अख़लाक़ लिंचिंग: आरोपियों के ख़िलाफ़ केस वापस लेने की यूपी सरकार की याचिका ख़ारिज

उत्तर प्रदेश की एक अदालत ने मंगलवार को 2015 के मोहम्मद अख़लाक़ लिंचिंग मामले में सभी आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे वापस लेने संबंधी राज्य सरकार की याचिका खारिज़ कर दी है. कोर्ट ने कहा कि याचिका का कोई ठोस क़ानूनी आधार नहीं था. उधर, अख़लाक़ के परिवार के वकील युसूफ सैफी ने इसे इंसाफ कहा है.

(फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: उत्तर प्रदेश की एक अदालत ने मंगलवार (23 दिसंबर) को 2015 के मोहम्मद अख़लाक़़ लिंचिंग मामले में सभी आरोपियों के ख़िलाफ़ चल रहे मुक़दमे वापस लेने संबंधी राज्य सरकार की याचिका खारिज़ कर दी है.

इस संबंध में अख़लाक़ के परिवार के वकील युसूफ सैफी ने द वायर को बताया, ‘आज माननीय अदालत ने परिवार के साथ इंसाफ किया है. कोर्ट ने सरकार की किसी भी दलील को सही नहीं मानते हुए इस मामले में सरकार की ओर से केस वापसी की लगाई गई अर्जी को निरस्त कर दिया है.

युसूफ सैफी ने आगे बताया, ‘कोर्ट ने इस मामले में कहा कि सरकार के जो नुमाइंदे हैं, सरकारी वकील साहब उन्होंने जो भी केस वापसी को लेकर ग्राउंड दिए हैं, वे आधारहीन और गलत हैं. क्योंकि सरकारी वकील ने खुद माना है की मौका-ए-वारदात से लाठी डंडे बरामद किए गए थे और अख़लाक़ के परिवार की किसी भी अभियुक्त के साथ पहले से कोई दुश्मनी या रंजिश नहीं थी. इस मामले में गवाही भी हो चुकी है. ऐसे में ये पूरा मामला ही कहीं नहीं टिकता.’

युसूफ सैफी ने ये भी कहा कि इस मामले में परिवार ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के सामने भी अर्जी दाखिल की है, जिसे अब वापस ले लिया जाएगा.

इंडिया टुडे के अनुसार, सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि याचिका में कोई दम नहीं था और उसका कोई ठोस कानूनी आधार नहीं था.

अदालत ने यह भी स्पष्ट करते हुए कि मामले में ट्रायल जारी रहेगा यह निर्देश दिया कि अब मामले की सुनवाई रोज़ाना होगी. उसने अभियोजन पक्ष को गवाहों के बयान रिकॉर्ड करने की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया. कोर्ट ने पुलिस कमिश्नर और डिप्टी कमिश्नर ऑफ पुलिस (ग्रेटर नोएडा) को भी निर्देश दिया कि अगर ज़रूरत हो तो गवाहों को पर्याप्त सुरक्षा दी जाए.

अदालत ने अगली सुनवाई के लिए 6 जनवरी की तारीख तय की है.

मालूम हो कि गौतमबुद्ध नगर के दादरी क्षेत्र के बिसाहड़ा गांव के रहने वाले 52 वर्षीय मोहम्मद अखलाक की 28 सितंबर, 2015 को भीड़ ने कथित तौर पर इस संदेह में पीट-पीटकर हत्या कर दी थी कि उन्होंने अपने घर में गोमांस रखा है. उनकी लिंचिंग ने मोदी सरकार के दशक में भीड़ द्वारा हिंसा की कई घटनाओं की नींव रखी.

मालूम हो कि बीते महीने उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने ‘सामाजिक सद्भाव’ का हवाला देते हुए गौतम बुद्ध नगर की उच्च सत्र अदालत में दायर एक आवेदन में दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 321 के तहत मुकदमा वापस लेने का अनुरोध किया था. आरोपियों में विशाल राणा, जो स्थानीय भाजपा नेता संजय राणा के पुत्र हैं, भी शामिल हैं.

आरोपियों पर भारतीय दंड संहिता (जिसे अब भारतीय न्याय संहिता से बदल दिया गया है) की कई धाराओं में मुकदमा चल रहा था, जिनमें 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास),  323 (स्वेच्छा से चोट पहुंचाना),  504 (जानबूझकर अपमान), 506 (आपराधिक धमकी) शामिल हैं.

मुकदमा वापस लेने की अर्जी 15 अक्टूबर को गौतम बुद्ध नगर के सहायक जिला सरकारी अधिवक्ता द्वारा राज्य सरकार के निर्देशों के आधार पर दायर की गई थी. ये निर्देश 26 अगस्त को जारी एक पत्र के माध्यम से भेजे गए थे.

यह मामला 12 दिसंबर को सुना जाना था, लेकिन अभियोजन पक्ष के वकील यूसुफ़ सैफ़ी ने अदालत को बताया था कि वे उत्तर प्रदेश सरकार के प्रस्ताव पर आपत्ति दाखिल करना चाहते हैं. इसके बाद अदालत ने सुनवाई की नई तारीख तय की थी.

आरोपियों ने जमानत के लिए जो तर्क दिए, सरकार ने केस वापसी के लिए उन्हें ही आधार बनाया

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश सरकार ने इस मामले में आरोपियों के ख़िलाफ़ केस वापस लेने के लिए वही तर्क दिए थे, जो आरोपियों ने 8 साल पहले अपनी जमानत अर्जी में दिए थे. हालांकि, सरकार ने 8 साल पहले इन्हीं तर्कों को खारिज करते हुए आरोपियों की जमानत का विरोध किया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य सरकार ने अपने आवेदन में लगभग उन्हीं तर्कों को आधार बनाया है, जो आरोपियों ने कहे थे. उस समय सरकार का भी कहना था कि मुख्य गवाहों के बयान में असमानता और विरोधाभास था.

सरकार ने यह तर्क दिया है कि चश्मदीदों असकरी (अखलाक की मां), इकरमान (पत्नी), शाइस्ता (बेटी) और दानिश (बेटा) के बयानों में आरोपियों की संख्या में बदलाव किया गया है. इसके अलावा गवाह और आरोपी दोनों एक ही गांव, बिसाहड़ा के रहने वाले हैं. इसके बावजूद शिकायतकर्ता और अन्य गवाहों ने अपने बयानों में आरोपियों की संख्या में बदलाव किया है.

गौरतलब है कि 28 सितंबर 2015 की रात में हुई इस घटना को लेकर दिसंबर 2015 में पुलिस ने अपनी चार्जशीट दायर की, जिसमें 15 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था. इसमें एक नाबालिग और एक स्थानीय भारतीय जनता पार्टी नेता संजय राणा के बेटे विशाल राणा के नाम शामिल थे. बाद में इस मामले में आरोपियों की संख्या कुल 19 हुई.

इस मामले में 2016 में एक अभियुक्त रवीन सिसोदिया की मौत जेल में हो गई थी. इस मामले का 2021 में ट्रायल शुरू हुआ था.

अख़लाक़ के परिवार के वकील मोहम्मद यूसुफ़ सैफ़ी का कहना है कि अब तक केवल एक गवाह का बयान कोर्ट के सामने पेश हुआ है.

अख़लाक़ की लिंचिंग एक भयावह मिसाल के तौर पर देखी जाती है, जिसने भीड़ द्वारा हिंसा, असहिष्णुता और गोमांस खाने पर देशव्यापी बहस छेड़ दी थी. इस घटना के बाद भी देश में कई ऐसे मामले सामने आए, जहां स्वयंभू ‘गौरक्षकों’ ने गौरक्षा के नाम पर गोहत्या या मवेशियों के परिवहन के आरोप में मुस्लिमों को निशाना बनाया.