‘मतलब हिन्दू‘ एक ऐसे समय में आया उपन्यास है जब अधिकांश हिंदू अपने हिंदू होने को बदलना चाहने की कोशिश में बिला वजह अ-हिंदू हुए जा रहे हैं. जब पहली बार उपन्यास का नाम पढ़ा ‘मतलब हिन्दू’ तो कुछ समझ न आया कि क्या? फिर उपन्यास पढ़ने पर यह नाम कुछ खुला.
यह अपने कथ्य में नहीं व्यंजना में खुलता है. कहानी कुछ और चल रही जो इतनी गहन गंभीर है कि मतलब पता नहीं चलता. यह उपन्यास अपने कथ्य-कहानी और उसके प्रवाह के साथ ही अपनी भाषा के कारण मुझे अद्वितीय लगा.
कहानी गोवर्द्धन नामक एक युवक की है जो ब्राह्मण है और उसके जीवन में आए उन लम्हों की है, जब उसने निस्संकोच अपना ब्राह्मणत्व त्यागा. जो मुझे भाया वह इस उपन्यास की हिंदी भाषा है. यह भाषा अपने में लोक समेटे है उसे गुजराती, मराठी, मालवी कहना भाषा की अवमानना होगी कि यह हिंदी ख़ुद है. एक लोमहर्षक हिंदी. लंबे अरसे बाद ऐसी भाषा से सामना हुआ जिसमें तैरना-डूबना साथ चलता रहा.
इस उपन्यास की भाषा में ही वो अचरज छिपा है जो ‘मतलब हिन्दू’ होने का अर्थ भी है. यह इसलिए भी है कि हिंदू होने के नाते नायक पारंपरिक नैतिकता का आग्रही होता है जो अवसर आने पर छोड़ दी जाती है. वह इस नैतिकता के प्रति आग्रही होते हुए भी ख़ुद के लिए कोई नियम नहीं मानता किंतु दूसरों के द्वारा तोड़ने पर हिक़ारत से देखना ही उसका धर्म है इस विश्वास से भरा हुआ है. फिर भी वह अवसरवादी नहीं है. उसकी आत्मा अंत तक ‘गोमूत्र की तरह पवित्र है’ इस हिंदू होने पर मैं आगे बात करूंगा.
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भाषा का स्वभाव कुछ ऐसा है कि वह बेहद निर्दयी होकर अलेखक को बहा ले जाती है. वह क्या कहना चाहता है यह आख़िर तक उस लेखक और पाठक दोनों को स्पष्ट नहीं हो पाता और उस अ-लेखक को लगता है कि नोबेल पुरस्कार पाने योग्य पाठ उसने आख़िरकार लिख ही डाला. दूसरी तरफ़ अन्य लेखक उस पर अधिकार होने के कारण एक सुन्दर वाक्य बनाने में सक्षम होते हैं.
एक मंजा लेखक भाषा के वैभव को महसूस-प्रकट कर सकता है. चमकदार आलंकारिक भाषा उसके अधिकार को दर्शाती है. भाषा के इस पक्ष के लिए एक उदाहरण है जो मेरी अंग्रेजी कमज़ोर होने के कारण बड़ा भाई हमेशा सुनाया करता था वो प्रसिद्ध अभिनेता उत्पल दत्त का है. (कहा जाता है कि टाइम्स ऑफ इंडिया के विशेष संस्करण की प्रूफ रीडिंग उत्पल दत्त किया करते थे.) वे जिन दिनों स्कूल में थे उस वक़्त का ये वाक़या है कि उनके अंग्रेजी के शिक्षक ने कक्षा में ‘सूर्य पश्चिम में उग रहा है’ का अंग्रेजी में अनुवाद करने को कहा.
उत्पल दत्त ने अनुवाद किया- The Monark of the day has been risen in the west. यह वाक्य उनकी भाषा पर पकड़ को दर्शाता है.
वे उसका आलंकारिक उपयोग कर चमत्कृत कर देते हैं.
इसके विपरीत हिंदी के अनेक लेखक फणीश्वरनाथ रेणु, जयशंकर प्रसाद, निर्मल वर्मा, कृष्ण बलदेव वैद, विनोद कुमार शुक्ल, श्रीकान्त वर्मा आदि और अब अम्बर पाण्डेय भाषा को सिर्फ़ भाषा की तरह नहीं वापरते, वे उसके साथ लड़ते, झगड़ते, उसके परे चले जाते और एक ऐसा वाक्य लिखते जो निर्मल वर्मा का वाक्य नहीं होता किंतु उसके भीतर ‘निर्मल-रस‘ भरा होता. वह वाक्य कृष्ण बलदेव वैद का वाक्य नहीं होता. उसके ‘कृष्ण-रस’ में डूब कर पाठक एक नयी दुनिया को महसूस करता है. इसी तरह के पाठ भाषा के उन अनछुए कोनों को खोलते हैं जो पाठक के लिए अभी तक अनजान थे.
हिंदी साहित्य जगत में हिंदी के पवित्र (?) होने को लेकर भी अनेक नकली उपक्रम चलते रहते है जिसके कारण फणीश्वरनाथ रेणु की भाषा को लोक-लपेट भाषा कह उस तरह का स्थान नहीं मिलता जो प्रेमचंद की साधारण भाषा को मिलता है. प्रेमचंद का भाषा के प्रति वो आग्रह नहीं दिखता जो किसी अन्वेषक का अपने माध्यम के प्रति होता है. वे भाषा को उकसाते नहीं. उनकी भाषा एक पत्रकार, बेहतर पत्रकार की तरह है जो घटना का वर्णन बख़ूबी करती है. वे भाषा का एक विश्वासी उपयोग करते हैं जिसमें भाषा जानने का भाव भरा है. उनकी भाषा लड़खड़ाती नहीं, बहकती नहीं, अनजान रास्तों पर नहीं चली जाती. वे रिपोर्ट की तरह एक दृश्य रच देती जो ‘पाठक के मन भाए.’
अम्बर की भाषा इसके विपरीत नया संसार खोलती है जो भाषा के उस पहलू को सामने लाता है जिसमें ‘अम्बर-रस’ भरा है.
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प्रसिद्ध चित्रकार सैयद हैदर रज़ा की सबसे बड़ी ख़ूबी क्या है? यह नहीं कि वे अमूर्तन रच रहे थे, यह भी नहीं कि हिंदू परंपरा में बिंदु के महत्व को समझ उसे चित्रित कर रहे थे, यह भी नहीं कि वे चित्रों से कोई बदलाव प्रस्तावित कर रहे बल्कि यह है कि उन्होंने अपने माध्यम के सबसे प्रमुख तत्व ‘रंग’ को समझने का प्रयास किया.
वे रंग के पीछे मौजूद रंग स्वभाव तक चले गए. उन्होंने रंग के प्रचलित पारंपरिक रूप को चित्रित नहीं किया वे उसके स्वभाव को खोज लाए. उन्होंने लाल रंग की आक्रामकता में उसका शांत स्वभाव खोज निकाला. या कि सफ़ेद रंग के पारंपरिक शांत प्रकटन में चंचलता देख ली. उनके चित्रों में वे रंग के साथ लड़ते झगड़ते दिखते हैं. उसके अपरिचित होने को सामने ले आते हैं.
वे प्रकट करते हैं रंग का नया स्वरूप. वे उसके साथ अन्य रंगों के सामंजस्य को पाने-बैठाने की कोशिश करते हैं. वे सूजा की तरह रंग रेखा का साधारण चित्रकारीय रिपोर्टिय उपयोग नहीं करते. सूजा के चित्रों में हम रंग रेखा और रूप के प्रचलित स्वरूप से रू-ब-रू होते हैं. वे कोई जोखिम नहीं उठाते.
हम सभी भाषा को संप्रेषण के लिए इस्तेमाल करते हैं. इस बात से अनजान रहते हुए कि भाषा साहित्य में ‘सहभागिता’ का आवलंबन चाहती है. वह समझने से अधिक महसूसने के लिए है. हिंदी की प्रसिद्ध लेखिका गीतांजलि श्री को जिस पुस्तक पर बुकर पुरस्कार मिला, उसे न पढ़ने लायक उपन्यास बताकर बुरी तरह लताड़ा गया बजाय इसके कि उपन्यास पढ़ने का यत्न किया जाए.
भाषा के उस रूप को समझा जाए जो गीतांजलि श्री ने न जाने किस मुश्किल-समझ से पकड़ा होगा. उसके साथ समय बिताने की कोशिश करें. कितनी हास्यास्पद बात है कि हिंदी बरतने वाले हिंदी के जानकार कह रहे हैं कि ‘कठिन हिंदी’ है. यही ‘मतलब हिन्दू’ के साथ भी हो सकता है. हिंदी के इस स्वरूप को समझने-जानने के उपक्रम से बचते हुए उस पर निर्णय सुनाने का चलन बढ़ता जा रहा है. यह भी ‘हिंदू’ होने का ही एक प्रमाण है कि मेरी पुस्तक को पढ़ा जाना चाहिये और दूसरे की पुस्तक पढ़ने लायक़ नहीं है यह मत मन भीतर पुष्ट है.
मतलब हिन्दू उपन्यास इन्हीं विडंबनाओं का पर्दाफ़ाश अनजाने करता है. पर्दाफ़ाश नहीं उस पर रोशनी डालता है कि एक हिंदू किस क़दर काफ़िर है. काफ़िर उन अर्थों में नहीं जो एक धार्मिक नजरिये से प्रचलित है बल्कि नाशुक्रा या अकृतज्ञ के अर्थ में.
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इस उपन्यास में हिंदू होने के अर्थ बहुत ही स्पर्शी ढंग से खुलते हैं. लेखक यह नहीं बतलाता कि यहां वह हिंदू है और यहां नहीं जैसा कि अक्सर अख़बारी रिपोर्टिंग में किया जाता है. यहां लेखक घटनाओं के रास्ते हिंदू होने का अर्थ खोलता चलता है.
हिंदू के समक्ष परिस्थितिजन्य क्षण में धर्म पालन के बरक्स जिंदा रहने के उपाय को सहज स्वीकार करना हिंदू होना है. गोवर्द्धन ब्राह्मण है और जिस घर में रहता है वहां धर्म का पालन बचपन से अनजाने ही उसने जाना है. जवान होने पर वह दुनिया से टकरा रहा है जीने के अनेक तौर-तरीक़े जान रहा है.
देखिए कुछ पंक्तियां उपन्यास से:
‘चार बजने को आए थे, धूप मुक्तावली की प्रभा जैसी कोमल पड़ गयी थी. साइकिल की घण्टियों के बीच, भीड़ के कोलाहल, दूर रेलगाड़ियों की छुकछुक, रिक्शावालों की तेज़ श्वासों के फुफकारों, कोचवान की हांक और घोड़ागाड़ी की लय, दुकानदारों की झिकझिक और पुकारों के बीच जीवन में मुझे प्रथम बार यह अनुभव हुआ था कि संसार का सूत्र कितना कच्चा और कमज़ोर है.’
यह अनुभव जो नायक को हुआ वह इस उपन्यास का मर्म बिंदु है. जीवन सूत्र का ज्ञान जिसे ‘इच्छा’ कहते हैं, पाकर गोवर्द्धन आगे अनेक मौकों पर हिंदू रीति-रिवाज़ के विपरीत जाकर जीवन का सूत्र पा लेने का उपक्रम करता है. सिर्फ़ वही नहीं उसकी बुआ और उसके परिवार के सदस्य भी बदलती जीवनचर्या को सहज अपनाते चलते हैं. उनके मन में कोई संदेह नहीं उपजता. ‘तम्बाकू के साथ साथ घर में चाय का नशा भी शुरू हो जाता है.’
इसी तरह घर में गोवर्द्धन नानखटाई खाता है जिसे देख महाराज, जो बैरिस्टर गांधी का रसोइया है, कहता है ‘मैं नानबाइयों के हाथ की बनी चीज़ें नहीं खाता. हिंदू हॉटल की चीज़ें ही खाता हूं. पारसी या मुसलमान जगह पर पाँव नहीं रखता.’
यह सुनकर गोवर्द्धन की मां घर पर ब्राह्मण कुल होने पर भी पारसियों की बेकरी में बनी नानखटाई रखने पर सहसा कान्तिहीन हो गयी, कहा, ‘बच्चे ले आते हैं, सुनते नहीं मगर रसोई से बाहर रखती हूं मैं भी.’ बच्चों की ‘इच्छा’ का सम्मान सहज ही मां द्वारा किया जा रहा है.
इस उपन्यास की भाषा में ही वह समय बुना हुआ है जो उन्नीसवीं शताब्दी के अंत और बीसवीं की शुरुआत का है. हमें बहुत ज़्यादा मशक़्क़त नहीं करनी पड़ती उस समय को पकड़ने में. अम्बर एक सिद्धहस्त लेखक की तरह पाठ को अनेक मौकों पर टिकाते चलते हैं जहां परिवेश, भोजन, माहौल, वस्त्र, कर्मकांड, संबंध आदि खुलते रहते हैं.
इन मौकों पर भाषा की रवानगी और ताज़गी पाठक को उस समय की सुगन्ध में लपेटे रखती और वर्तमान से विलग नहीं होने देती.
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शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी का एक उपन्यास है ‘कई चाँद थे सरे आसमाँ’ लगभग आठ सौ पन्नों के इस उपन्यास में चार सौ पृष्ठ तक फ़ारूक़ी साहेब कल्पना की उड़ान लेते रहे और अनेक तथ्यों को भी कल्पना से ही रचा. उपन्यास चार सौ पृष्ठ तक पाठक को बांधे रखता है. उसके बाद शायद वे ख़ुद उपन्यास के पाठ को कल्पना के घोड़े पर बेलग़ाम दौड़ते देख घबरा गए और उन्होंने बाक़ी पृष्ठों पर कल्पना को प्रमाणित करने के लिए तथ्य रखना शुरू कर दिए जिससे उपन्यास नीरस होकर आख़िरी सांसे गिनने लगा.
अम्बर भी यही ग़लती एक जगह कर जाते हैं जब वो पिता की मृत्यु के बाद उनके अंतिम संस्कार का जिक्र करते हैं.
‘भले उनकी मृत्यु के अनेक पूर्वाभ्यास मेरे मन में घट चुके हो, पिता जी की मृत्यु उन सभी आवृत्तियों से भिन्न थी. उन्हें और बुआ को अस्पताल में भर्ती किया गया और यह गोबरगौरी की मृत्यु के लगभग आठ मास पश्चात् हुआ. रोगी की मृत्यु होने पर अस्पताल की दीवार पर एक पहिया बना दिया जाता था. दीवार पहियों से अँटी पड़ी थी. अन्तिम संस्कार के लिए घण्टों प्रतीक्षा करना होती थी. परिजन का शरीर जो इतना प्रिय होता है, उसके निपटारे के लिए लोग लड़ते-झगड़ते और अपनी बारी पहले लगाने का यत्न करते. गोबर के उपले, जलावन बॉम्बे में उस वर्ष इतने महँगे हो गये कि दरिद्र लोग कोतवालों से छुपकर शव समुद्र में बहा आते. शव से कैसे छुटकारा हो, यह व्यावहारिक जीवन की समस्या है. बॉम्बे के 1896-97 के प्लेग साहित्य में आप इसके अनेक विवरण पा सकते हैं.’
यह जो बॉम्बे के 1896-97 के प्लेग साहित्य में विवरण पाने का ज़िक्र है यह वही भूल है जो शम्सुर्रहमान कर चुके हैं. किंतु इस छोटी-सी भूल का उपन्यास के फ़लक पर कोई असर इसलिए नहीं पड़ा कि आगे कहीं यह तथ्य रखे नहीं गए हैं.
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उपन्यास के हिंदू गोवर्द्धन बामन की बुआ शुद्ध घी के पक्के चौके में बनी चकली और भाकरबड़ी खा लेती है छुआछूत का कोई सवाल नहीं उठता, वह अंग्रेजी मिठाई ‘बिस्कुट‘ भी खाती है. यह भी हिंदू रीति में निषिद्ध है और गोवर्द्धन यह भी कभी नहीं समझ पाया कि गणपति के परिवार की जीवनशैली सनातनियों से अधिक शुद्ध होने पर भी इन्हें अशुद्ध क्यों माना जाता है.
गोवर्द्धन ख़ुद दफ़्तर में जल पीने के मटके को भरने-अगोरने का काम विधवा पंडिताइन से रुपये देकर करवाता है ताकि दूसरी जाति वाले उसे न छुएं किंतु साथ ही विलियम साहेब की तम्बाकू चुराकर पीने में जात-धर्म का ख़्याल नहीं रखता. बुआ उसके बेटे यज्ञदत्त को अपने साथ अस्पताल ले जाती जो ख्रिस्तानी अस्पताल है, वह उसे लेकर भी चिंतित रहता है.
यही चिंतित गोवर्द्धन घर छोड़ चली गई मां का श्राद्ध-तर्पणादी करता है. खोदादाद (पारसी) कोतवाल से उधार लेकर पंडे जिमाता है, तांबे के वज़नदार घड़े भर बताशे दान करता है, विधवा डोकरियों को धोती, धान, रुपया देता है साथ ही पेट भर पक्का जेवनार अलग कराता है. बैंक की नौकरी से निकाले जाने पर जहाज की नौकरी की. इस दौरान शराब, मांस-मछली खाना शुरू किया. एक मौके पर सुअर का गोश्त भी खाना शुरू कर दिया.
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उपन्यास के एक पात्र गणपति दादा का विचार था कि हिंदू होने में और हिंदूपने में अंतर है, हिंदू होना दुःसाध्य है किंतु हिंदूपना अपनाना सरल और यह कि पंडों के बस रहकर मोक्ष नहीं मिलता. उसके लिए ब्रह्मचर्य, तप, अध्ययन, मनन, निध्यासन करना पड़ता है, स्वर्ग प्राप्ति के लिए सत्कर्म किंतु हम लोग पंडों को दक्षिणा देकर, गंगा स्नान और गोदान करके सोचते है कि हमें स्वर्ग मिल गया और शेष जीवन अनुचित कर्म करते चले जाते हैं.
इस तरह अनेक मौकों पर हिंदू होने का मतलब खुलता जाता है और एक मतलबी हिंदू से पाठक का सामना होता है. एक जगह नायक ख़ुद से कहता है:
‘जो ढेरों बदकर्म करने से पहले गोवर्द्धनचन्द्र गंगाशंकर दवे था, वही मैं अब भी हूं.’
जहाज पर कार्ल उसका दोस्त बनता है, वहां गोवर्द्धन को समझ आता है किः
‘कार्ल मुझसे कम पढ़ा-लिखा था. अंग्रेज़ी साहित्य में तो उसकी कोई गति न किंतु तब भी फ़िरंगी होने के नाते न केवल वह खुद को मुझसे अधिक जानकार समझता था बल्कि मेरा भी यही मत था. हिंदुस्तानी मानुष दग़ाख़ोरी करते हैं, …लोभ और दूसरे से जलनख़ोरी यह तुम लोगों के सबसे बड़े अवगुण हैं.’ दिवस शराब पीने के पीछे कार्ल ने कहा. उसकी बात सत्य थी, इस वास्ते मैंने बात आगे बढ़ाकर कहा, ‘और आलस भी.’ कार्ल इस पर सहमत न हुआ कि हम लोग आलसी होते हैं, हां डाह और लालच के मारे आगा-पीछा नहीं देखते.’
इस तरह हम पाते हैं गोवर्द्धन जो बहुत पहले ‘जीवन सूत्र’ पा चुका था. अपनी इच्छाओं को पूरा करता जाता है.
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उपन्यास में कई तरह के खाने की चीज़ों का दिलचस्प वर्णन है. उनमें से अनेक प्रचलन में हैं, अनेक के नाम पहली बार पढ़ने को मिलते हैं. अम्बर की भाषा में सजावट नहीं है वे उसे उधेड़ते हुए बुनते जाते हैं. यह बुनाई अनगढ़ भी है और सधी हुई भी. वाक्य संरचना सामान्य नहीं साधारण भी नहीं. कई वाक्य मुझ जैसे अज्ञानी पाठक को दोबारा पढ़ने को मजबूर करते हैं. समप्रयोग के वर्णन हैं जो पुंश्चलियों के साथ और बिना भी बेहद अलग हैं और एक हद तक आक्रामक भी हैं.
यह ‘मतलब हिन्दू‘ उपन्यास त्रयी का पहला भाग दूसरे भाग के लिए बाकायदा उत्प्रेरक का काम करता है. एक अनूठे उपन्यास को पढ़ने के लिए देरी करना अपना ही नुकसान है ऐसा मेरा अनुभव रहा है.
पुनश्चः प्रकाशक के यहां प्रूफ रीडर होता तो अनेक भूल सुधार हो सकती थीं. क्या हिंदी के प्रति कोई जिम्मेदारी का भाव इस प्रकाशकीय दुनिया में कभी आ सकेगा, यह प्रश्न हर बार किसी भी पुस्तक को पढ़ने के बाद सहज ही उठता है?
(वरिष्ठ चित्रकार-गद्यकार अखिलेश की कृतियां दुनिया भर में प्रदर्शित हुई हैं. उनकी किताबों में मूर्धन्य चित्रकारों की जीवनियां शामिल हैं, ‘के विरुद्ध’ (जे. स्वामीनाथन), ‘मक़बूल’ (एमएफ हुसैन) ‘जैसा मैंने देखा’ (एसएच रज़ा).)
