें बस एक जेल से दूसरी जेल में स्थानांतरित कर दिया जाता है. सुप्रीम और हाईकोर्ट द्वारा निचली अदालतों को समयबद्ध तरीके से मुकदमे निपटाने के लगातार निर्देशों के बावजूद ये मुकदमे अभी तक शुरू नहीं हो पाए हैं.
दोष स्वीकारोक्ति: न्याय या दबाव?
द वायर की पड़ताल में सामने आया है कि लंबे समय तक हिरासत में रहने और जमानत मिलने की लगभग निश्चित अस्वीकृति के कारण आरोपी अक्सर अपना गुनाह स्वीकार करने के लिए मजबूर हो जाते हैं. कई मामलों में यह कदम जरूरी नहीं कि ‘अपराध’ का परिणाम हो, बल्कि यह एक अंतहीन कानूनी प्रक्रिया से बचने की एक हताश कोशिश होती है.

एनआईए की वेबसाइट पर उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार (9 दिसंबर, 2025 तक), एनआईए की स्थापना से लेकर 30 सितंबर, 2025 तक दर्ज किए गए 633 मामलों में से अब तक केवल 133 मामलों में ही फैसले सुनाए गए हैं, जो 15 वर्षों में दर्ज किए गए कुल मामलों का केवल पांचवां हिस्सा है.
हालांकि, एनआईए प्रवक्ता द्वारा द वायर को उपलब्ध कराए गए आंकड़े बताते हैं कि 30 नवंबर, 2025 तक कुल 696 मामले दर्ज किए गए थे, जिनमें से 172 का निपटारा हो चुका है. प्रवक्ता ने कहा कि आंकड़ों का विस्तृत विवरण उनके पास फिलहाल उपलब्ध नहीं है.
यह निर्धारित करने का कोई तरीका नहीं है कि क्या ये सभी अतिरिक्त मामले अक्टूबर और नवंबर 2025 के बीच की दो महीने की अवधि में दर्ज किए गए थे, या वेबसाइट पर दिए गए आंकड़े गलत हैं. हालांकि, इस श्रृंखला के लिए द वायर ने एनआईए की वेबसाइट पर प्रकाशित केस आंकड़ों पर भरोसा किया है.
द वायर ने पाया है कि इन 133 मामलों में से एजेंसी ने केवल 79 मामलों में ही गवाहों की उचित जांच और साक्ष्य प्रस्तुतीकरण के साथ सुनवाई पूरी की. इनमें से कुछ मामलों में दोषसिद्धि हुई और कुछ में बरी कर दिया गया. हालांकि, इस डेटा का और अधिक विश्लेषण असंभव हो गया क्योंकि एनआईए, जो पहले अपनी वेबसाइट पर फैसले अपलोड करती थी, ने अचानक इसे बंद करने का फैसला कर लिया और यहां तक कि पुराने फैसले भी वेबसाइट से हटा दिए गए.
इसी तरह, अधिकांश राज्यों की जिला अदालतों की वेबसाइटें अब एनआईए मामलों के फैसले अपलोड नहीं करती हैं.
आतंकवाद के मामलों में अक्सर कई लोग आरोपी होते हैं. ऐसे अधिकांश मामलों में एजेंसी को केवल आंशिक सफलता मिली, जिसमें कुल अभियुक्तों में से कुछ को ही दोषी ठहराया गया.
शेष 54 मामलों में, प्रतिवादियों ने गुनाह कबूल करने का विकल्प चुना. इसका मतलब है कि एजेंसी ने अपने 40% से अधिक मामलों में दोष स्वीकारोक्ति के माध्यम से दोषसिद्धि हासिल की.
इन 54 एनआईए मामलों में से 49 में, जब दोषसिद्धि अपराध स्वीकार किए जाने से हुई, तो आरोपी मुस्लिम थे.
इस श्रृंखला के लिए रिपोर्टिंग करते समय द वायर ने देश भर में बड़ी संख्या में लोगों का साक्षात्कार लिया और पाया कि ये पुरुष असमान रूप से ‘निम्न’ मुस्लिम जातियों से आते हैं, जो एक महत्वपूर्ण संकेतक है जो वार्षिक रूप से जारी किए जाने वाले राष्ट्रीय अपराध रिपोर्ट ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों में गायब है.
लगभग दो वर्षों तक हमने एनआईए की वेबसाइट अदालती रिकॉर्ड और वकीलों और आरोपियों के साक्षात्कारों से प्राप्त मामलों के विवरण का विश्लेषण किया. इस पड़ताल से पता चलता है कि अपराध स्वीकारोक्ति अक्सर दबाव में की जाती है, जिसे वर्षों की कैद के बाद आजादी का एकमात्र रास्ता बताया जाता है.
कई मामलों में आरोपी व्यक्ति अपराध करने के कारण नहीं, बल्कि अपनी पीड़ा को समाप्त करने के लिए अपराध स्वीकार करते हैं, और सजा अक्सर पहले से काटी गई अवधि के बराबर या उससे कम होती है.
हालांकि, एनआईए ने इस प्रक्रिया में अपनी किसी भी भूमिका से इनकार किया है.
नाम और पद का उल्लेख न करने की शर्त पर द वायर से बात करते हुए एनआईए के प्रवक्ता ने कहा, ‘जब कोई आरोपी अपना जुर्म कबूल करने का फैसला करता है, तो पूरी प्रक्रिया केवल उसके और न्यायाधीश के बीच होती है. अभियोजन पक्ष की इस प्रक्रिया में कोई भूमिका नहीं होती.’
उन्होंने अपनी बात को साबित करने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 229 का हवाला दिया.
प्रवक्ता ने कहा, ‘इस धारा में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि यदि आरोपी अपना जुर्म कबूल करता है, तो न्यायाधीश उसका बयान दर्ज करेंगे. जब अभियोजन पक्ष को कोई भूमिका सौंपी ही नहीं गई है, तो हमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है.’
एनआईए ने यह भी दावा किया कि उन्हें आरोपी के फैसले की जानकारी केवल अदालत के माध्यम से मिलती है और कभी-कभी अदालत द्वारा आवेदन स्वीकार किए जाने के बाद ही मिलती है, क्योंकि यह अदालत का विवेकाधिकार है.
हालांकि, यह दावा हमेशा सच नहीं हो सकता, क्योंकि एनआईए के अधिकारी और अभियोजन पक्ष दोनों ही सुनवाई के दौरान अदालत में मौजूद रहते हैं.
एनआईए का ‘जुर्म स्वीकारने’ और ‘प्ली बार्गेनिंग’ (plea bargaining) शब्दों का एक-दूसरे की जगह उपयोग शुरू होना
‘दोष स्वीकार करना’ और ‘प्ली बार्गेनिंग’ शब्दों को अक्सर एक ही अर्थ में लिया जाता है, लेकिन भारतीय कानून के तहत ये दोनों अलग-अलग शब्द हैं. दोष स्वीकार करने का अर्थ है बिना किसी रियायत की गारंटी के अपराध स्वीकार करना, जबकि प्ली बार्गेनिंग समझौते का एक तरीका है जिसके अंतर्गत अभियुक्त कम सजा के बदले में अपने अपराध को स्वीकार करता है.
इसे 2005 में आपराधिक कानून अधिनियम में संशोधन के माध्यम से लागू किया गया था (जैसा कि सीआरपीसी की धारा 265ए-265जे के तहत परिभाषित है), आरोपों या सजा को कम करने के लिए बातचीत की अनुमति देता है.
प्ली बार्गेनिंग केवल सात साल तक के कारावास के लिए दंडनीय अपराधों तक ही सीमित है और इसमें स्पष्ट रूप से यूएपीए जैसे गंभीर अपराध शामिल नहीं हैं, जिन पर एनआईए आमतौर पर मुकदमा चलाती है.
समझौता ज्ञापनों को आसानी से मंजूरी नहीं मिलती. कासमभाई शेख और गणेशमल जसराज (1980) जैसे शुरुआती सुप्रीम कोर्ट के फैसलों में समझौता ज्ञापन को ‘असंवैधानिक और दबावकारी’ करार दिया गया था. सुखदेव सिंह (1992) मामले में भी, जिसमें आरोप तय होने के बाद दोषी ठहराए जाने की अनुमति दी गई थी, अदालत ने स्वैच्छिकता और सूचित सहमति पर जोर दिया.
अदालत ने माना कि समझौता ज्ञापन ढांचे का प्रयोग सैद्धांतिक कानूनी तर्क से कम और चुनिंदा और मनमाने राज्य के नियंत्रण से अधिक प्रभावित होता है.

हालांकि, 2005 के बाद अदालतों ने अपना नज़रिया बदल दिया. नटवर ठाकोर (2005) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने प्ली बार्गेनिंग की उपयोगिता को मान्यता दी और मामले-दर-मामला मूल्यांकन का आग्रह किया.
हाल ही में ‘इन रे: पॉलिसी स्ट्रैटेजी फॉर ग्रांट ऑफ बेल’ मामले में अदालत ने दोषसिद्धि के बाद सज़ा कम करने की सीमित याचिकाओं का समर्थन किया, बशर्ते कि अपीलों को प्रभावित किए बिना मामले को शीघ्रता से निपटाने के लिए अपराध स्वीकार किया जाए.
द वायर की जांच से पता चलता है कि प्ली बार्गेनिंग पर मौजूदा कानूनी सीमाओं के बावजूद कई अभियुक्त, बरसों की हिरासत और ज़मानत की कम संभावनाओं से थके हुए होते हैं और अक्सर रणनीतिक विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि हताशा में दोषी होने की दलील देते हैं.
कम से कम ऐसे सात मामले सामने आए हैं, जहां आरोपियों को अपनी अंतिम सजा से कहीं अधिक समय तक जेल में क़ैद रहना पड़ा.
न्यायपालिका की भूमिका
एनआईए मामलों में दोष स्वीकारोक्ति के संबंध में न्यायपालिका का रवैया भी चिंताजनक है. द वायर द्वारा देखे गए कई मामलों में दोष स्वीकारोक्ति की अर्जी और संबंधित निर्णय औपचारिक नजर आते हैं.
इन महत्वपूर्ण कानूनी पहलुओं पर लंबे समय से राज्य और न्यायिक, दोनों ही स्तर पर ध्यान नहीं दिया गया है. कई मामलों में आरोपी व्यक्तियों द्वारा अक्सर नरमी की उम्मीद में दोष स्वीकार करने के बावजूद, निचली अदालतों ने आजीवन कारावास जैसी कठोर सजाएं सुनाई हैं.
उच्च न्यायालयों ने इन निर्णयों की आलोचना करते हुए दोष स्वीकारोक्ति के दुरुपयोग, उचित प्रक्रिया के अभाव और सुधारात्मक दृष्टिकोणों पर विचार न करने का हवाला दिया है, विशेष रूप से बिना पूर्व आपराधिक रिकॉर्ड वाले युवा आरोपियों के मामले में.
कुछ दोषसिद्धियों को रद्द कर दिया गया, जिससे उचित कानूनी प्रतिनिधित्व या तथ्यात्मक जांच के बिना दोष स्वीकारोक्ति स्वीकार करने की असंवैधानिक प्रथाओं पर प्रकाश डाला गया.
नोट: द वायर ने 21 नवंबर को एनआईए को एक विस्तृत प्रश्नावली भेजी थी. एनआईए के एक वरिष्ठ पीआरओ ने 24 नवंबर को रिपोर्टर को वापस फोन किया और उन्हें और एक अन्य सहयोगी को नई दिल्ली के तालकटोरा स्थित एनआईए कार्यालय में मिलने के लिए कहा. 3 दिसंबर को दोनों अधिकारियों ने द वायर के दो पत्रकारों – सुकन्या शांता और जाह्नवी सेन – से डेढ़ घंटे से अधिक समय तक बात की और कुछ सवालों के जवाब दिए.
वरिष्ठ अधिकारी ने इस्तेमाल किए जाने वाले हिस्सों की रिकॉर्डिंग भी मांगी थी जो उन्हें उपलब्ध करवा दी गई. इसके बाद 8 दिसंबर को अधिकारी ने अनुरोध किया कि उनके और उनके सहयोगियों के नाम या पदनाम का खुलासा न किया जाए.
(सारंगा उगलमुगले के इनपुट के साथ.)
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