एक विद्यार्थी ने मुझसे पूछा है कि गुरु-शिष्य परंपरा के बारे में मेरी क्या राय है. मुझे क्लास में हुई चर्चा की याद दिलाते हुए पूछा है कि आज के संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता क्या हो सकती है? क्या यह सकारात्मक है या नकारात्मक? यह भी पूछा है कि विशेषकर संगीत की शिक्षा के संदर्भ में इसे किस तरह देखा जाए. संगीत के साथ नृत्य को भी जोड़ा जा सकता है.
संगीत का संदर्भ आते ही मुझे गायक, संगीतकार टीएम कृष्णा का 5 साल पहले छपा एक लेख याद आ गया. उस लेख में उन्होंने गुरु-शिष्य परंपरा या उस संस्था को पूरी तरह ख़त्म कर देने की बात कही थी.
उनके मुताबिक़, गुरु शिष्य नामक संस्था में स्थायी रूप से शक्ति असंतुलन है. लेकिन यहां इस असंतुलन का महिमामंडन किया जाता है. इस संस्था में शिष्य को न सिर्फ़ गुरु के अधीन रहना है बल्कि उसे ख़ुद को पूरी तरह गुरु को समर्पित कर देना होता है. इसकी संरचना ही दोषपूर्ण है. गुरु से प्रश्न करना अपराध है. असहमति का भी प्रश्न नहीं उठता संगीत और कला के कुछ अन्य क्षेत्रों में ऐसे क़िस्सों की भरमार है जिनमें बतलाया जाता है कि शिष्य के रूप में स्वीकार करने के पहले किस तरह गुरु ने कड़ी परीक्षाएं लीं. उनका संबंध ज्ञान से नहीं था. गुरु के घर के बरतन मांजने या सफ़ाई करने या और काम हफ़्तों तक करने के बाद जब गुरु के प्रति निष्ठा या भक्ति साबित हो जाए तब गुरु शिक्षा देने को तैयार होते हैं.
गुरु को दैवी गुणों से युक्त माना जाता है. दार्शनिक अरविंद का कहना है कि जब हम गुरु के सामने समर्पण करते हैं तो मानवीय नहीं, उसके भीतर के दैवी तत्त्व के आगे खुद को समर्पित कर रहे होते हैं. लेकिन इस दैवी तत्त्व का सत्यापन कौन करता है? इसके लक्षण क्या हैं?
कृष्णा का लेख हिंदुस्तानी संगीत में प्रख्यात गुंदेचा बंधुओं के ऊपर अपनी शिष्यों के साथ यौन दुराचार के आरोपों के संदर्भ में लिखा गया था. उन्होंने लिखा कि संगीत और नृत्य के क्षेत्र में इस तरह की बातों को लेकर कानाफूसी होती रही है लेकिन बहुत कम में साहस होता है कि वे इसे प्रकट कर सकें. इन क्षेत्रों में जो ताकतवर गुरु हैं, उनके ख़िलाफ़ जाने की क़ीमत बहुत अधिक हो सकती है.
गुरुओं में पेशेवर प्रतिद्वंद्विता भले हो, इस मामले में वे गुरु की सत्ता पर आंच नहीं आने दे सकते. इसलिए उनमें एक अलिखित समझौता होता है कि इस पर वे मुंह नहीं खोलेंगे जैसे गुंदेचा बंधुओं के प्रसंग में संगीत के दिग्गज ख़ामोश रहे थे.
गुरु शिष्य परंपरा में गुरु प्रश्नातीत है. गुरु के निर्णय पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. कृष्णा के लेख से प्रेरित होकर वायुसेना के एक अधिकारी ने अपने प्रशिक्षण के अनुभव के बारे में लिखते हुए एक घटना का ज़िक्र किया.
प्रशिक्षण के एक सत्र में प्रशिक्षक ने एक प्रशिक्षु के प्रश्न का उत्तर देने की जगह उसे सबके सामने बुलाया और कहा, ‘तुम्हें उत्तर चाहिए. यह रहा तुम्हारा उत्तर.’, और एक झन्नाटेदार झापड़ लगाया. प्रशिक्षु दांत भींचे हुए वापस अपनी सीट पर आया. उसकी आंखों में अपमान के आंसू उमड़ रहे थे. पूरी क्लास ख़ामोश रही क्योंकि गुरु पर सवाल नहीं उठाया जा सकता. उस अधिकारी के ख़िलाफ़ किसी कार्रवाई का प्रश्न ही नहीं था. इस अधिकारी ने लिखा कि मैंने भी इस तरह की हिंसा के बारे में खामोशी रखकर अपराध किया था.
कृष्णा ने ठीक ही लिखा है कि संभव है, इस मामले में लोगों के निजी अनुभव भिन्न-भिन्न हों लेकिन विचार हमें संस्था मात्र पर करना होगा.
गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु का निर्णय सर्वोपरि है. किसे शिष्य के रूप में स्वीकार किया जाएगा, इसके बारे में उसे किसी को कोई सफ़ाई नहीं देनी. शिष्य को कब दीक्षित माना जाएगा, यह भी पूरी तरह गुरु की इच्छा पर निर्भर है. गुरु की निरंकुशता के बिना यह संस्था नहीं चल सकती.
चूंकि यह प्रश्न भारतीय संदर्भ में उठाया जा रहा है, इस पर ध्यान दिए बिना हम नहीं रह सकते कि इसका एक संबंध हमारी जाति व्यवस्था से भी है. गुरु होने का अधिकार किसे है? वह किसे शिष्य के रूप में स्वीकार करेगा?
हिंदुओं की मिथकीय स्मृति में दो गुरुओं की कथा प्रसिद्ध है: द्रोणाचार्य की कथा जिसमें उन्होंने एकलव्य का अंगूठा गुरु दक्षिणा के तौर पर मांग लिया हालांकि उसे उन्होंने कोई शिक्षा नहीं दी थी. दूसरी कथा परशुराम की है जिनसे अपनी जाति छिपाकर कर्ण ने शिक्षा ली थी. उसकी सज़ा कर्ण को गुरु ने यह दी कि जब उसे सबसे अधिक ज़रूरत हो, तभी परशुराम से ग्रहण की गई विद्या वह भूल जाए. यह इसलिए कि उसने अपनी जाति छिपा ली थी.
दोनों कथाओं में शिष्य की जाति और कुल, शिष्य के रूप में उन्हें स्वीकार किए जाने के रास्ते में बाधक है.
यह विडंबना ही है कि खेल के पुरस्कार द्रोणाचार्य के नाम पर दिए जाते हैं और किसी ने इस पर अब तक आपत्ति नहीं उठाई है. इससे भी मालूम होता है कि हमारे सांस्कृतिक अवचेतन में जाति कितनी गहरी गड़ी हुई है. अगर यह भी देखें कि आज कौन लोग हैं जो गुरु-शिष्य परंपरा की वापसी चाहते हैं तो हमारी समझ में आ जाएगा कि यह वास्तव में ‘उच्च जाति’ वालों की फिर से शिक्षा पर एकाधिकार की इच्छा की ही अभिव्यक्ति है.
यह मांग शायद ही कभी अनुसूचित जाति या जनजाति समूहों की तरफ़ से की जाए क्योंकि गुरु-शिष्य परंपरा ने ही उन्हें शिक्षा के परिसर में प्रवेश से रोक रखा था. गुरु-शिष्य परंपरा सांस्कृतिक पूंजी को ‘उच्च जाति’ तक सीमित रखने का ही काम करेगी. यह भी सहज ही कल्पना की जा सकती है कि किस जाति के गुरु का शिष्य कोई बनना चाहेगा.
आधुनिक शिक्षा समानता के सिद्धांत पर टिकी हुई है. इसके अलावा इसमें किसी का प्रवेश निषिद्ध नहीं है. बल्कि कल तक जिनके लिए शिक्षा के परिसर के दरवाज़े बंद थे, उनके लिए ख़ास व्यवस्था की जा रही है कि वे इसमें प्रवेश कर सकें. इसमें प्रवेश में प्रवेश देने वाले की इच्छा की कोई जगह नहीं है और यह प्रक्रिया निर्वैयक्तिक है जबकि गुरु शिष्य परंपरा या संस्था में गुरु की इच्छा ही सर्वोपरि है. अगर यह पद्धति लागू की जाए तो आबादी के कौन-से हिस्से शिक्षा से बाहर रह जाएंगे, इसके बारे में अनुमान करने की भी ज़रूरत नहीं.
समानता मात्र विद्यार्थी के प्रवेश तक सीमित नहीं है. इसका एक उद्देश्य समाज में समानता के उसूल को स्थापित करना भी है. आधुनिकता के साथ शिक्षा में सार्वभौमिकता के सिद्धांत की क्रमश: स्वीकृति बढ़ती गई है. ज्ञान का अधिकार सबको है और यह दायित्व राज्य का है कि वह इसे सुनिश्चित करे. उसी के साथ यह ख़याल भी कि ज्ञान या कौशल का कोई क्षेत्र किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं होगा बल्कि हर क्षेत्र हर किसी के लिए खुला होगा. उदाहरण के लिए सैन्य शिक्षा एक जाति विशेष के लिए नहीं, किसी राज परिवार की रक्षा के लिए नहीं, बल्कि समाज मात्र की हिफ़ाज़त के लिए आवश्यक है. इसलिए इसमें सबका प्रवेश हो सकता है.
इसके अलावा आज की शिक्षा प्रणाली में पाठ्यचर्या भी सामूहिक विचार विमर्श से तय की जाती है, किसी एक की मर्ज़ी से नहीं बनती. एक विद्यार्थी को एक ही नहीं, अनेक अध्यापकों के साथ काम करना चाहिए. विचार और विश्लेषण के कई तरीक़े हैं, ज्ञान की भी कई पद्धतियां हैं. विद्यार्थी किसी एक के साथ बंधे नहीं रह सकते, अपना चुनाव अवश्य कर सकते हैं. उनकी वफ़ादारी किसी एक गुरु से नहीं, अपने ज्ञान के क्षेत्र से है.
फिर ज्ञान का हर क्षेत्र दूसरे से जुड़ा है. तो इसकी व्यापक समझ होना भी आवश्यक है. यह किसी एक ‘गुरु’ के शिष्य होने मात्र से संभव न होगा. लेकिन जैसा अरविंद कहते हैं, भारतीय परंपरा के अनुसार शिष्य की वफ़ादारी एक गुरु से ही होनी चाहिए.
आधुनिक शिक्षा का उद्देश्य यथास्थिति बनाए रखना नहीं इसमें परिवर्तन करना है. वह परिवर्तन एक ही दिशा में नहीं होता. गुरु शिष्य परंपरा वास्तव में समाज में वर्चस्व को बनाए रखने का काम करती है,उसे विचलित करने का नहीं.
आधुनिक शिक्षा प्रश्न की स्वतंत्रता पर टिकी हुई है. गुरु शिष्य परंपरा इसकी इजाज़त नहीं देती. गुरु शिष्य परंपरा में शिष्य को अपना अहम त्याग देना है, पूरी तरह निःस्व हो जाना है, गुरु के शब्द को अंतिम समझना है. जबकि आधुनिक शिक्षा का मक़सद अपने स्वतंत्र स्वर और अपनी स्वायत्तता को हासिल करना है. इसमें कई बार जो सर्वस्वीकृत है, उसका अस्वीकार भी करना पड़ता है.
शिक्षा का बड़ा उद्देश्य जनतांत्रिक भावना और विचार के लिए दायरा बड़ा करना है. क्या गुरु शिष्य परंपरा इसमें मदद करती है?
भारत में आजकल गुरु शिष्य परंपरा का जो गुणगान किया जा रहा है, उसका कारण यह है कि सत्ता अब स्वतंत्र मन और मस्तिष्क वाले नागरिक नहीं चाहती, आज्ञाकारी, सत्ता के आगे समर्पणशील जन चाहती है. शिक्षा का काम इसके प्रति लोगों को सावधान करना और उनके भीतर आलोचनात्मक नज़रिया विकसित करना है. गुरु-शिष्य परंपरा इसमें बाधक है, साधक नहीं.
(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)
