नई दिल्ली: साल 2016 की बात है. उस समय अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दिल्ली विश्वविद्यालय और गुजरात विश्वविद्यालय की शैक्षणिक डिग्रियों की सच्चाई को लेकर एक बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हुआ था. दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) को चिट्ठी लिखकर मांग की थी कि प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ), सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम के तहत पीएम मोदी की डिग्री को सार्वजनिक करे.
इससे राष्ट्रव्यापी बहस छिड़ी, जिसमें राजनीतिक दलों द्वारा आरोप-प्रत्यारोप और प्रेस कॉन्फ्रेंस का दौर चला.
इसी बीच पीएमओ में तैनात मोदी के ‘ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ (ओएसडी) हिरेन जोशी ने गुजरात विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति एमएन पटेल से वॉट्सऐप के जरिये संपर्क साधा. जिस दिन सीआईसी ने विश्वविद्यालयों को मोदी की डिग्री से संबंधित जानकारी साझा करने का निर्देश दिया, उसी दिन पटेल ने मार्कशीट साझा करने से इनकार करते हुए पत्रकारों को बताया कि छह महीने पहले ही उन्होंने वॉट्सऐप पर पीएमओ में तैनात हिरेन जोशी को मोदी की योग्यता का विवरण भेज दिया था. उन्होंने जोड़ा, ‘अगर मुझे पीएमओ या सीआईसी से निर्देश दिया जाए, तो मैं मीडिया को इसकी प्रतियां दे सकता हूं.’
मोदी के विश्वसनीय सहयोगी हिरेन जोशी इसी काम के लिए जाने जाते हैं: ‘क्राइसिस मैनेजमेंट’ यानी किसी भी तरह के संकट को मैनेज करना. 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद संभालने के पहले से ही जोशी साये की तरह उनके साथ रहे हैं और वह काम करते रहे हैं जो दूसरे या तो करना नहीं चाहते थे या कर नहीं सकते थे.
मोदी के कार्यकाल का लगभग एक दशक बीत जाने तक किसी को स्पष्ट मालूम नहीं था कि जोशी करते क्या हैं. किसी ने उन्हें देखा तक नहीं था. प्रधानमंत्री की वेबसाइट पर वे अन्य स्टाफ के साथ संयुक्त सचिव (जॉइंट सेक्रेटरी) के तौर सूचीबद्ध थे. कुछ ने उन्हें मोदी का मीडिया सलाहकार बताया, तो कुछ ने उन्हें ‘टेक गाइ’ (तकनीकी विशेषज्ञ) कहा. दुनिया ने उन्हें पहली बार तब देखा जब भारत में 2023 के जी-20 शिखर सम्मेलन के समय उनकी एक तस्वीर जारी हुई.
इस रिपोर्ट के लिए ‘द वायर’ ने एक दर्जन से अधिक संपादकों और पत्रकारों से संपर्क किया, जिनमें से कुछ ने अतीत में सार्वजनिक रूप से जोशी के बारे में बात की थी. हालांकि, हर कोई उनके साथ हुई अपनी बातचीत को याद करने में झिझक रहा था. जोशी से दो-तीन बार मिल चुके एक पत्रकार ने उन्हें मोदी का ‘गेटकीपर’ बताया. उन्होंने कहा कि जोशी सीधे लेकिन मृदुभाषी अधिकारी हैं, जो प्रधानमंत्री की छवि के प्रति बहुत सतर्क रहते हैं और प्रेस में लिखी जा रही बातों को बारीकी से पढ़ते हैं.
पूर्व में भाजपा से जुड़े रहे पत्रकार और नेता अरुण शौरी उन पहले लोगों में से थे, जिन्होंने 2017 में सार्वजनिक रूप से जोशी का नाम लिया था. उन्होंने कहा था, ‘प्रधानमंत्री कार्यालय में मोदी की एक पूरी टीम है, जिसका नेतृत्व हिरेन जोशी नाम का व्यक्ति करते हैं… जिसका एकमात्र काम सोशल मीडिया पर नज़र रखना और प्रधानमंत्री को इसके बारे सूचित रखना है.’
पीछे हटते कदम!
दिसंबर की शुरुआत से ही सोशल मीडिया पर हिरेन जोशी को पद से हटाए जाने की सुगबुगाहट तेज हो गई थी. जल्द ही ये चर्चाएं अटकलों में बदल गईं. इसी बीच, इन चर्चाओं ने तब और जोर पकड़ लिया जब बिना किसी ठोस सबूत के उनका नाम ‘महादेव ऐप’ से जोड़ा जाने लगा, जो कि अवैध सट्टेबाजी का एक बड़ा नेटवर्क है. यह सट्टेबाजी ऐप ऑनलाइन बैटिंग (betting) का एक चर्चित प्लेटफॉर्म था और प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) द्वारा मनी लॉन्ड्रिंग की एक बड़ी जांच के केंद्र में है.
इधर, कुछ नेताओं और पत्रकारों ने एक महिला के साथ पीएमओ की नजदीकी पर भी सवाल उठाते हुए राजनीतिक संरक्षण का आरोप लगाया.
इन सबके बीच, कांग्रेस पार्टी के मुख्य प्रवक्ता पवन खेड़ा ने भी एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जोशी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए. उन्होंने जोशी पर पीएमओ के भीतर एक बेहद शक्तिशाली व्यक्ति होने की बात कही और इसे लेकर पारदर्शिता की मांग करते हुए उन्होंने कहा, ‘देश को यह जानने का हक है कि हिरेन जोशी पीएमओ में बैठकर क्या काम कर रहे थे… वह कौन सा सट्टेबाजी ऐप था? उनके विदेशी साझेदार कौन थे? अगर सरकार इस पर स्थिति साफ नहीं करती है, तो जाहिर है कि ये चर्चाएं चलती रहेंगी.’
द प्रिंट’ उन गिने-चुने मीडिया संस्थानों में से एक था जिसने पवन खेड़ा के आरोपों पर खबर प्रकाशित की थी, लेकिन उनकी वेबसाइट पर आने के कुछ ही देर बाद यह खबर वहां से गायब हो गई. खबर का इस तरह हटाया जाना उस दबाव को दिखाता है जो मोदी सरकार के राज में मीडिया महसूस करता है.
उल्लेखनीय है कि ‘वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स’ (विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक) में भारत अब 180 देशों में से 151वें स्थान पर है.
मोदी राज में सूचनाओं पर नियंत्रण की एक केंद्रीकृत मशीनरी तैयार हो चुकी है, जहां किसी भी तरह की जानकारी या मैसेज बहुत ही नपे-तुले अंदाज़ में तैयार और जारी किए जाते हैं. इस पूरे तंत्र के केंद्र में प्रधानमंत्री के बेहद खास और प्रभावशाली मीडिया सहायक जोशी हैं.
आलोचक और नेता इसकी और भी डरावनी तस्वीर पेश करते हैं- ऐसी तस्वीर जिसमें जोशी भाजपा की ‘प्रोपेगंडा मशीनरी’ की धुरी हैं. कई पत्रकारों का आरोप है कि वह टेलीविजन पर होने वाली बहसों की दिशा तय करते हैं, साथ ही यह भी कि किस मुद्दे को हवा देनी है और किस सच को दबाना है. यानी खबरें आने से पहले ही वह देश का ‘न्यूज एजेंडा’ तय कर देते हैं.
कई पत्रकार निजी तौर पर यह दावा भी करते हैं कि वह मोदी के आलोचकों का पूरा कच्चा चिट्ठा रखते हैं, उनके पोस्ट, काम करने के तरीकों और यहां तक कि उनके निजी जीवन पर भी नज़र रखते हैं. यह भी एक खुला सच है कि जोशी भाजपा के ‘आईटी सेल’ की कमान संभालते हैं- ऐसी डिजिटल ‘ट्रोल सेना’ जो सोशल मीडिया ट्रेंड्स को प्रभावित करने, असहमति की आवाजों को दबाने और असुविधाजनक तथ्यों को शोर-शराबे के नीचे कुचलने के लिए जानी जाती है.
नवंबर में जोशी को लेकर चर्चाएं तब शुरू हुईं जब अचानक विधि आयोग से हितेश जैन ने इस्तीफा दे दिया. उनके इस्तीफे की आधिकारिक पुष्टि तो हुई, लेकिन इसका कोई कारण नहीं बताया गया.
पत्रकार सिरिल सैम और परंजॉय गुहा ठाकुरता की किताब ‘द रियल फेस ऑफ फेसबुक‘ के अनुसार, 2009 से ही जोशी और जैन करीबी सहयोगी रहे हैं. जैन ‘ब्लूक्राफ्ट डिजिटल फाउंडेशन‘ से जुड़े हैं. इस फाउंडेशन का संबंध ‘द ट्रू पिक्चर‘ नामक एक वेबसाइट से रहा है, जिस पर भ्रामक खबरें (डिसइंफॉर्मेशन) फैलाने के आरोप लगे हैं.
इसी संस्था ने मोदी द्वारा लिखी गई किताबें प्रकाशित की हैं और 24×7 मोदी का प्रचार करने वाले ‘नमो टेलीविजन‘ के लिए चुनावी वीडियो तैयार किए.
इस मामले पर ‘द वायर’ द्वारा भेजे गए ईमेल का जैन ने कोई जवाब नहीं दिया.
इसके बाद प्रसार भारती में हलचल 2 दिसंबर को एक और बड़ी खबर आई जब पूर्व आईएएस अधिकारी नवनीत सहगल ने प्रसार भारती बोर्ड अध्यक्ष पद से अचानक इस्तीफा दे दिया. देश का लोक प्रसारक प्रसार भारती ही ऑल इंडिया रेडियो (आकाशवाणी) और दूरदर्शन को चलाता है.
नाम न छापने की शर्त पर एक पत्रकार ने इस बात की पुष्टि की है कि सहगल ही जोशी के चहेते पत्रकार सुधीर चौधरी की भारी-भरकम सैलरी पैकेज पर ‘डीडी न्यूज’ के एडिटर-इन-चीफ के बतौर नियुक्ति के ज़िम्मेदार थे.
इसके बाद यह चर्चा जल्द ही सोशल मीडिया से निकलकर संसद तक पहुंच गई, जहां कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी ने सार्वजनिक रूप से पीएमओ से इस पर जवाब मांगा.
इधर, सोशल मीडिया पर यह मामला और उलझता गया; कुछ लोगों का दावा था कि जोशी को चुपचाप बाहर का रास्ता दिखा दिया गया है, जबकि कुछ का कहना था कि उन्हें वापस बहाल कर दिया गया है.
कांग्रेस के एक नेता ने नाम गोपनीय रखने की शर्त पर बताया कि अटकलें इतनी बढ़ गईं कि एक नई थ्योरी सामने आई- कहा गया कि उत्तर प्रदेश में जनसंपर्क (पीआर) संकटों को संभालने के लिए मशहूर नवनीत सहगल ने शायद खुद इस्तीफा दिया है ताकि वे पीएमओ में किसी बड़ी भूमिका के लिए उपलब्ध हो सकें. ‘
द प्रिंट ने सहगल के इस्तीफे की खबर देते हुए उन्हें यूपी सरकार का ‘ट्रबलशूटर’ (संकटमोचक) बताया था, जो अपने मीडिया मैनेजमेंट कौशल के लिए जाने जाते हैं.
सहगल ने भी इस संबंध में ‘द वायर’ द्वारा मुलाकात के लिए भेजे गए मैसेज का कोई जवाब नहीं दिया.
देश के विभिन्न संस्थानों के पत्रकारों का कहना है कि जोशी को लेकर एक अलिखित समझ बनी हुई है. जो लोग उनकी बात नहीं मानते, उनकी नौकरी पर खतरा रहता है, जबकि उनकी बात मानने वालों को फायदा मिलता है. एक पत्रकार ने बताया कि जोशी के प्रति वफादार मानी जाने वाली एक न्यूज़ एंकर को उस वक़्त कथित इनाम मिला, जब उनके पति (जो एक वरिष्ठ अधिकारी हैं) को दिल्ली-एनसीआर में मनचाही पोस्टिंग दी गई.
अपने लेख ‘सेंडिंग माई सन टू एक्साइल’ में तवलीन सिंह- जो खुलकर मोदी का समर्थन करती रही हैं- ने लिखा था कि जब उनके बेटे- पत्रकार आतिश तासीर का ‘ओवरसीज सिटीजन ऑफ इंडिया’ (ओसीआई) कार्ड रद्द किया गया, तो शुरुआत में उन्हें लगा कि केंद्र सरकार से कोई गलतफहमी हुई है. उन्होंने इसे सुलझाने के लिए गृह मंत्रालय से संपर्क करने की कोशिश की.
तवलीन सिंह ने लिखा, ‘हालांकि, गृह मंत्रालय या पीएमओ में हिरेन जोशी से संपर्क करने की बार-बार की गई कोशिशें बेकार रहीं.’
उन्होंने 2019 में लिखा था, ‘तब मुझे अहसास हुआ कि ऊपर बैठा कोई बहुत ताक़तवर व्यक्ति आतिश से बदला लेना चाहता है. मेरे मन के किसी कोने में यह डर तभी से घर कर गया था, जब आतिश ने ‘टाइम‘ मैगजीन में वह लेख लिखा था, जिसे पत्रिका ने अपने कवर पर नरेंद्र मोदी के फोटो के साथ ‘डिवाइडर इन चीफ’ लिखकर छापा था.’
आलोचकों का दावा है कि जोशी कभी संरक्षण देने, तो कभी सजा देने का जो रवैया अपनाते हैं, उससे भारतीय पत्रकारों ने यह समझ लिया है कि किस तरह की रिपोर्टिंग पर उन्हें इनाम मिलेगा और किस पर सजा.
भाजपा के वरिष्ठ नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने एक ट्वीट में इसी बात को इस तरह कहा था कि मोदी ने पीएमओ के हिरेन जोशी के जरिये मीडिया का मुंह बंद करने की कोशिशों ने मीडिया को ‘पावलोव के कुत्ते’ की तरह आज्ञाकारी बना दिया है. (मनोवैज्ञानिक इवान पावलोव के प्रयोग में कुत्तों को इस तरह प्रशिक्षित किया गया था कि वे बिना सोचे-समझे विशेष संकेत पर प्रतिक्रिया देते थे.)
2017 की शुरुआत में ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संपादक शिशिर गुप्ता द्वारा हिरेन जोशी को भेजा गया एक ईमेल आरटीआई के जरिए सार्वजनिक हुआ था, जिसकी सब्जेक्ट लाइन थी— KEJRIWAL AGAINST CENTRE यानी केंद्र के खिलाफ केजरीवाल. इसमें गुप्ता ने दिल्ली के तत्कालीन मुख्यमंत्री द्वारा लिए गए नौ विशिष्ट फैसलों की सूची देते हुए उन्हें ‘केजरीवाल द्वारा नियमों का उल्लंघन’ बताया था.
‘फ्रंटलाइन’ पत्रिका ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि यह ईमेल इस तरह लिखा गया था कि इसमें भाजपा अध्यक्ष या पीएमओ से कोई जवाब नहीं मांगा गया था, बल्कि केवल जानकारी उन तक पहुंचाई गई थी.
इसके बाद 2022 में अरविंद केजरीवाल ने जोशी के हस्तक्षेप के बारे में खुलकर बात की. उन्होंने आरोप लगाया कि जोशी मीडिया संस्थानों को गाली-गलौज भरे मैसेज भेजते हैं और न्यूज़ चैनलों के मालिकों व संपादकों को चेतावनी देते हैं कि वे आम आदमी पार्टी को कवरेज न दें.
कैसे जोशी के हाथ आया पूर्ण नियंत्रण
जोशी हमेशा से मोदी के करीबी रहे थे, फिर भी उन्हें पीएमओ में अपनी जगह बनाने के लिए संघर्ष करना पड़ा. 2014 में जब मोदी गुजरात से दिल्ली आए, तो उन्होंने मीडिया सलाहकार नियुक्त करने का कोई संकेत नहीं दिया. पत्रकार कूमी कपूर लिखती हैं, ‘इसके बजाय बेहद विनम्र और शांत स्वभाव के 70 वर्षीय पूर्व सूचना अधिकारी, जगदीश ठक्कर को गांधीनगर से दिल्ली बुलाया गया ताकि वे मोदी के जनसंपर्क अधिकारी (पीआरओ) का काम संभाल सकें.’
उन्होंने आगे बताया, ‘गुजरात में मोदी का मीडिया मॉडल ‘हमें फोन मत करो, हम तुम्हें फोन करेंगे’ के नियम पर काम करता था. मीडिया को केवल वही जानकारी दी जाती थी जो सीएम चाहते थे, लेकिन ऑफ-द-रिकॉर्ड बातचीत, विशेष जानकारी की मांग, या मुख्यमंत्री कार्यालय और सचिवालय जाने की अनुमति को हतोत्साहित किया जाता था.’
जहां ठक्कर प्रेस विज्ञप्तियों का काम देखते थे, वहीं मोदी के ट्विटर अकाउंट की जिम्मेदारी जोशी के पास थी. पत्रकार धीरेंद्र के. झा ने बताते हैं कि ठक्कर और जोशी के बीच खासी प्रतिस्पर्धा और एक तरह की ‘ईगो वॉर’ (अहं का टकराव) चल रही थी. दोनों ही प्रधानमंत्री की छवि बनाने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार थे: ठक्कर पारंपरिक मीडिया (अखबार, टीवी आदि) में और जोशी इंटरनेट पर.
वो लिखते हैं, ‘…मोदी के तहत पीएमओ लगातार प्रेस रिलीज और उन पर आधारित एसएमएस संदेश जारी कर रहा था. ये जानकारी इतनी तेजी से और इतनी ज्यादा मात्रा में भेजी जा रही थी कि अक्सर तालमेल की कमी नजर आती है. ऐसा सुना जाता है कि ठक्कर और जोशी इन गलतियों के लिए एक-दूसरे को जिम्मेदार ठहराते थे.’
2018 में ठक्कर के निधन के बाद जोशी साउथ ब्लॉक (पीएमओ) में मोदी के लिए सबसे महत्वपूर्ण और विश्वसनीय व्यक्ति बन गए.
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में जोशी का अधिकारक्षेत्र केवल सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) और सोशल मीडिया तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उससे कहीं आगे बढ़ गया. इस काम में नीरव शाह और यश राजीव गांधी जैसे दो युवा पेशेवरों ने उनकी मदद की. यह जोशी ही थे जिन्होंने मोदी को सोशल मीडिया पर दुनिया के सबसे लोकप्रिय और ‘फॉलो’ किए जाने वाले राजनेताओं में से एक बनाया.
कई जानकार बताते हैं कि जोशी का जुड़ाव राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) परिवार से रहा है जो पुणे के रहने वाले हैं और इलेक्ट्रॉनिक्स इंजीनियर रहे हैं. उन्होंने ग्वालियर के भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी और प्रबंधन संस्थान (आईआईआईटीएम) से पीएचडी की डिग्री हासिल की है. राजनीति में आने से पहले जोशी ने लगभग 18 वर्षों तक राजस्थान के भीलवाड़ा स्थित ‘माणिक्य लाल वर्मा टेक्सटाइल एंड इंजीनियरिंग कॉलेज‘ में असिस्टेंट प्रोफेसर के तौर पर पढ़ाया था.
जोशी के जीवन में बड़ा बदलाव 2008 में आया, जब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी कंप्यूटर इंजीनियरों के एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे. पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपनी किताब ‘2014: द इलेक्शन दैट चेंज्ड इंडिया‘ में इसका ज़िक्र किया है:
कार्यक्रम के दौरान एक तकनीकी खराबी आ गई जिससे कार्यक्रम रुक गया- तभी जोशी आगे आए और उन्होंने तुरंत उसे ठीक कर दिया. उनके कौशल से मोदी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने जोशी को अपना ‘ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी’ (ओएसडी) चुन लिया. उस पल के बाद से जोशी मोदी की डिजिटल मौजूदगी- उनके सोशल मीडिया व तकनीकी रणनीति की पूरी जिम्मेदारी संभाल ली. उन्होंने न केवल मोदी की डिजिटल छवि गढ़ी, बल्कि गुजरात में मोदी की उत्तराधिकारी आनंदीबेन पटेल की वेबसाइट का काम भी देखा.
ऐसी चर्चाएं हैं कि जोशी हर सुबह मोदी से मिलते हैं और उन्हें देश के सोशल मीडिया पर चल रही चर्चाओं का सार देते हैं. वे न केवल ताज़ा अपडेट लाते हैं, बल्कि देश भर के पार्टी कार्यकर्ताओं और आम लोगों की आवाज़ भी उन तक पहुंचाते हैं. वे एनालिटिकल टूल्स की मदद से प्रधानमंत्री के पूरे दिन की रूपरेखा तैयार करते हैं. जब भी मोदी चुनाव प्रचार पर निकलते हैं या किसी अंतरराष्ट्रीय दौरे पर होते हैं, जोशी लगभग हमेशा उनके साथ होते हैं.
राजदीप सरदेसाई ने अपनी किताब में ज़िक्र किया है कि मोदी इस बात से इतने वाकिफ रहते थे कि ट्विटर पर लोग क्या कह रहे हैं कि जब सरदेसाई की पत्नी और तत्कालीन सहकर्मी सागरिका घोष ने मोदी की पत्नी के बारे में ट्वीट किया, तो मोदी ने फोन पर सरदेसाई से कहा, ‘अरे, तुम और तुम्हारी बीवी आज कल बहुत ट्विटर पे हो!’ घोष के उन ट्वीट्स के कारण उन्हें सीएनएन-आईबीएन चैनल के प्रबंधन से फटकार भी सुननी पड़ी थी. उनसे कहा गया था कि वे ट्विटर पर मोदी की आलोचना न करें.
‘द वायर’ से बात करते हुए पत्रकार परंजॉय गुहा ठाकुरता ने हिरेन जोशी के बारे में कहा, ‘मैं हिरेन जोशी से कभी मिला नहीं लेकिन मेरे पास यह मानने की वजहें हैं कि हाल तक वे भारत के सबसे ताकतवर व्यक्तियों में से एक थे. भाजपा आईटी सेल का यह पूरा इकोसिस्टम अमित मालवीय नहीं चलाया जाता, बल्कि इसके मास्टरमाइंड हिरेन जोशी हैं. मुझे पता है कि वे उन न्यूज़ चैनलों के एंकरों से संपर्क करते थे जो सरकार का समर्थन करते हैं- जिन्हें पत्रकार रवीश कुमार ‘गोदी मीडिया’ कहते हैं.’
दो दशकों से अधिक का अनुभव रखने वाले एक वरिष्ठ संपादक ने टीवी न्यूज़ पर जोशी के प्रभाव को याद करते हुए बताते हैं, ‘कोरोना महामारी के दौरान तबलीगी जमात को लेकर जो सनसनी फैलाई गई और ‘कोरोना जिहाद’ जैसे भड़काऊ शब्दों का प्राइमटाइम शो में बार-बार इस्तेमाल किया गया- मेरी राय में वो नैरेटिव ऊपर से आया था.’
उन्होंने आगे कहा, ‘आज की तारीख में यह बात कोई राज़ नहीं है कि हिंदी और अंग्रेजी दोनों भाषाओं के चैनलों के कई संपादकों को हफ़्तों तक पीएमओ से ऐसे वॉट्सऐप मैसेज मिलते थे, जिनमें मुस्लिम समुदाय पर ज़्यादा फोकस करने को कहा जाता था.’
मुख्यधारा के अधिकांश टीवी चैनलों पर हफ़्तों तक चले इस उन्माद ने तबलीगी जमात की घटना को एक सांप्रदायिक रंग दिया, जिससे अक्सर पूरे मुस्लिम समुदाय को बढ़ते कोविड मामलों के लिए जिम्मेदार ठहराया गया. इस कवरेज के दूरगामी सामाजिक परिणाम हुए और बाद में अदालतों, शिक्षाविदों और प्रेस निकायों ने इसकी कड़ी आलोचना की.
इन्हीं संपादक ने आगे दावा किया कि यही तरीका कुछ महीनों बाद 2020 के बिहार चुनाव के दौरान फिर से दिखाई दिया, जब अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत की मौत के बाद राजनीतिक माहौल गरमाया हुआ था. संपादक ने आरोप लगाया, ‘चुनावी फायदे के लिए जोशी ने सुशांत की पार्टनर रिया चक्रवर्ती के खिलाफ विच-हंट चलवाया.’
टीवी पर दो महीने तक चली इन सनसनीखेज ख़बरों ने मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे को राष्ट्रीय तमाशे में तब्दील कर दिया, जिसके कारण नियामक संस्थाओं और न्यायपालिका ने मीडिया को कड़ी फटकार लगाई.
ठाकुरता ने अपनी किताब में लिखा है कि जोशी ने न केवल भाजपा के आईटी सेल की देखरेख की, बल्कि बड़ी टेक कंपनियों पर भी पकड़ बनाए रखी. साल 2020 में जब भाजपा के प्रति पक्षपात के आरोपों के बीच फेसबुक की पब्लिक पॉलिसी हेड आंखी दास ने इस्तीफा दिया, तब शिवनाथ ठुकराल को भारत और दक्षिण एशिया का प्रमुख बनाया गया. उनकी इस नियुक्ति ने मीडिया जगत में सबको चौंकाया, क्योंकि वे इससे पहले ‘ओपालिना टेक्नोलॉजीज़‘ (Opalina Technologies) से जुड़े रहे थे- यह वही कंपनी है जिसने प्रधानमंत्री मोदी, पीएमओ, भाजपा और केंद्रीय कपड़ा मंत्रालय के लिए डिजिटल टूल्स तैयार किए थे.
ठुकराल हाल के महीनों तक मेटा (फेसबुक की मूल कंपनी) में बतौर वाइस प्रेसिडेंट (पब्लिक पॉलिसी) जुड़े हुए थे, लेकिन बताया जाता है कि उन्होंने अतीत में सालों जोशी के साथ मिलकर काम किया था. यह राजनीतिक और कॉरपोरेट प्रभाव के इस तंत्र को और भी रहस्यमयी बनाता है.
‘द वायर’ ने मेटा से ठुकराल की भूमिका, वरिष्ठ अधिकारियों के साथ उनके संबंधों के साथ यह भी पूछा था कि क्या केंद्र सरकार किसी खास तरह के कंटेंट को बढ़ावा देना चाहती है. इसके जवाब में मेटा के प्रवक्ता ने एक पुराने बयान का हवाला देते हुए कहा, ‘ये पुराने मुद्दे लगते हैं जिन पर हम बार-बार सार्वजनिक रूप से स्पष्टीकरण दे चुके हैं.’
पुराने रिश्तों, राजनीतिक नजदीकी और टेक प्लेटफॉर्मों के प्रभाव का यह खेल 2025 में एक के बाद एक हुए कई इस्तीफों के साथ ख़त्म होता नजर आने लगा. हितेश जैन और नवनीत सहगल के इस्तीफों से पहले ठुकराल ने भी मेटा छोड़ दिया.
दिल्ली में करीब डेढ़ दशक का अनुभव रखने वाले एक नेता कहते हैं, ‘चीजें ऑपरेशन सिंदूर के बाद से ख़राब होना शुरू हुईं.’
इस साल अप्रैल में कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमलों में 26 लोगों की मौत के बाद भारत ने 7 मई को ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ शुरू किया था, जिसके तहत पाकिस्तान के भीतर कई ठिकानों पर समन्वित हमले किए गए. दोनों देशों द्वारा नियंत्रण रेखा पर सेना तैनात करने से तनाव तेज़ी से बढ़ा. इसके चार दिन बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर दावा किया कि उन्होंने निजी तौर पर भारत और पाकिस्तान के बीच शांति समझौता कराया है- इस घोषणा से तुरंत विवाद खड़ा हो गया.
‘ऑपरेशन सिंदूर’ के इर्द-गिर्द मीडिया मैनेजमेंट ने भारत सरकार को काफी शर्मिंदा किया. मुख्यधारा के मीडिया ने बड़े पैमाने पर यह शोर मचाया कि भारत ने कराची और लाहौर पर कब्जा कर लिया है, जिससे न केवल वैश्विक स्तर पर भारत की छवि प्रभावित हुई, बल्कि युद्ध के बीच झूठी मीडिया खबरों के कारण सशस्त्र बल भी परेशान हुए.
नाम न छापने की शर्त पर एक नेता ने कहा, ‘नरेंद्र मोदी के लिए उनकी ‘विश्वगुरु’ वाली छवि बहुत महत्वपूर्ण है. हिरेन जोशी ने 2014 से मोदी की हाई-प्रोफाइल डिप्लोमेसी के जरिए इसे बहुत मेहनत से तैयार किया था: विदेश में प्रवासी भारतीयों के बड़े कार्यक्रम, भारत को दुनिया की समस्याओं के समाधानकर्ता के तौर पर पेश करना, योगा डिप्लोमेसी, कोविड के दौरान वैक्सीन डिप्लोमेसी और 2023 में जी-20 की भव्य मेजबानी. इसने मोदी को केवल भारत के प्रधानमंत्री के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक विमर्श को आकार देने वाले कद्दावर नेता के रूप में प्रोजेक्ट किया था.’
हालांकि, इस पूरी सावधानी से बनाई गई छवि को तब गहरा झटका लगा जब ट्रंप ने बार-बार यह दावा करना शुरू किया कि उन्होंने ही सीजफायर करवाया है. भले ही भारत सरकार ने किसी भी तरह की विदेशी मध्यस्थता से साफ इनकार किया, लेकिन ट्रंप के इस दावे ने एक अलग छवि तो गढ़ ही दी. मोदी के आलोचकों और मीडिया ने सवाल उठाया कि अगर भारत असल में ‘विश्वगुरु’ था, तो उसे ऐसे बड़े राष्ट्रीय संकट के समय उसे बाहरी हस्तक्षेप की जरूरत क्यों पड़ी?
नतीजा यह हुआ कि सोशल मीडिया पर मानो एक अलग ही जंग छिड़ गई, जहां ट्रोल नेटवर्क और अंतरराष्ट्रीय टिप्पणियों ने ऐसा माहौल बना दिया कि भारत की रणनीतिक स्वायत्तता से समझौता किया गया है. अप्रत्याशित विदेशी दावे और सूचनाओं के इस खींचातानी ने मोदी की ‘विश्वगुरु’ वाली छवि खासा प्रभावित किया.
ऊपर जिन नेता का उल्लेख है, उन्होंने आगे कहा, ‘मोदी ने इसका ठीकरा जोशी पर फोड़ा. उनका ‘संकटमोचक’ उस संकट को संभाल नहीं सका. पहले ही 2024 के चुनावों के बाद से मोदी की छवि, जिसकी वे बेहद परवाह करते हैं, प्रभावित हो चुकी थी. हिरेन जोशी मोदी के ‘तानाशाही रवैये‘ वाली छवि को भी नहीं बदल सके थे. ‘विश्वगुरु’ की छवि का बिखरना उनके लिए मानो ताबूत में आखिरी कील-सा साबित हुआ. इसके बाद से पीएमओ में जोशी की जिम्मेदारियां कम कर दी गईं.’
एक अनौपचारिक बातचीत में एक पूर्व पत्रकार बताते हैं, ‘तब मोदी के पीएमओ में कार्यरत एक और ओएसडी प्रतीक दोषी ने मौके का फायदा उठाया. दोषी पहले पीएमओ के रिसर्च और स्ट्रेटेजी विंग का जिम्मा संभालते थे. जब उन्हें मीडिया का पोर्टफोलियो सौंपा गया, तो जोशी और दोषी के बीच खींचतान बढ़ गई.’ गौरतलब है कि प्रतीक दोषी मोदी सरकार की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के दामाद हैं.
‘द वायर’ द्वारा रजिस्टर्ड डाक से भेजे गए विस्तृत सवालों पर प्रतीक दोषी और पीएमओ की तरफ से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी गई.
देश के एक प्रमुख नेता के साथ काम करने वाले एक वरिष्ठ राजनीतिक सलाहकार ने भी एक ऑफ-द-रिकॉर्ड साक्षात्कार में पीएमओ के भीतर चल रही इस खींचतान की पुष्टि की. उन्होंने कहा, ‘इस बारे में मुझे जो आखिरी बात मालूम चली थी वो यह थी कि 13 नवंबर हिरेन का काम का आखिरी दिन होना था. उन्होंने अपनी जिम्मेदारियां दूसरे लोगों को सौंपना शुरू कर दिया था. मुझे तो लगता है कि उन्हें वापस गुजरात भेजा जा रहा था. चूंकि वे इतने ताकतवर व्यक्ति हैं, इसलिए उन्हें अचानक पूरी तरह हटाया नहीं जा सकता था. उन्हें कहीं न कहीं तो जगह देनी ही थी. मेरा मानना है कि मोदी उन्हें राज्यसभा या ऐसी ही किसी जगह भेज देते. यह सब बहुत शांति से चल रहा था.’
वे आगे जोड़ते हैं, ‘लेकिन कहीं कुछ गड़बड़ हो गई. नवंबर के पहले हफ्ते में हिरेन के डिमोशन की खबरें उड़ने लगीं. आखिरकार, मोदी पर दबाव बनाने के लिए किसी ने संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान ही हिरेन जोशी के बारे में जानकारी लीक कर दी. अब मुझे लगता है कि मोदी उन्हें उतनी आसानी से नहीं हटा सकते जितना उन्होंने सोचा था. राजनीतिक चर्चाएं रुकने तक उन्हें हिरेन को कुछ समय और रखना होगा. यहां तक कि अब हिरेन को साथ बनाए रखना भी मुश्किल हो गया है. उनका भेद खुल चुका है और अब वे सार्वजनिक चर्चा का विषय बन चुके हैं.’
‘द वायर’ ने विस्तृत प्रतिक्रिया के लिए हिरेन जोशी से रजिस्टर्ड डाक और वॉट्सऐप के जरिये संपर्क किया है. यदि उनका कोई जवाब आता है, तो इस खबर में जोड़ा जाएगा.
पूर्व पत्रकार जिन्होंने 2023 से हिरेन जोशी के काम को करीब से देखा है, उन्होंने सट्टेबाजी घोटाले से जुड़े के आरोपों को लेकर कहा, ‘भ्रष्टाचार के कारण मोदी के उन्हें बाहर निकालने की बात बचकाना आरोप लगता है. अगर ऐसा होता, तो उन्हें पीएमओ के हर आदमी को बाहर निकालना पड़ता! पीएमओ में कोई भी व्यक्ति प्रधानमंत्री तक पहुंच दिलाने जैसे बुनियादी काम के लिए भी ठीक-ठाक पैसा बना सकता है. हालांकि, मुझे लगता है कि पीएमओ के भीतर जोशी के खिलाफ दबी हुई ईर्ष्या या जलन थी. वे मोदी के बेहद करीब थे और उनकी बातों का उन पर गहरा असर था. यहां तक कि अन्य मंत्रालयों के वरिष्ठ सरकारी अधिकारी भी मजाक में कहते थे कि कैसे संयुक्त सचिव रैंक का एक अधिकारी प्रधानमंत्री के जरिए कोई भी काम इतनी आसानी से करवा लेता है. एक वक़्त ऐसा भी था जब जोशी पीएमओ के सभी 70 से 80 अधिकारियों के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकते थे. जोशी बहुत शक्तिशाली थे और उनकी शक्ति का राज़ यही था कि वे किसी ओपन सीक्रेट की तरह मौजूद थे.’
उन्होंने आगे कहा, ‘गोपनीयता बनाए रखना मोदी के वरिष्ठ अधिकारियों की रणनीति होती है. जब शीर्ष पर कोई तानाशाह बैठा हो, तो सबसे अच्छा यही होता है कि आप खुद को बहुत प्रमुख या चर्चित न होने दें. पीएमओ में हर कोई सुर्खियों से दूर रहने की कोशिश करता है. सार्वजनिक रूप से सामने आना किसी के भी हित में नहीं होता.’
(सृष्टि जसवाल स्वतंत्र पत्रकार हैं.)
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