नई दिल्ली: भारत सरकार ने शुक्रवार (9 जनवरी) को न्यूयॉर्क के मेयर ज़ोहरान ममदानी द्वारा जेल में बंद पूर्व छात्र नेता उमर ख़ालिद को भेजे गए पत्र पर असहमति जताई है. विदेश मंत्रालय ने कहा कि सार्वजनिक पदों पर बैठे प्रतिनिधियों को अन्य लोकतांत्रिक देशों की न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करना चाहिए.
बता दें कि भारतीय मूल के ज़ोहरान ममदानी ने पिछले महीने अमेरिका में उमर ख़ालिद के माता-पिता से मुलाक़ात के दौरान उन्हें एक हस्तलिखित पत्र दिया था, जिसे उन्होंने ख़ालिद तक पहुंचाया. इस पत्र में ममदानी ने उमर ख़ालिद के प्रति अपनी एकजुटता व्यक्त की थी.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक, विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने अपनी साप्ताहिक प्रेस ब्रीफिंग में कहा,’हम अपेक्षा करते हैं कि सार्वजनिक प्रतिनिधि अन्य लोकतंत्रों की न्यायपालिका की स्वतंत्रता का सम्मान करें.’
वे ममदानी द्वारा उमर ख़ालिद को भेजे गए संदेश से जुड़े एक सवाल का जवाब दे रहे थे. जायसवाल ने आगे कहा, ‘व्यक्तिगत पूर्वाग्रहों को व्यक्त करना सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों को शोभा नहीं देता. ऐसे बयानों के बजाय उन्हें सौंपी गई जिम्मेदारियों पर ध्यान केंद्रित करना अधिक उपयुक्त होगा.’
गौरतलब है कि उमर ख़ालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली पुलिस द्वारा गिरफ़्तार किए जाने के बाद से ज़मानत नहीं मिली है. ख़ालिद पर फरवरी 2020 में उत्तर-पूर्वी दिल्ली में नागरिकता संशोधन अधिनियम (सीएए) के समर्थन और विरोध में हुई झड़पों से जुड़े एक मामले में गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (यूएपीए) के तहत मामला दर्ज किया गया था.
इससे पहले भाजपा ने ममदानी के पत्र पर आपत्ति जताते हुए कहा था कि भारत अपने आंतरिक मामलों में किसी भी तरह का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेगा.
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता गौरव भाटिया ने कहा था कि, ‘कौन-सा बाहरी व्यक्ति हमारी लोकतंत्र और न्यायपालिका पर सवाल उठाने वाला होता है? वह भी ऐसे व्यक्ति के समर्थन में जो भारत को टुकड़ों में बांटना चाहता है? यह ठीक नहीं है… जब भारत की संप्रभुता की बात आती है, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में 140 करोड़ भारतीय इसके खिलाफ खड़े होंगे.’
ज्ञात हो कि हाल ही में अमेरिका के सांसदों के एक समूह ने भी भारत के अमेरिका स्थित राजदूत विनय क्वात्रा को पत्र लिखकर उमर ख़ालिद को ज़मानत दिए जाने और अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप ‘निष्पक्ष और समयबद्ध सुनवाई’ की मांग की थी.
इसमें कहा गया कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के नाते, दोनों देशों की स्वतंत्रता, क़ानून के शासन, मानवाधिकारों और बहुलवाद की रक्षा और उसे बनाए रखने में साझा रुचि है. ‘इसी भावना के तहत’ सांसदों ने ख़ालिद की हिरासत को लेकर अपनी चिंता जताई.
पत्र में कहा गया कि ख़ालिद को गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (यूपीएए) के तहत लगाए गए आरोपों में पांच वर्षों से बिना ज़मानत हिरासत में रखा गया है, जबकि स्वतंत्र मानवाधिकार विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह अंतरराष्ट्रीय मानकों – जैसे क़ानून के समक्ष समानता, उचित प्रक्रिया और अनुपातिकता – का उल्लंघन कर सकता है.
