‘ग्रीन टैग’ वाले कारखाने में श्रमिकों का सांस लेना क्यों मुहाल है?

चित्र कथा: राजस्थान के ग्रीन उद्योग माने जाने वाले फ्लाई ऐश ईंट फैक्ट्री में काम करने वाले हज़ारों मज़दूर फ्लाई ऐश यानी थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली बारीक राख, जिसमें सिलिका, एल्युमिना, आयरन ऑक्साइड और आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, क्रोमियम, पारा और तांबा जैसी भारी धातुएं होती हैं - के प्रदूषित माहौल में काम करते हैं.

फ्लाई ऐश ईंट बनाने के लिए सामग्री मिलाती एक महिला श्रमिक. (फोटो: मणिदीप गुडेला)

रवीश* 34 वर्ष के हैं और कोटा के राजस्थान राज्य औद्योगिक विकास एवं निवेश निगम लिमिटेड (रीको) पर्यावरण औद्योगिक क्षेत्र की एक फ्लाई ऐश ईंट फैक्ट्री में बतौर श्रमिक काम करते हैं. मूल रूप से मध्य प्रदेश से आने वाले रवीश उन 2000 श्रमिकों में से एक हैं जो इस 76-यूनिट वाले क्लस्टर में काम करते हैं. यहां काम कर रहे कुल श्रमिकों में 20-25 प्रतिशत महिलाएं हैं.

रवीश बताते हैं कि ‘हम रोज गुड़ खाते हैं. इससे सीने में जमी धूल साफ हो जाती है.’

यह ‘धूल’ असल में फ्लाई ऐश यानी थर्मल पावर प्लांट से निकलने वाली बारीक राख है, जो कोयला जलने के बाद निकलती है. इस राख में सिलिका, एल्युमिना, आयरन ऑक्साइड और आर्सेनिक, सीसा, कैडमियम, क्रोमियम, पारा और तांबा जैसी भारी धातुएं होती हैं.

फ्लाई ऐश ज्यादातर अतिसूक्ष्म कणों (PM2.5 और PM1 से भी छोटे कणों) से बनी होती है, जो फेफड़ों और रक्त प्रवाह में आसानी से प्रवेश कर जाती है. यह अस्थमा, टीबी, धातु-विषाक्तता और फेफड़ों की कार्यक्षमता में गिरावट जैसे रोग पैदा कर सकती है. गुड़ वास्तव में इन अतिसूक्ष्म कणों से कोई सुरक्षा देता भी है या नहीं, यह स्पष्ट नहीं है. लेकिन सभी मजदूर इस पर निर्भर रहते हैं.

रवीश और उनके साथी मजदूर फ्लाई ऐश ईंट बनाने की पूरी प्रक्रिया, जिसमें फावड़ा चलाना, मिश्रण तैयार करना, मशीनें चलाना, ईंटें ढालना, उन्हें सुखाना और तैयार ईंटों को लादना आदि शामिल है, के दौरान धूल के गुबार से सने रहते हैं.

फ्लाई ऐश ईंट बनाने के लिए सामग्री मिलाती एक महिला श्रमिक. (फोटो: मणिदीप गुडेला)

भारत के कोयला-आधारित विद्युत संयंत्र हर साल 340 मिलियन टन से अधिक फ्लाई ऐश पैदा करते हैं. 31 दिसंबर 2021 को पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने ऐश उपयोग अधिसूचना, 2021 जारी की थी. इसमें हर कोयला या लिग्नाइट आधारित थर्मल पावर प्लांट के लिए फ्लाई ऐश के 100 प्रतिशत उपयोग को अनिवार्य किया गया था.

इस अधिसूचना के तहत ईंट निर्माण के लिए ऊपरी मिट्टी (टॉप सॉइल) की खुदाई पर प्रतिबंध लगाया गया. साथ ही, थर्मल पावर प्लांट से 300 किलोमीटर क्षेत्र के भीतर भवन-निर्माण सामग्रियों और निर्माण गतिविधियों में फ्लाई ऐश के उपयोग को बढ़ावा दिया गया था.

यह कदम पर्यावरण–हितैषी बताया जाता है, हालांकि इससे जोखिम खत्म होने के बजाय एक जगह से दूसरी जगह स्थानांतरित हो रहा है. फ्लाई ऐश अब तालाबों में जमा होने के बजाय खुले ट्रकों, यार्डों, मिक्सरों से गुजरती हुई मजदूरों और उनके परिवारों के फेफड़ों में जा रही है.

आरटीआई से मिली जानकारी के मुताबिक, वन विभाग से लीज पर ली गई 45 हेक्टेयर जमीन पर 1999 में स्थापित किए गए रीको क्लस्टर में 76 यूनिट हैं. ये सभी कोटा सुपर थर्मल पावर स्टेशन (केएसटीपीएस) से ऐश लेती हैं, जो हर साल लगभग 20 लाख टन ऐश बनाता है. यह क्लस्टर वेस्ट का उपयोग कर फ्लाई ऐश का प्रदूषण कम करने के उद्देश्य से बनाया गया था. लेकिन यहां धूल नियंत्रण प्रणाली या प्रदूषण निगरानी प्रणाली जैसी बुनियादी पर्यावरणीय व्यवस्था तक मौजूद नहीं है.

थर्मल पावर प्लांट के साइलो से ऐश लादता ट्रक. (फोटो: अकांक्षा चौधरी)

अक्सर ऐश केएसटीपीएस से खुले ट्रकों में क्लस्टर तक लाई जाती है. प्रत्येक यूनिट को हर दो दिन में एक ट्रक भेजा जाता है. सिर्फ एक किलोमीटर के परिवहन में यह ऐश हवा में इस तरह फैलती है कि सड़क किनारे की दुकानों, रास्ते और आसपास काम करने वालों पर जम जाती है. क्लस्टर के अंदर इसे खुले में ही गिरा दिया जाता है.

जगदीश सैनी*, फ्लाई ऐश फैक्ट्री में सुपरवाइजर हैं. वह बताते हैं कि ‘यहां ज्यादातर मजदूर प्रवासी हैं. वे मध्य प्रदेश के अशोक नगर और बिहार के अलग-अलग जिलों से आते हैं.’ इन यूनिटों में बनी ईंटों को बाजार में ‘पर्यावरण-हितैषी निर्माण सामग्री’ के रूप में बेचा जाता है. लेकिन यहां काम करने वाले मजदूरों के लिए यह पर्यावरण या स्वास्थ्य के लिहाज से उपयुक्त नहीं कहा जा सकता है.

क्लस्टर में काम करने वाले पवन* कहते हैं कि उद्योग का ‘ग्रीन’ दावा बिल्कुल खोखला है. उनका और तमाम श्रमिकों का दिन ऐसी प्रदूषित हवा में शुरू और खत्म होता है, जिसमें रहने से लगातार आंखों और गले में चुभन बनी रहती है.

एक मजदूर फ्लाई ऐश की ईंटें जमाते हुए. (फोटो: मणिदीप गुडेला)

ईंट बनाने की प्रक्रिया के हर स्तर पर श्रमिकों को धूल का सामना करना पड़ता है. प्लांट के साइलो से खुले ट्रकों में ऐश लोड करते समय अति सूक्ष्म कणों का घना गुबार तुरंत हवा में फैल जाता है. फैक्ट्री के अंदर ऐश अनलोड करते समय भी पूरा इलाका धुएं जैसे बादल में घिर जाता है, जिससे दिखाई देना तक मुश्किल हो जाता है.

यूनिट के भीतर सूखे मिश्रण और सामग्री को इधर-उधर ले जाने के कारण पूरे दिन हवा में धूल उड़ती रहती है. यहां तक कि सुखाने और लोडिंग के दौरान, हर कदम रखने और हर ईंट पर दूसरी ईंट रखने से भी पहले से जमी हुई ऐश फिर से उड़ने लगती है. यह जोखिम केवल काम के घंटों तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरा इलाका लगातार इसी धूल से भरा रहता है.

हमेशा उड़ती रहने वाली फ्लाई ऐश के बीच एक श्रमिक दुपट्टे से खुद को बचाते हुए. (फोटो: अकांक्षा चौधरी)

ईंट उत्पादन दो मुख्य मशीनों पर निर्भर करता है: एक है मिक्सर, जिसमें फ्लाई ऐश को चूने और रेत के साथ मिलाया जाता है और दूसरा है हाइड्रोलिक प्रेस, जो ईंटों को आकार देती है. मजदूर घंटों तक बिना किसी दस्ताने, मास्क और अन्य सुरक्षा उपकरणों के इन मशीनों को चलाते हैं. इस वजह से वे बेहद जहरीली और असुरक्षित जगहों के नजदीकी संपर्क में रहते हैं. एक साधारण कपड़े के मास्क के अलावा उनके पास कोई सुरक्षा इंतजाम नहीं होता है. यूनिट में काम करने वाले मजदूर बताते हैं कि बिना सुरक्षा के मशीन चलाते समय चोट लगना आम बात है.

मजदूर और उनके बच्चे यूनिट में काम करते हुए. फोटो: मणिदीप गुडेला)

भूरा* नाम के एक मजदूर, पास खड़े मजदूर की ओर इशारा करते हुए (जिसके दाएं हाथ के दस्ताने की उंगलियां गायब हैं) बताते हैं कि ‘मशीन चलाते समय हमें अक्सर चोट लग जाती है.’ वह आगे जोड़ते हैं कि ‘जब कोई मजदूर काम के दौरान घायल होता है तो उसे केवल बिना वेतन की छुट्टी मिलती है. मालिक इलाज का खर्च तो दे देता है, लेकिन ठीक होने के दौरान छूटे हुए दिनों का कोई वेतन नहीं मिलता है.’

फ्लाई ऐश ईंटों की लोडिंग और अनलोडिंग के दौरान मजदूरों द्वारा इस्तेमाल किए गए दस्ताने. (फोटो: अकांक्षा चौधरी)

हर यूनिट में लगभग 16-20 मजदूर अनौपचारिक कॉन्ट्रैक्टर नेटवर्क के जरिए काम करते हैं. न कोई लिखित कॉन्ट्रैक्ट होता है, न सामाजिक सुरक्षा, न ही काम की सुरक्षा से जुड़े प्रावधान. पीक सीजन में नौ मजदूरों की एक टीम रोजाना लगभग 15,000 ईंटें बनाती है, जिससे एक मजदूर को 500 रुपये मिलते हैं. लोडिंग करने वाले मजदूरों को प्रति ट्रक या ट्रैक्टर 250 रुपये मिलते हैं. बारिश के समय या बिजली की आपूर्ति बाधित होने पर कमाई बहुत घट जाती है. इसके बावजूद मजदूर इस इलाके में इसलिए टिके रहते हैं क्योंकि साल भर कुछ न कुछ काम मिलता रहता है, भले ही बारिश के समय निर्माण का काम धीमा पड़ जाए.

फ्लाई ऐश ईंटों के धुएं के गुबार के बीच से सड़क से गुजरता एक राहगीर (फोटो: अकांक्षा चौधरी)

मजदूर अक्सर अपने परिवारों के साथ फैक्ट्री परिसर के भीतर ही बने अस्थायी कमरों में रहते हैं. ऐसे में धूल उनके बिस्तर, बर्तनों, खाने और बच्चों के खेलने की जगहों पर जम जाती है. कमरों में हवा आने-जाने का कोई प्रबंध नहीं होता. शौच के लिए वे पास के खुले मैदान का इस्तेमाल करते हैं और पानी फैक्ट्री में लगे टैंक से आता है. बच्चे भी वहीं रहते हैं और अक्सर ईंटों को छांटने या लगाने में मदद करते हैं. इस दौरान उनकी हर सांस के साथ जहरीली राख उनके भीतर जाती रहती है.

क्लस्टर में ऐश उतारते मजदूर. (फोटो: मणिदीप गुडेला)

क्लस्टर एक बड़े नगर निगम के कचरा-डंप के ठीक बगल में स्थित है, जिससे हवा में धूल, बदबू और धुएं की एक और परत जुड़ जाति है. क्षेत्र में वायु गुणवत्ता की कोई निगरानी नहीं होती और मजदूरों की अनिवार्य स्वास्थ्य जांच भी नहीं होती है.

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) फ्लाई ऐश ईंट फैक्ट्रियों को ‘व्हाइट इंडस्ट्री’ की श्रेणी में रखता है. यह श्रेणी उन गतिविधियों के लिए बनाई गई है, जिनका पर्यावरणीय दुष्प्रभाव न के बराबर माना जाता है. इस वर्गीकरण के कारण इन फैक्ट्रियों को नियमित निरीक्षण, पर्यावरणीय स्वीकृति और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (एसपीसीबी) के तहत सहमति संबंधी कई अनिवार्यताओं से छूट मिल जाती है.

फ्लाई ऐश ईंट उद्योग में काम करने वाले मजदूरों के रहने की जगह. (फोटो: मणिदीप गुडेला)

केएसटीपीएस ऐश को एक ‘डिस्पोजल समस्या’ के रूप में देखता है, न कि श्रमिकों की समस्या के रूप में. उनकी जिम्मेदारी प्लांट गेट पर समाप्त हो जाती है. ईंट निर्माता राख को कच्चे माल की तरह इस्तेमाल करते हैं. लेकिन न तो वे इस स्थिति की निगरानी करते हैं कि मजदूर इससे कितना प्रभावित हो रहे हैं और न ही वे उन्हें कोई सुरक्षा ढांचा प्रदान करते हैं.

एसपीसीबी और श्रम विभाग क्लस्टर में शायद ही कभी आते हैं और काम के जोखिमों की निगरानी के लिए कोई खास कदम उठाते नहीं दिखते हैं. सुरक्षा मानकों, स्वास्थ्य निगरानी और संस्थागत जवाबदेही के अभाव के चलते यह खतरनाक धूल मजदूरों को लगातार नुकसान पहुंचाती रहती है.

रीको पर्यावरण औद्योगिक क्षेत्र के पास स्थित कचरा-डंप. (फोटो: मणिदीप गुडेला)

यह पूरी व्यवस्था इस धारणा पर आधारित है कि चूंकि फ्लाई ऐश ईंटों को ‘वेस्ट यूटीलाइजेशन’ माना जाता है, इसलिए इस गतिविधि को अपने आप ही स्वच्छ मान लिया जाता है. इस कारण निगरानी से ध्यान हट जाता है, जिससे यह खतरनाक गतिविधि जस की तस चलती रहती है. इसके अलावा, सीपीसीबी ने यह श्रेणी किस आधार पर तय की है, इसकी भी दोबारा समीक्षा किए जाने की आवश्यकता है.

(*गोपनीयता बनाए रखने के लिए नाम बदले गए हैं.)

(यह लेख पूर्व में आईडीआर की वेबसाइट पर प्रकाशित हो चुका है.)