अख़लाक़ लिंचिंग: वृंदा करात ने यूपी सरकार के आरोप वापस लेने के फैसले पर राष्ट्रपति को पत्र लिखा

माकपा की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा की पूर्व सांसद वृंदा करात ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2015 में मोहम्मद अख़लाक़ की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने के मामले में आरोपियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा वापस लेने के क़दम पर हस्तक्षेप की मांग की है.

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वृंदा करात ने इस मामले में राष्ट्रपति से हस्तक्षेप की मांग की है. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) (माकपा) की वरिष्ठ नेता और राज्यसभा की पूर्व सांसद वृंदा करात ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा 2015 में मोहम्मद अख़लाक़ की भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या किए जाने के मामले में आरोपियों के खिलाफ मुकदमा वापस लेने के कदम पर हस्तक्षेप की मांग की है.

मालूम हो कि गौतमबुद्ध नगर के दादरी क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव के रहने वाले 52 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की 28 सितंबर, 2015 को भीड़ ने कथित तौर पर इस संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी कि उन्होंने अपने घर में गोमांस रखा है. उनकी लिंचिंग ने मोदी सरकार के दशक में भीड़ द्वारा हिंसा की कई घटनाओं की नींव रखी.

हाल ही में राज्य की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने आदित्यनाथ सरकार को आरोपियों के खिलाफ मामला वापस लेने की अनुमति दी है. यह अनुमति आरोपियों के खिलाफ सबूत पेश किए जाने और अदालत में दर्ज किए जाने के बाद दी गई है.

इस संबंध में वृंदा करात ने अपने पत्र में लिखा है कि यदि सरकार हत्या, हत्या के प्रयास और मॉब लिंचिंग के मामले को वापस लेने के लिए इस तरह का राजनीतिक रूप से प्रेरित कदम उठा रही है, तो क्या राज्यपाल को सरकार को ऐसा न करने की सलाह नहीं देनी चाहिए?

करात ने मुर्मू से हस्तक्षेप करने और राज्यपाल को अपनी अनुमति वापस लेने का ‘निर्देश’ देने का अनुरोध किया है.

वृंदा करात पत्र में कहती हैं, ‘मैं आपका ध्यान सितंबर 2015 में हुई मोहम्मद अख़लाक़ की भीड़ हिंसा में हुई मौत के मामले में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल की भूमिका की ओर आकर्षित करना चाहती हूं. राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश सरकार को न्याय की प्रक्रिया को बाधित करने और पूरे मामले को वापस लेने के पूर्णतः अवैध और अन्यायपूर्ण प्रयास को आगे बढ़ाने के लिए लिखित अनुमति दे दी है, जबकि मुख्य गवाह पहले ही साक्ष्य दे चुका है.’

उन्होंने आगे कहा है, ‘सरकार ने राज्यपाल की अनुमति से ग्रेटर नोएडा जिला न्यायालय में मामला वापस लेने के लिए एक हलफनामा दायर किया है. चूंकि राज्यपाल की नियुक्ति आपने की है और वह आपके प्रति जवाबदेह हैं, इसलिए मैंने न्याय के हित में आपको तथ्यों से अवगत कराना और आपके तत्काल हस्तक्षेप का अनुरोध करना उचित समझा.’

वृंदा के अनुसार, इस क्रूर हत्या के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था. सरकार ने दोषियों को सजा दिलाने का आश्वासन दिया था. इस घटना के समय से लेकर अब तक वे परिवार के लगातार संपर्क में हैं और उनके दुख, साहस और न्याय पाने की उम्मीद से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं.

वृंदा का कहना है कि अख़लाक़ के बेटे दानिश आज भी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाए हैं और उन पर किए हमले में लगे गंभीर घावों का असर अभी भी साफ दिखता है.

वृंदा ने सवाल उठाया है कि क्या संविधान और कानून के शासन को कायम रखना राज्यपाल का कर्तव्य नहीं है? अगर ऐसा मामला वापस ले लिया जाता है, तो न्याय व्यवस्था में क्या बचेगा? क्या यह बात भीड़ द्वारा पीट-पीटकर हत्या करने के सभी मामलों पर लागू नहीं होगी. सद्भाव बनाए रखने के लिए ऐसे मामलों को वापस लेना जरूरी है?

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश की एक अदालत को 2015 के मोहम्मद अख़लाक़ लिंचिंग मामले में सभी 19 आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे वापस लेने संबंधी राज्य सरकार की याचिका पर 12 दिसंबर को सुनवाई करनी थी, लेकिन अभियोजन पक्ष के वकील ने बताया कि वे सरकार के प्रस्ताव पर आपत्ति दाखिल करना चाहते हैं, इसके बाद अदालत ने सुनवाई की नई तारीख 18 दिसंबर तय की है.

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