भारत-पाक शत्रुता ख़त्म करने और शांति की इच्छा राजद्रोह नहीं: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट

पाकिस्तान के झंडे और हथियारों से जुड़ी तस्वीरें व वीडियो ऑनलाइन पोस्ट करने के आरोप में गिरफ़्तार व्यक्ति को ज़मानत देते हुए हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता समाप्त करने और शांति बहाल करने की इच्छा को ‘राजद्रोह’ नहीं माना जा सकता.

जस्टिस राकेश कैंथला ने आरोपी की ज़मानत याचिका पर सुनवाई करते हुए यह फ़ैसला सुनाया.(फोटो साभार: seelatest.com)

नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा है कि भारत और पाकिस्तान के बीच शत्रुता समाप्त करने और शांति बहाल करने की इच्छा को ‘राजद्रोह’ नहीं माना जा सकता. कोर्ट की यह टिप्पणी उस आरोपी को ज़मानत देते हुए आई है, जिसने कथित तौर पर पाकिस्तान के झंडे और हथियारों से जुड़ी तस्वीरें व वीडियो ऑनलाइन पोस्ट किए थे.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, अभिषेक सिंह भारद्वाज नामक एक व्यक्ति पर आरोप था कि उन्होंने फेसबुक पर प्रतिबंधित हथियारों और पाकिस्तान के झंडे से जुड़ी तस्वीरें व वीडियो अपलोड किए, साथ ही नियाज़ खान नामक व्यक्ति के साथ की गई चैट भी साझा की. चैट में आरोपी ने ‘ऑपरेशन सिंदूर’ को गलत बताया और खालिस्तान के समर्थन की बात कही थी.

हाईकोर्ट के जस्टिस राकेश कैंथला आरोपी की ज़मानत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे. 

अदालत ने कहा कि आरोपी ने एक व्यक्ति से बातचीत में भारत-पाक के बीच जारी तनाव की आलोचना की और कहा कि धर्म की परवाह किए बिना सभी लोगों को साथ रहना चाहिए, क्योंकि युद्ध का कोई सार्थक उद्देश्य नहीं होता. अदालत ने जोड़ा, ‘शत्रुता खत्म करने और शांति की वापसी की इच्छा को राजद्रोह कैसे माना जा सकता है, यह समझना मुश्किल है.’

हाईकोर्ट ने यह भी रेखांकित किया कि एफआईआर में सरकार के खिलाफ ‘नफरत या असंतोष’ भड़काने का कोई आरोप नहीं है और न ही आरोपी के पास से कोई प्रतिबंधित हथियार बरामद हुआ है. अदालत ने पेन ड्राइव में मौजूद तस्वीरें, वीडियो, और आरोपी के मोबाइल से निकाला गया डेटा और चैट हिस्ट्री भी देखी.

जस्टिस कैंथला ने कहा कि केवल प्रतिबंधित हथियारों की तस्वीरें पोस्ट करना, वह भी किसी व्यक्ति के नाम के साथ, राजद्रोह नहीं बनता. खासकर तब जब आरोपी के पास से कोई हथियार बरामद न हुआ हो. 

‘खालिस्तान जिंदाबाद’ नारे के संदर्भ में अदालत ने कहा कि आरोपी के मोबाइल डेटा में ऐसा कोई नारा नहीं मिला है, और अगर मान भी लिया जाए कि यह सच है, तब भी सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के अनुसार केवल नारा लगाना अपने आप में अपराध नहीं है.

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता संजीव कुमार सूरी ने कहा कि पुलिस चार्जशीट दाखिल कर चुकी है, ऐसे में आरोपी को हिरासत में रखने का कोई औचित्य नहीं है.

राज्य की ओर से पेश डिप्टी एडवोकेट जनरल प्रशांत सेन ने दलील दी कि आरोपी कथित रूप से राष्ट्रविरोधी गतिविधियों में शामिल रहा है और पाकिस्तानी नागरिकों के संपर्क में था, इसलिए अपराध गंभीर है और ज़मानत याचिका खारिज की जानी चाहिए.

अदालत ने भारद्वाज को इस शर्त पर ज़मानत दी कि वह गवाहों को प्रभावित नहीं करेंगे, हर सुनवाई में उपस्थित रहेंगे, बिना सूचना सात दिन से अधिक पता नहीं बदलेंगे, पासपोर्ट (यदि हो) जमा करेंगे, अपना मोबाइल नंबर और सोशल मीडिया विवरण पुलिस-अदालत को देंगे और किसी भी बदलाव की जानकारी समय पर देंगे.

जस्टिस कैंथला ने कहा कि इनमे से किसी भी शर्तों के उल्लंघन पर अभियोजन ज़मानत रद्द कराने की अर्जी दे सकता है.