नई दिल्ली: 21 दिसंबर को कोलकाता में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी समारोह में संघ प्रमुख मोहन भागवत ने एक ऐसा बयान दिया, जो आज भारतीय राज्य की नीतियों को दिशा दे रही वैचारिक परियोजना को स्पष्ट रूप से सामने रखता है. उन्होंने कहा कि भारत पहले से ही एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है.
आरएसएस के 100 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित ‘100 व्याख्यान माला’ कार्यक्रम में बोलते हुए भागवत ने एक उदाहरण देते हुए अपनी बात रखी.
उन्होंने कहा, ‘सूरज पूरब से उगता है; हमें नहीं पता कि यह कब से हो रहा है. तो क्या इसके लिए भी संविधान की मंजूरी चाहिए? हिंदुस्तान एक हिंदू राष्ट्र है. जो भी भारत को अपनी मातृभूमि मानता है, वह भारतीय संस्कृति का सम्मान करता है. जब तक हिंदुस्तान की धरती पर एक भी ऐसा व्यक्ति है जो भारतीय पूर्वजों की गौरवशाली विरासत में विश्वास करता है और उसे संजोकर रखता है, तब तक भारत एक हिंदू राष्ट्र है. यही संघ की विचारधारा है.’
इसके बाद उन्होंने यह भी साफ कर दिया कि उनका संगठन भारत के मूल धर्मनिरपेक्ष ढांचे के बारे में वास्तव में क्या सोचता है. भगवत के अनुसार, संविधान में औपचारिक मान्यता मिलना आरएसएस के लिए कोई मायने नहीं रखता. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस को ‘दुनिया का सबसे बड़ा एनजीओ’ बताते हैं, लेकिन यह संगठन आज भी पंजीकृत नहीं है और आज़ादी के बाद कम से कम तीन बार इस पर प्रतिबंध लग चुका है.
भगवत ने कहा, ‘अगर संसद कभी संविधान में संशोधन कर वह शब्द जोड़ने का फैसला करती है, या न भी करे, तो हमें उससे कोई फर्क नहीं पड़ता. हमें उस शब्द की परवाह नहीं है, क्योंकि हम हिंदू हैं और हमारा राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है. यही सच्चाई है.’
इस बयान में संविधान से तय की गई व्यवस्था के प्रति उनका तिरस्कार साफ झलकता है.
यह बयान खुलकर इस बात को नज़रअंदाज़ करता है कि भारत का संविधान वास्तव में क्या कहता है. भारतीय संविधान की प्रस्तावना में साफ़ तौर पर ‘धर्मनिरपेक्ष’ शब्द का उल्लेख है, जो यह स्पष्ट करता है कि भारत सभी धर्मों के लोगों का देश है, किसी एक धर्म का नहीं. अनुच्छेद 14 इस सिद्धांत को और मज़बूती देता है, जिसमें कहा गया है कि ‘राज्य भारत के क्षेत्र में किसी भी व्यक्ति को कानून के सामने समानता या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा.’
लेकिन सवाल यह है कि भागवत की यह टिप्पणी सिर्फ़ वैचारिक बयानबाज़ी से आगे क्यों मायने रखती है? इसलिए, क्योंकि यह एक मंशा का संकेत देती है और क्योंकि मंशा के बाद कार्रवाई होती है.
संवैधानिक बहुलता का क्षरण
जब आरएसएस का नेतृत्व यह घोषणा करता है कि भारत स्वभाव से ही एक ‘हिंदू राष्ट्र’ है और साथ ही संविधान के 76 वर्षों के विकास को खारिज करता है, तो यह कोई हल्की-फुल्की या आकस्मिक टिप्पणी नहीं होती. इसके ज़रिये वे बहुलता के लिए मौजूद बौद्धिक और राजनीतिक स्थान को ही सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं. ऐसी बयानबाज़ी उन सभी लोगों के बीच वास्तविक डर पैदा करती है, जो हिंदू धर्म को नहीं मानते. और यह डर केवल कल्पना नहीं है.
हाल के समय में ईसाइयों के खिलाफ हमलों में तेज़ी आई है, खासकर क्रिसमस के दौरान. जो घटनाएं पहले 1998-99 में गुजरात में या फिर मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और मध्य भारत के कुछ अन्य हिस्सों में भाजपा सरकारों के दौरान छिटपुट रूप में दिखाई देती थीं, वे अब देशभर में फैल गई हैं. केवल इसी साल उत्तर और पश्चिम भारत के कई हिस्सों से ऐसे हमलों की खबरें आई हैं.
ईसाई भारत की कुल आबादी का केवल 2.3 प्रतिशत हैं, इसके बावजूद वे एक महत्वपूर्ण और प्रमुख धार्मिक अल्पसंख्यक हैं, जो लगातार दबाव और हमलों का सामना कर रहे हैं.
यूनाइटेड क्रिश्चियन फोरम के अनुसार, पिछले 11 वर्षों में ईसाइयों पर हमलों की संख्या लगभग आठ गुना बढ़ी है. इस तेज़ बढ़ोतरी का सीधा संबंध आरएसएस से जुड़ी शासन व्यवस्था के उभार से मेल खाता है.
राज्य-प्रायोजित भेदभाव
यह सिलसिला सिर्फ़ इक्का-दुक्का भीड़ हिंसा तक सीमित नहीं है. अब अल्पसंख्यक समुदायों पर संगठित और संस्थागत दबाव दिखने लगा है. इसे सत्तारूढ़ दल के कुछ मुख्यमंत्रियों-खासतौर पर असम के हिमंत बिस्वा सरमा और उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ – के तीखे और आक्रामक बयानों से और बल मिलता है.
इन बयानों के बाद अक्सर पुलिस और नगर निकाय जैसी राज्य की संस्थाएं कानून का चयनात्मक इस्तेमाल करती दिखती हैं. कहीं कार्रवाई होती है, कहीं बुलडोज़र चलाए जाते हैं और इनका निशाना ज़्यादातर अल्पसंख्यक नागरिक ही बनते हैं. इन कदमों का विरोध पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व की ओर से लगभग नहीं के बराबर होता है.
इससे एक साफ़ संदेश जाता है: भेदभावपूर्ण शासन को ऊपर से मंज़ूरी मिली हुई है.
चुनावी लाभ के लिए धार्मिक ध्रुवीकरण
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2024 के चुनावों के दौरान धार्मिक ध्रुवीकरण को खुलकर और आक्रामक तरीके से इस्तेमाल किया. मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार, मार्च में आदर्श आचार संहिता लागू होने के बाद मोदी के 173 चुनावी भाषणों में से 110 भाषणों में मुसलमानों के खिलाफ गंभीर और आपत्तिजनक बातें कही गईं. यह कोई अनजाने में हुआ भाषण नहीं था, बल्कि एक सोची-समझी रणनीति थी.
इसके बाद भी यह रुख और तेज़ होता गया. हाल ही में 3 नवंबर को बिहार चुनाव के दौरान मोदी ने और कड़ा बयान दिया. कटिहार में एक चुनावी रैली को संबोधित करते हुए, जहां बड़ी मुस्लिम आबादी रहती है, उन्होंने आरजेडी और कांग्रेस पर ‘खतरनाक साज़िश’ रचने का आरोप लगाया. उन्होंने कहा कि ये पार्टियां सीमांचल क्षेत्र में घुसपैठ को बढ़ावा देकर जनसंख्या संतुलन बिगाड़ना चाहती हैं.
विपक्षी नेताओं ने मोदी के इस बयान को नफ़रत फैलाने वाला भाषण बताया. मोदी की भाषा, जिसमें धार्मिक जनसांख्यिकी के ज़रिए देश को अस्थिर करने की साज़िश का आरोप लगाया जाता है, अब उनके राजनीतिक हथियारों का नियमित हिस्सा बन चुकी है.
भारत के चरित्र और क़ानूनों को फिर से गढ़ने की कोशिश
सरकार का भारत को एक बहुलतावादी देश के बजाय मूल रूप से ‘हिंदू राष्ट्र’ के रूप में परिभाषित करने का प्रयास कई स्तरों पर दिखाई देता है. हाल के क़ानूनों में, शिक्षा पाठ्यक्रमों के ज़रिए इतिहास को नए सिरे से लिखने की कोशिशों में, और खासतौर पर इस तथ्य में कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार केंद्रीय मंत्रिमंडल में एक भी मुस्लिम मंत्री नहीं है, ये सभी संकेत एक ही दिशा की ओर इशारा करते हैं.
2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की लगभग 14 प्रतिशत आबादी मुस्लिम है. कुल मिलाकर देश की लगभग 25 प्रतिशत आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है. ऐसे में जब मोहन भागवत और उनके सहयोगी बार-बार यह संदेश देते हैं कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है, तो वे इन बड़ी आबादियों को यह संकेत दे रहे होते हैं कि वे वास्तव में इस देश के नहीं हैं.
भारत की कूटनीतिक अलगाव की स्थिति
यह वैचारिक सख्ती अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की स्थिति को नुकसान पहुंचाती है, वह भी ऐसे समय में जब इसकी सबसे अधिक ज़रूरत है. बांग्लादेश इस समय इस्लामी आंदोलनों के दबाव और वहां के हिंदू अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर चिंताओं के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रहा है. हाल के हफ्तों में बांग्लादेश में दो हिंदुओं की भीड़ द्वारा हत्या की गई है.
भारत को बांग्लादेश से ‘समावेशी’ होने और अल्पसंख्यकों के अधिकारों का सम्मान करने की नैतिक ज़मीन तभी मिल सकती है, जब उसका अपना आचरण भी वही दिखाए, जिसकी वह अपने पड़ोसियों से अपेक्षा करता है.
अगर भारत खुद को ‘हिंदू राष्ट्र’ के रूप में पेश करते हुए बांग्लादेश को उपदेश देता है, तो उसकी कोई विश्वसनीयता नहीं बचती. उलटे, इससे सांप्रदायिक तनाव और भड़क सकता है. भारत में आधिकारिक बयानबाज़ी में तथाकथित ‘बांग्लादेशियों’ (जिनसे आमतौर पर बंगाली भाषी मुस्लिम, कई बार बिना दस्तावेज़ वाले लोग, अभिप्रेत होते हैं) को ‘घुसपैठिया’ बताने का सिलसिला अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा की किसी भी अपील को कमजोर करता है.
2018 में, जब अमित शाह भाजपा अध्यक्ष थे, उन्होंने बांग्लादेशी प्रवासियों को ‘दीमक’ कहा था, यह एक अमानवीय शब्द है, जो राष्ट्रीयता से परे, धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति इस विचारधारा के असली रवैये को उजागर करता है.
आरएसएस का नेटवर्क और उसका प्रभाव
भगवत के बयान का महत्व समझने के लिए आरएसएस की शक्ति-संरचना को समझना ज़रूरी है. आरएसएस एक वैचारिक स्रोत की तरह काम करता है, जिससे भाजपा और उससे जुड़े कई संगठन निकले हैं. बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद (वीएचपी) जैसे संगठन खुले तौर पर कहते हैं कि वे संघ के लिए काम करते हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं आरएसएस के प्रचारक (पूर्णकालिक कार्यकर्ता) रहे हैं. उनके कई मंत्री, मुख्यमंत्री और राज्यपाल भी इसी पृष्ठभूमि से आते हैं. यह कोई समानांतर आंदोलन नहीं है, बल्कि मौजूदा भारतीय शासन की संचालनात्मक रीढ़ है.
भारतीय लोकतंत्र की पहचान रही संवैधानिक बहुलता को यह शासन धीरे-धीरे खत्म कर रहा है, बिना संविधान में सीधे संशोधन किए. इसके लिए राज्य की कार्रवाइयों, भीड़ हिंसा, भेदभावपूर्ण कानून-प्रवर्तन और अल्पसंख्यकों को लगातार अवैध ठहराने वाली भाषा का सहारा लिया जा रहा है. भगवत के शब्द इस पूरी प्रक्रिया को संदर्भ और दिशा दोनों देते हैं.
जब आरएसएस जैसे संगठन का सर्वोच्च नेता बोलता है, तो उसके शब्दों का भारी महत्व होता है. भगवत का यह बयान सिर्फ यह दोहराना नहीं है कि ‘भारत केवल हिंदुओं का है.’ यह उससे कहीं अधिक खतरनाक संकेत देता है. यह इस बात को दर्शाता है कि संघ के दृष्टिकोण से असहमत लोगों पर इतना दबाव डाला जाए कि वे सार्वजनिक जीवन से ही बाहर हो जाए, लोकतांत्रिक भागीदारी से पीछे हटने को मजबूर हो जाएं. यह भारत की वास्तविक, रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर लगातार बढ़ते दबाव की तस्वीर पेश करता है.
