नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा केंद्र सरकार द्वारा अरावली की पहाड़ियों के लिए दी गई नई परिभाषा को स्वीकारे जाने के बाद से 4 राज्यों के बीच लगभग 700 किलोमीटर तक फैली अरावली के अस्तित्व को लेकर चिताएं बनी हुई हैं. नई परिभाषा के हिसाब से ज़मीन से कम से कम 100 मीटर ऊंचे हिस्से को ही अरावली पहाड़ी मानी जाएगी.
इसे लेकर राजस्थान में बड़ी संख्या में लोग केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट के इस फ़ैसले के खिलाफ सड़कों पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं.
इसी बीच सोमवार (22 दिसंबर) को अरावली विरासत जन अभियान ने बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई अरावली पर्वतमाला की एक समान (यूनिफ़ॉर्म) परिभाषा को लेकर सरकार की हालिया सफ़ाई पर गंभीर सवाल उठाए हैं.
बयान में कहा गया है: हमारी पहली चिंता यह है कि केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव द्वारा दिए गए वीडियो बयान और 21 दिसंबर को भारतीय जनता पार्टी द्वारा जारी आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति में दी गई जानकारी के बीच स्पष्ट विरोधाभास है.
भाजपा की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है, ‘वर्तमान में अरावली क्षेत्र 37 ज़िलों में फैला हुआ है. इसका कुल क्षेत्रफल लगभग 1.44 लाख वर्ग किलोमीटर है, जो 37 ज़िलों में विस्तृत है. इनमें से अकेले राजस्थान के 20 ज़िलों में यह पर्वतमाला फैली हुई है. कुल भौगोलिक क्षेत्र का केवल 0.19 प्रतिशत, यानी 277.89 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र ही वैध खनन पट्टों के अंतर्गत है.’
वहीं, केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने अपने वीडियो बयान में कहा, ‘अरावली का कुल क्षेत्रफल 1,47,000 वर्ग किलोमीटर है. कुल 39 अरावली ज़िले हैं. इनमें से केवल 217 वर्ग किलोमीटर, यानी 2 प्रतिशत क्षेत्र में खनन हो सकता है. पहाड़ियों को नीचे से ऊपर तक 100 मीटर ऊंचाई तक संरक्षित किया जाएगा.’
अरावली विरासत जन अभियान ने केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव से पारदर्शिता की मांग करते हुए पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय से निम्नलिखित स्पष्टीकरण और जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की है:
1) दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और गुजरात, इन चार अरावली राज्यों में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अनुसार अरावली ज़िलों की वास्तविक संख्या क्या है और उनके नाम क्या हैं?
2) फारेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया (एफएसआई) की परिभाषा के अनुसार कुल कितनी पहाड़ियां अरावली मानी जाएंगी? 20 नवंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार की गई नई 100 मीटर की परिभाषा के अनुसार कितनी पहाड़ियां अरावली मानी जाएंगी? दोनों परिभाषाओं के तहत अरावली का कुल क्षेत्रफल कितना होगा?
चूंकि एफएसआई के पास पहले से ही राजस्थान के 15 ज़िलों का डेटा उपलब्ध है, इसलिए इन 15 ज़िलों के लिए नई 100 मीटर की परिभाषा और एफएसआई परिभाषा, दोनों के तहत पहाड़ियों की संख्या और अरावली क्षेत्रफल से संबंधित आंकड़े तत्काल सार्वजनिक किए जाएं.
3) क्या केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री यह आश्वासन दे सकते हैं कि अरावली का हिस्सा होने की स्थिति में, पहाड़ियों की ऊंचाई चाहे जो भी हो, सभी पहाड़ियों को संरक्षण प्रदान किया जाएगा?
अरावली विरासत जन अभियान की दूसरी चिंता यह है कि सरकारी ‘प्रेस विज्ञप्ति की शुरुआत में अरावली को केवल ऐतिहासिक और सांस्कृतिक स्थलों से भरा हुआ क्षेत्र बताया गया है. अरावली के परिचय में इसकी समृद्ध जैव विविधता, जंगलों, नदियों, जलधाराओं और उन समुदायों का कोई उल्लेख नहीं है, जो अरावली पर निर्भर हैं. यह हैरान करने वाला है कि दुनिया की सबसे पुरानी पर्वतमाला को केवल किलों, मंदिरों, मीनारों और सांस्कृतिक स्थलों के संदर्भ में ही वर्णित किया गया है.’
संगठन का तीसरा बिंदु यह है कि ‘केंद्रीय मंत्री भूपेंद्र यादव यह कह रहे हैं कि 20 नवंबर के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से अरावली का 90 प्रतिशत से अधिक हिस्सा प्रभावित नहीं होगा. यदि ऐसा है, तो अरावली विरासत जन अभियान मांग करता है कि पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय गुजरात, राजस्थान और हरियाणा के प्रत्येक अरावली ज़िले के हर ब्लॉक में, ग्रामीण और शहरी आबादी के साथ तत्काल परामर्श आयोजित करे और लोगों को यह स्पष्ट करे कि अरावली की नई परिभाषा अरावली के संरक्षण और सुरक्षा को मज़बूत करेगी.’
अशोक गहलोत ने केंद्र सरकार पर झूठ बोलने का आरोप लगाया
इस बीच राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने सोमवार (22 दिसंबर) को केंद्र सरकार पर पर्यावरणीय सुरक्षा को कमजोर करने और संवेदनशील अरावली पर्वतमाला में खनन का रास्ता खोलने के लिए एक ‘सुनियोजित साज़िश’ रचने का आरोप लगाया है.
गहलोत ने कहा कि अरावली की परिभाषा को ‘100 मीटर’ के मानक से दोबारा तय करने के सरकार के कदम को अलग-थलग करके नहीं देखा जा सकता. उन्होंने कहा, ‘यह संस्थाओं पर कब्ज़ा करने और अरावली को खनन माफिया के हवाले करने की एक बड़ी योजना का हिस्सा है.’
उन्होंने केंद्र के कुछ बड़े कदमों के बारे में कहा कि वे उनके ‘असल एजेंडा’ को उजागर करते हैं. और केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव के इस दावे को कि अरावली का केवल 0.19 प्रतिशत हिस्सा ही खनन के लिए खुलेगा, ‘भ्रामक और तथ्यात्मक रूप से गलत’ बताया.
श्री @byadavbjp जी, ‘संरक्षित क्षेत्र’ के नाम पर अरावली में केवल 0.19% नई माइनिंग का झूठ मत बोलिए।
जून, 2025 में आप सरिस्का का ‘संरक्षित क्षेत्र’ बदलकर खनन शुरू करना चाहते थे। अब इसी ‘सरिस्का मॉडल’ पर ही भविष्य में बाकी अरावली का संरक्षित क्षेत्र बदलेगा? #SaveAravalli pic.twitter.com/bFh5eM3CyG
— Ashok Gehlot (@ashokgehlot51) December 22, 2025
गहलोत के अनुसार पहला कदम 5 सितंबर 2023 की वह अधिसूचना थी, जिसके तहत केंद्रीय अधिकार प्राप्त समिति (सीईसी) को पर्यावरण मंत्रालय के अधीन कर दिया गया और उसकी स्वतंत्रता खत्म कर दी गई.
उन्होंने कहा, ‘2002 में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में वनों की सुरक्षा के लिए गठित सीईसी को अब सरकार की कठपुतली बना दिया गया है. पहले इसके सदस्यों की नियुक्ति कोर्ट की मंज़ूरी से होती थी, आज केंद्र सरकार नियुक्तियों को नियंत्रित कर रही है, जिससे सीईसी महज़ एक रबर स्टैंप बनकर रह गई है.’
