‘भ्रष्टाचारियों का संरक्षण’ बनाम ‘ईमानदार अफसरों की रक्षा’: धारा 17ए पर सुप्रीम कोर्ट का खंडित फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने लोक सेवकों की जांच से पहले मंज़ूरी अनिवार्य करने वाले भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की वैधता पर खंडित फैसला सुनाया. एक ओर जस्टिस बीवी नागरत्ना ने इसे असंवैधानिक क़रार दिया, तो जस्टिस विश्वनाथन ने इसे निरस्त करने से असहमति जताते हुए इसे सीमित करने का समर्थन किया.

(प्रतीकात्मक फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने मंगलवार (13 जनवरी) को सरकारी कर्मचारियों के भ्रष्टाचार मामलों की जांच के लिए सरकार की पूर्व स्वीकृति अनिवार्य होने के मामले पर विभाजित फैसला सुनाया.

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए की संवैधानिकता पर विचार कर रही थी, जिसे 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ा गया था.

मालूम हो कि भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 17ए, जिसे जुलाई 2018 में जोड़ा गया था, सक्षम प्राधिकारी की पूर्व स्वीकृति के बिना आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में की गई सिफारिशों के लिए किसी भी लोक सेवक के खिलाफ किसी भी प्रकार की ‘जांच या छानबीन’ पर रोक लगाती है.

लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस नागरत्ना ने इस प्रावधान को असंवैधानिक करार देते हुए फैसला सुनाया कि यह भ्रष्ट अधिकारियों को संरक्षण देता है और अधिनियम के उद्देश्य को कमजोर करता है.

उन्होंने कहा कि धारा 17ए उन सुरक्षा उपायों को पुनः लागू करती है, जिन्हें पहले विनीत नारायण और सुब्रमण्यम स्वामी के निर्णयों में न्यायालय द्वारा निरस्त कर दिया गया था, साथ ही यह धारा जांच को रोकती है और ईमानदार सरकारी कर्मचारियों के बजाय भ्रष्ट लोक सेवकों को संरक्षण प्रदान करती है.

उन्होंने इसे ‘भ्रष्ट लोगों को संरक्षण देने का प्रयास’ बताते हुए कहा, ‘धारा 17ए असंवैधानिक है और इसे निरस्त किया जाना चाहिए. इसके लिए किसी पूर्व स्वीकृति की आवश्यकता नहीं है.’

मालूम हो कि यह मामला सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन की याचिका से जुड़ा है, जिसमें 2018 के संशोधन द्वारा जोड़ी गई इस धारा को चुनौती दी गई थी. यह याचिका जनहित में दायर की गई थी. इस मामले में एनजीओ की तरफ से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि धारा 17ए ने गैरकानूनी रूप से उन सुरक्षा उपायों को फिर से लागू किया है जिन्हें पहले अदालत द्वारा अमान्य घोषित कर दिया गया था.

वहीं, जस्टिस विश्वनाथन ने इस प्रावधान को निरस्त करने से असहमति जताते हुए इसे सीमित करने का समर्थन किया.

उन्होंने कहा कि मंजूरी देने का निर्णय कार्यपालिका द्वारा नहीं बल्कि लोकपाल या लोकायुक्त जैसे स्वतंत्र प्राधिकरण द्वारा लिया जाना चाहिए.

जस्टिस विश्वनाथन ने कहा, ‘धारा 17ए में वर्गीकरण की कोई खामी नहीं है. दुरुपयोग की संभावना धारा 17ए को निरस्त करने का आधार नहीं है.’

उन्होंने चेतावनी दी कि इस प्रावधान को पूरी तरह से हटाने से नीतिगत गतिरोध उत्पन्न हो सकता है और इसे निरस्त करना ‘अच्छी चीज को बुरी चीज के साथ फेंक देने’ के समान होगा.

न्यायाधीश ने कहा कि ईमानदार लोक सेवकों को तुच्छ जांचों से बचाना आवश्यक है.

यह मामला अब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को भेजा गया है, जो संभवतः इसकी सुनवाई के लिए एक बड़ी पीठ का गठन करेंगे.