स्मार्टफोन कंपनियों से सोर्स कोड मांगने की ख़बर पर केंद्र सरकार की सफाई, रिपोर्ट को ग़लत बताया

केंद्र सरकार ने रॉयटर्स की उस रिपोर्ट को ख़ारिज किया है, जिसमें स्मार्टफोन कंपनियों से डिवाइस का सोर्स कोड यानी फोन को चलाने वाले मूल प्रोग्रामिंग निर्देश, साझा करने की बात कही गई थी. सरकार का कहना है कि कोई अंतिम नियम नहीं बना है, वहीं डिजिटल अधिकार संगठनों ने पारदर्शिता और प्राइवेसी को लेकर सवाल उठाए हैं.

(प्रतीकात्मक फोटो साभार: Pixabay)

नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने रॉयटर्स की एक रिपोर्ट को लेकर सफ़ाई देने में जल्दबाज़ी दिखाई है. इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि सरकार स्मार्टफोन निर्माताओं से उनके उपकरणों का सोर्स कोड यानी फोन को चलाने वाले मूल प्रोग्रामिंग निर्देश – सरकार के साथ साझा करने की शर्त प्रस्तावित कर रही है.

गोपनीयता और पारदर्शिता से जुड़े कार्यकर्ताओं ने सरकार की आलोचना की है. उनका कहना है कि सरकार ने स्मार्टफोन कंपनियों के साथ बिना किसी सार्वजनिक परामर्श के द्विपक्षीय बातचीत की है और इस तरह के प्रस्ताव उपभोक्ताओं के मालिकाना अधिकार की अवधारणा को कमजोर करते हैं.

इस मामले पर रविवार (11 जनवरी) को प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) के फैक्ट चेक हैंडल ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) पर बयान जारी कर कहा कि रॉयटर्स की यह रिपोर्ट, जिसमें दावा किया गया है कि भारत सुरक्षा सुधार के तहत स्मार्टफोन निर्माताओं को उनका सोर्स कोड साझा करने के लिए मजबूर करने का प्रस्ताव दे रहा है, ‘फ़र्ज़ी’ है.

पीआईबी फैक्ट चेक में कहा गया है, ‘भारत सरकार ने स्मार्टफोन निर्माताओं को उनका सोर्स कोड साझा करने के लिए मजबूर करने का कोई प्रस्ताव नहीं दिया है.’

आगे कहा गया है, ‘इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने मोबाइल सुरक्षा के लिए सबसे उपयुक्त नियामक ढांचा तैयार करने के उद्देश्य से हितधारकों के साथ परामर्श की प्रक्रिया शुरू की है. यह किसी भी सुरक्षा या सेफ्टी मानकों को लेकर उद्योग के साथ होने वाली सामान्य और नियमित परामर्श प्रक्रिया का हिस्सा है. हितधारकों से परामर्श के बाद ही सुरक्षा मानकों से जुड़े विभिन्न पहलुओं पर उद्योग के साथ चर्चा की जाती है. अभी तक कोई अंतिम नियम तय नहीं किए गए हैं और भविष्य में जो भी ढांचा बनेगा, वह पूरी तरह उचित परामर्श के बाद ही तैयार किया जाएगा.’

रॉयटर्स की रिपोर्ट के मुताबिक, सॉफ्टवेयर कंपनियों ने 83 सुरक्षा मानकों के एक पैकेज का विरोध किया है, जिनमें सोर्स कोड साझा करना और बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट की जानकारी सरकार को देना शामिल है. रिपोर्ट में कहा गया है कि इंडियन टेलीकॉम सिक्योरिटी एश्योरेंस रिक्वायरमेंट्स के तहत सोर्स कोड का विश्लेषण किया जाएगा और संभव है कि उसे भारतीय प्रयोगशालाओं में जांचा भी जाए.

रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के प्रस्ताव में यह शर्त भी शामिल है कि कंपनियों को सॉफ्टवेयर में ऐसे बदलाव करने होंगे, जिससे पहले से इंस्टॉल किए गए ऐप्स को हटाया जा सके और ऐप्स को बैकग्राउंड में कैमरा और माइक्रोफोन इस्तेमाल करने से रोका जा सके, ताकि ‘दुर्भावनापूर्ण उपयोग’ से बचा जा सके.

रिपोर्ट में आईटी मंत्रालय के दस्तावेज़ों का विश्लेषण किया गया है, जिनमें एप्पल, सैमसंग, गूगल और शाओमी के साथ हुई बैठकों का विवरण है. इन बैठकों में स्मार्टफोन निर्माताओं ने चिंता जताई कि वैश्विक स्तर पर किसी भी देश ने इस तरह की सुरक्षा शर्तों को अनिवार्य नहीं किया है.

भारतीय सरकार के प्रस्तावों में यह भी शामिल है कि मोबाइल फोन में स्वतः और नियमित रूप से मैलवेयर स्कैनिंग अनिवार्य की जाए. साथ ही, डिवाइस निर्माताओं को बड़े सॉफ्टवेयर अपडेट और सुरक्षा पैच जारी करने से पहले नेशनल सेंटर फॉर कम्युनिकेशन सिक्योरिटी को इसकी जानकारी देनी होगी. रिपोर्ट के मुताबिक, केंद्र को इन अपडेट्स और पैच की जांच करने का अधिकार भी होगा.

सार्वजनिक परामर्श, स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं

इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन (आईएफएफ) ने एक बयान में कहा कि रॉयटर्स की रिपोर्ट में सामने आए इंडियन टेलीकॉम सिक्योरिटी एश्योरेंस रिक्वायरमेंट्स भले ही सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हों, लेकिन दूरसंचार विभाग ने इन्हें सार्वजनिक परामर्श के लिए नहीं रखा है.

आईएफएफ के बयान में कहा गया, ‘इन प्रस्तावों का कोई स्पष्ट वैधानिक आधार नहीं है और न ही यह दिखता है कि इन पर कोई सार्थक सार्वजनिक परामर्श किया गया हो. इन नियमों को तैयार करने की पूरी प्रक्रिया केंद्र सरकार और स्मार्टफोन निर्माताओं के बीच द्विपक्षीय बातचीत तक सीमित रही है.’

आईएफएफ ने आगे कहा कि संवैधानिक दृष्टि से सुप्रीम कोर्ट का जस्टिस केएस पुट्टास्वामी बनाम भारत संघ फैसला स्पष्ट करता है कि सूचनात्मक गोपनीयता एक मौलिक अधिकार है और राज्य द्वारा इसमें किसी भी तरह का हस्तक्षेप तभी वैध माना जा सकता है, जब वह वैधता, आवश्यकता और अनुपातिकता की कसौटी पर खरा उतरे.

आईएफएफ ने इन प्रस्तावों को ‘तकनीकी रूप से अव्यवहारिक और खतरनाक’ बताया है.

आईएफएफ के मुताबिक, दुनिया के सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाले ऑपरेटिंग सिस्टम्स के सोर्स कोड को सरकार के पास केंद्रीकृत करना राज्य और गैर-राज्य साइबर हमलावरों के लिए एक तरह का ‘हनीपॉट’ तैयार करता है. अगर इसमें सेंध लग जाती है, तो देश में मौजूद हर एंड्रॉयड और आईओएस डिवाइस की सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है.

आईएफएफ ने यह भी कहा कि लॉग-इन प्रयासों और ऐप इंस्टॉलेशन का 12 महीने का रिकॉर्ड रखना किसी व्यक्ति के निजी जीवन, उसके संबंधों और रुचियों का बेहद विस्तृत नक्शा तैयार कर देता है, जो डेटा संरक्षण के ‘उद्देश्य-सीमितता’ सिद्धांत का उल्लंघन है.

इसके अलावा, संगठन ने सॉफ़्टवेयर अपडेट के बारे में सरकार को पहले से सूचना देने की अनिवार्यता को भी उल्टा असर डालने वाला बताया. आईएफएफ का कहना है कि सुरक्षा पैच समय के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं और सरकार की पूर्व-अनुमति की शर्त लगाने से नौकरशाही देरी होगी, जिसके दौरान उपयोगकर्ता सक्रिय साइबर हमलों के प्रति असुरक्षित बने रहेंगे.

‘कुल मिलाकर, ये प्रस्ताव इस बात को सूक्ष्म स्तर पर नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं कि उपयोगकर्ता अपने ही उपकरणों का इस्तेमाल कैसे करें, जिससे स्वामित्व की अवधारणा ही कमजोर हो जाती है.’

इस बीच, न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय टेलीविज़न निर्माताओं को पत्र लिखने की तैयारी में है, जिसमें उनसे स्मार्ट टीवी पर प्रसार भारती के ओटीटी ऐप वेव्स (WAVES) को पहले से इंस्टॉल करने का आग्रह किया जाएगा.

यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है, जब कुछ ही हफ्ते पहले सरकार ने स्मार्टफोन निर्माताओं से अपने साइबर सुरक्षा सॉफ्टवेयर संचार साथी को मोबाइल फोनों में प्री-इंस्टॉल करने को कहा था.

हालांकि, स्मार्टफोन कंपनियों, नागरिक अधिकार कार्यकर्ताओं और विपक्षी दलों की कड़ी आलोचना और विरोध के बाद सरकार को यह आदेश वापस लेना पड़ा था.