नई दिल्ली: चुनाव आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) प्रक्रिया के तहत सुनवाई नोटिस मिलने के बाद मतदाताओं की मौतों के संदर्भ में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) मनोज अग्रवाल के खिलाफ दर्ज पुलिस शिकायतों को आयोग के अधिकारियों को डराने-धमकाने की कोशिश बताया है.
पश्चिम बंगाल के सीईओ ने एक्स पर लिखा, ‘इन लगातार और मनगढ़ंत शिकायतों के पीछे की साजिश का पर्दाफाश करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी, कानून का शासन और सच्चाई की जीत होगी.’
उन्होंने आगे कहा, ‘इसमें लगाए गए आरोप पहले से सोचे-समझे, निराधार और एसआईआर 2026 के संबंध में वैधानिक कर्तव्यों का निर्वहन करने वाले अधिकारियों को डराने की एक घटिया कोशिश लगते हैं.’
अपने पोस्ट और पोस्ट की श्रृंखला, जिसमें गृह मंत्रालय और कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग को टैग किया गया है, में सीईओ अग्रवाल ने लिखा, ‘विभिन्न प्रेस विज्ञप्तियों से इस कार्यालय के संज्ञान में आया है कि पुलिस में दो शिकायतें दर्ज की गई हैं – एक भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दूसरी पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के खिलाफ.’
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— CEO West Bengal (@CEOWestBengal) December 31, 2025
उन्होंने कहा, ‘इन शिकायतों में लगाए गए आरोप पूर्व-नियोजित, अप्रमाणित और एसआईआर 2026 से संबंधित वैधानिक जिम्मेदारियों का निर्वहन कर रहे अधिकारियों को डराने का कच्चा प्रयास प्रतीत होते हैं.’
मृतकों से जुड़ी एफआईआर रिपोर्ट्स को दबाव की रणनीति बताते हुए सीईओ ने कहा, ‘चुनाव तंत्र को डराकर झुकाने और प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए बनाई गई ऐसी डराने वाली रणनीतियां निश्चित रूप से विफल होंगी.’
उन्होंने कहा, ‘राज्य का चुनाव तंत्र दृढ़ता और ईमानदारी के साथ सिर्फ और सिर्फ जनहित में कार्य करने के लिए प्रतिबद्ध है.’
खबरों के अनुसार आयोग के अधिकारियों ने कहा है, ‘सीईसी के खिलाफ कोई एफआईआर दर्ज नहीं की जा सकती, कानून इस पर स्पष्ट है. इसी प्रकार किसी सीईओ को भी अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए किसी आपराधिक अपराध के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता. पुलिस द्वारा दर्ज कोई भी एफआईआर कानूनी परिणामों के अधीन होगी.’
ज्ञात हो कि सीईसी और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से पहले पारित विवादित कानून में एक प्रावधान शामिल किया गया था, जो पद पर रहते हुए लिए गए निर्णयों के लिए उनके खिलाफ किसी भी कानूनी कार्रवाई को प्रतिबंधित करता है. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023 की धारा 16 इस तरह की कानूनी छूट देती है.
इस बीच, पश्चिम बंगाल और अन्य राज्यों में, जहां अत्यंत कम समयसीमा में एसआईआर कराना अनिवार्य किया गया है, बीएलओ पर बढ़ते तनाव के कारण मौतों की खबरें सामने आई हैं, जिसके चलते ड्राफ्ट मतदाता सूचियों की समयसीमा आगे बढ़ानी पड़ी.
उक्त शिकायतें दो वृद्ध मतदाताओं के परिवारों द्वारा दर्ज कराई गई हैं, जिनकी सोमवार को एसआईआर प्रक्रिया के तहत सुनवाई नोटिस मिलने के बाद मृत्यु हो गई.
द टेलीग्राफ के अनुसार पुरुलिया में कनाई मांझी ने आरोप लगाया कि उनके 82 वर्षीय पिता दुर्जन मांझी को नोटिस मिलने के बाद गहरा मानसिक आघात पहुंचा, क्योंकि उनका नाम 2002 की बंगाल एसआईआर की फिजिकल लिस्ट में था, लेकिन चुनाव आयोग की वेबसाइट पर अपलोड की गई 2002 की एसआईआर सूची में नहीं था. उन्होंने अपनी सुनवाई से कुछ घंटे पहले आत्महत्या कर ली.
हावड़ा में 64 वर्षीय जमात अली शेख के बेटे ने आरोप लगाया कि सीईसी और राज्य के सीईओ ने उनके पिता – जो वैध मतदाता थे – को सुनवाई नोटिस जारी कर अपने अधिकारों का दुरुपयोग किया, जिससे मानसिक दबाव उनके निधन का कारण बना.
इस बीच, मंगलवार को पूर्वी मिदनापुर से एक और घटना सामने आई, जहां 75 साल के बिमल शी, जो कथित तौर पर सुनवाई का नोटिस मिलने के बाद परेशान थे, अपने घर में लटके हुए पाए गए.
उल्लेखनीय है कि इस कवायद के दौरान चुनाव आयोग लगातार नियम बदलता रहा है. 27 दिसंबर के पश्चिम बंगाल आदेश में उसने ‘तकनीकी त्रुटि’ का हवाला दिया और कहा कि वे 1.3 लाख मतदाता, जिनके नाम 2002 की भौतिक एसआईआर सूची में हैं लेकिन ऑनलाइन डेटाबेस में गायब हैं, उन्हें सुनवाई में उपस्थित होने की आवश्यकता नहीं होगी.
इसी तरह उत्तर प्रदेश के अयोध्या में ऐसी खबरें आई हैं कि लगभग 15,000 साधुओं को माता-पिता का विवरण बताने में दिक्कत हो सकती है, और संभव है आयोग उन्हें भी छूट दे.
चुनाव आयोग को बार-बार नियम बदलने पड़े हैं और उसकी लगातार चूक पर कड़ी निगरानी हो रही है. द हिंदू ने एक संपादकीय में इस पूरी प्रक्रिया को ‘धीरे-धीरे फर्जी तमाशे में बदलती कवायद’ बताया.
संपादकीय में कहा गया, ‘मसौदा मतदाता सूचियों में असंगतियां और विसंगतियां हैं, जिनमें से कई ‘द हिंदू’ की डेटा-आधारित जांच में सामने आई हैं. 6.5 करोड़ से अधिक हटाए गए नाम (प्रारंभिक आंकड़ों के अनुसार) इस कवायद में पद्धतिगत खामियों और खराब क्रियान्वयन की ओर इशारा करते हैं. उत्तर प्रदेश में 2.89 करोड़ नाम हटाए गए हैं, जिसके चलते मसौदा सूची प्रकाशन 6 जनवरी तक टालना पड़ा. तमिलनाडु और गुजरात जैसे राज्यों में, जहां शहरीकरण और प्रवास अधिक है, क्रमशः 97 लाख और 73.7 लाख नाम हटाए गए. बाद में बड़ी संख्या में नाम ‘नए जोड़’ के रूप में वापस जोड़े गए – जो प्रक्रिया की जल्दबाज़ी और गंभीर खामी दिखाता है.’
उल्लेखनीय है कि द वायर ने 30 दिसंबर को एक रिपोर्ट में बताया था कि एक स्कूल प्रिसिंपल ने दबाव में आत्महत्या की, और पश्चिम बंगाल के बांकुरा जिले के कई बीएलओ ने बताया कि मसौदा सूची और सुनवाई तैयारी ने उनके स्वास्थ्य पर भारी असर डाला.
इसी बीच पूर्व नौकरशाहों के कॉन्स्टिट्यूशनल कंडक्ट ग्रुप के सदस्यों ने लिखा है कि पश्चिम बंगाल में चल रही एसआईआर प्रक्रिया के दौरान मतदाता सूची के प्रारूप (ड्राफ्ट) से मतदाताओं को सिस्टम-ड्रिवन स्वतः डिलीशन (suo motu system-driven deletion) का तरीका निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों की वैधानिक भूमिका को दरकिनार कर दिया.
इसी बीच, द रिपोर्टर्स’ कलेक्टिव ने पाया कि सुप्रीम कोर्ट को यह बताने के सिर्फ आठ दिन बाद कि उसका डी-डुप्लीकेशन सॉफ्टवेयर ख़राब है, चुनाव आयोग ने अचानक इसे 12 राज्यों के लिए फिर से चालू कर दिया, लेकिन इसके सुरक्षित इस्तेमाल के लिए तय प्रोटोकॉल को हटा दिया. साथ ही, एक दूसरा दस्तावेज़-रहित एल्गोरिथ्म भी बिना लिखित प्रक्रिया के लागू कर दिया गया.
ताज़ा समयसीमा परिवर्तन के अनुसार, उत्तर प्रदेश की ड्राफ्ट मतदाता सूची अब 6 जनवरी को जारी होगी, और अंतिम सूची उसके बाद आने की उम्मीद है.
इसी दौरान टीएमसी के राष्ट्रीय महासचिव और सांसद अभिषेक बनर्जी, जो बुधवार (31 दिसंबर) को चुनाव आयोग से मिलने गए पार्टी प्रतिनिधिमंडल का हिस्सा थे, ने कहा कि आयोग उनकी आशंकाओं को दूर नहीं कर सका और बैठक के दौरान राज्य के मुख्य निर्वाचन आयुक्त ‘आक्रामक‘ थे.
उन्होंने कहा, ‘जब हमने बात शुरू की, तो वे (सीईसी) गुस्सा होने लगे… मैंने कहा, आप नामित हैं, मैं चुना हुआ हूं… अगर उनमें हिम्मत है तो फुटेज जारी करें.’
