वैसे तो यह बात भी अपने आप में किसी विडंबना से कम नहीं कि जब ‘दुनिया का चौधरी’ हमारे देश और प्रधानमंत्री के स्वाभिमान से खिलवाड़ का एक भी मौका न छोड़ रहा हो, उसके किसी भी तरह के प्रतिकार के प्रति उदासीन दिख रहे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी किसी आक्रांता द्वारा एक हजार साल पहले किए गए सोमनाथ मंदिर के विध्वंस को लेकर आयोजित ‘स्वाभिमान पर्व’ की ‘शौर्य यात्रा’ में डमरू बजाते नजर आएं और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल देश के युवाओं से इतिहास का प्रतिशोध लेने की बात कहने लग जाएं!
लेकिन सच पूछिए तो इससे भी बड़ी विडंबना यह है कि भरपूर डमरू बजाकर भी न प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के अपने पुराने भूत को खुद से दूर भगा पाएं, न डोभाल यह बता पाएं कि इतिहास के जिस प्रतिशोध की वे बात कर रहे हैं, वह किनसे लिया जाना है?
उन देशों से, जहां से, उन्हीं के शब्दों में कहें तो, हमारे गांव जलाने, सभ्यता समाप्त करने और मंदिरों को तोड़ने व लूटने वाले आक्रांता आए या उन देशवासियों से, जिन्हें बेवजह उक्त आक्रांताओं से जोड़कर लांछित करने व उनके इतिहास की सजा देने का एक भी मौका छोड़ना उनको गवारा नहीं है?
अगर ‘उन देशों’ से, तो इसका एक अर्थ पड़ोसियों से युद्ध है और ‘उन देशवासियों’ से तो यह देश को गृहयुद्ध के हवाले करने का पर्याय है. इसलिए डोभाल जानबूझकर यह भी नहीं बताते कि क्या राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के तौर पर उन्हें किसी भी रूप में युवाओं को इसके लिए भड़काना शोभा देता है?
बहरहाल, प्रधानमंत्री पर ही केंद्रित करें तो उक्त ‘सोमनाथ स्वाभिमान पर्व’ के दौरान उन्होंने अपने ब्लॉग में नेहरू को भरपूर कोसते हुए उनके भूत को जगाया तो तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की इस बात को लेकर मुक्त कंठ से प्रशंसा भी की कि नेहरू द्वारा किए गए प्रबल विरोध को दरकिनार कर वे 11 मई, 1951 को पुनर्निमित सोमनाथ मंदिर के प्राण-प्रतिष्ठा समारोह के लिए शिवलिंग की स्थापना के समय वहां न सिर्फ उपस्थित हुए बल्कि वहां आए लोगों को संबोधित भी किया.
इस प्रशंसा के बाद मोदी भक्तों ने इसको लेकर भी नेहरू को भरपूर कोसना शुरू कर दिया कि उनकी सरकार द्वारा ऑल इंडिया रेडियो (तब तक वह आकाशवाणी नहीं बना था) को डॉ. प्रसाद के उक्त संबोधन के प्रसारण से ही रोक दिया गया था!
यह इस सुविदित तथ्य के अनुरूप ही था कि अनुकूलित सत्यों व तथ्यों से काम चलाने के अभ्यस्त इन भक्तों को किसी भी घटनाक्रम को तार्किक दृष्टिकोण से या समग्रता में जाकर देखने का न तो अभ्यास है, न ही उसकी जरूरत महसूस होती है. होती तो इस मामले में उनकी सबसे ज्यादा दिलचस्पी डॉ. प्रसाद के उस भाषण में होनी चाहिए थी, (उनके अनुसार) जिससे डरी हुई नेहरू सरकार ने उसे रेडियो पर प्रसारित नहीं होने दिया था.
लेकिन उन्हें उसमें थोड़ी भी दिलचस्पी अपवादस्वरूप ही दिखाई देती है, जबकि वह इतना दुर्लभ भी नहीं कि उस तक पहुंच बनाना बहुत मुश्किल हो. वह कई समाचार व संवाद माध्यमों में प्रमुखता से उपलब्ध है, जिनमें से एक में तो उसे ‘आधुनिक भारत को आकार देने वाला’ भी बताया गया है.
लेकिन इन भक्तों के दुर्भाग्य से उसमें, उनके द्वारा बहुप्रचारित नेहरू व डॉ. प्रसाद की ‘दुश्मनी’ के बावजूद ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे नेहरू या उनकी सरकार की नीतियों से डॉ. प्रसाद की असहमतियां नाराजगी के रूप में देखा या उनके खिलाफ बताया जा सकता हो.
आज की तारीख में यह मानने के एक नहीं अनेक कारण हैं कि डॉ. प्रसाद ने उक्त भाषण में नेहरू सरकार की धर्मनिरपेक्षता की नीति (जिसे लेकर उन्होंने डॉ. प्रसाद को राष्ट्रपति के तौर पर सोमनाथ मंदिर के उक्त समारोह में जाने से विरत करना चाहा था) के विरुद्ध एक शब्द भी कहा होता तो उसका मजाक उड़ाने में कभी कुछ भी उठा न रखने वाली हिंदुत्ववादी मोदी समर्थकों की जमात उसे ले उड़ती और उसका बारम्बार उद्घोष करके नेहरू की और लानत मलामत करती.
लेकिन उसकी बेचारगी कि डॉ. प्रसाद ने अपने नेहरू से अपनी सारी ‘असहमतियों’ को धता बताकर धर्मनिरपेक्षता को आदर्श बताते हुए कहा था: ( महान सत्य की अनुगामी) आस्था और दृढ़ विश्वास ने भारत को धर्मनिरपेक्षता की नीति अपनाने और यह आश्वासन देने के लिए प्रेरित किया है कि धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं किया जाएगा. सभी को समान अवसर प्रदान किए जाएंगे.
इस क्रम में आगे वे थोड़े व्यक्तिगत हो गए थे: ‘इस (धर्मनिरपेक्ष) आदर्श के अनुरूप, मैं सभी धर्मों के प्रति सम्मान और स्नेह रखता हूं. यद्यपि मैं आस्था और दैनिक आचरण से एक सनातनी हिंदू हूं… मैं न केवल सभी धर्मों और उनके पूजा स्थलों का सम्मान करता हूं, बल्कि जब भी संभव हो, मैं उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने भी जाता हूं…(उसी भाव से)जिस भाव से मैं अपने धर्म के मंदिरों में जाता हूं.’
भाषण में उनका निष्कर्ष था कि धार्मिक असहिष्णुता की नीति हमेशा से विफल रही है और आगे भी विफल रहेगी. लेकिन वे इस निष्कर्ष पर ही नहीं रुके थे. उन्होंने उस बहुलवाद का भी भरपूर पक्षपोषण किया था, जिसे हम देश की विरासत की सबसे बड़ी थाती मानते और उस पर गर्व करते नहीं अघाते हैं.
उन्होंने कहा था: हम सभी के लिए आध्यात्मिक आस्था के इस महान रहस्य को समझना वांछनीय है कि ईश्वर या सत्य के दर्शन हेतु सभी मनुष्यों के लिए एक ही मार्ग का अनुसरण करना आवश्यक नहीं है.
इसके विपरीत, यदि मनुष्य अपने साथी मनुष्यों की सेवा में पूर्ण प्रेम और विश्वास के साथ स्वयं को समर्पित कर दे और इस पृथ्वी पर प्रेम एवं सौंदर्य के साम्राज्य की स्थापना के लिए स्वयं को समर्पित कर दे, तो वह ईश्वर को अवश्य प्राप्त कर सकेगा, चाहे उसकी उपासना किसी भी प्रकार से की जाए.
इसको ‘महान सत्य’ बताते हुए उन्होंने अपनी बात के समर्थन में उन प्राचीन ऋषियों का हवाला दिया था, उनके अनुसार जिन्होंने उसे अनुभव कर मानव जाति के समक्ष निरंतर उद्घोषित किया था कि यद्यपि ईश्वर एक है, फिर भी ज्ञानीजन उसका अनेक रूपों और अनेक नामों से वर्णन करते हैं.
‘महाभारत’ के हवाले से उन्होंने यह भी कहा था कि सभी मार्ग ईश्वर की ओर ले जाते हैं, जैसे सभी नदियां सागर की ओर प्रवाहित होती हैं.
अब जरा डोभाल का इतिहास के प्रतिशोध का वह आह्वान याद कीजिए, जो उन्होंने ‘विकसित भारत यंग लीडर्स डायलॉग- 2026’ में बोलते हुए युवाओं से किया. उन्होंने कहा, ‘हमारे गांव जले, हमारी सभ्यता को समाप्त किया गया, हमारे मंदिरों को लूटा गया…हमें अपने इतिहास का प्रतिशोध लेना है.’
उनके इन ‘आप्तवचनों’ के विपरीत डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने कहा था: भारत में विभिन्न धर्मों की यात्रा दर्शाती है कि कैसे पारस्परिक सम्मान विविध समुदायों के बीच सद्भाव को बढ़ावा दे सकता है. दुर्भाग्यवश, जीवन और आस्था के इस महान सत्य को अनेक युगों में लोगों ने ठीक से नहीं समझा, जिसके कारण विभिन्न देशों और लोगों के बीच अत्यंत विनाशकारी और भयानक युद्ध हुए.
डॉ. प्रसाद के अनुसार इसका इतिहाससिद्ध सबक यह है कि ‘धार्मिक असहिष्णुता का मनुष्यों में कटुता और अनैतिकता उत्पन्न करने के अलावा और कोई परिणाम नहीं हो सकता.’ इसलिए ‘मैं चाहता हूं कि मेरे सभी देशवासी इसे दृढ़ता से समझें… कि सर्वोत्तम मार्ग यही है कि हम सभी समुदायों और पंथों के प्रति सम्मान और समानता की भावना से व्यवहार करें. इसी में हमारे राष्ट्र और हम सभी का कल्याण निहित है.’
सवाल है कि क्या डॉ. प्रसाद के ये कथन डोभाल के आह्वान के सर्वथा विलोम नहीं हैं? खासकर, जब उन्होंने यह भी साफ कर दिया था कि (सोमनाथ में) इतिहास की टूटी हुई कड़ी को फिर से स्थापित करने का यह अर्थ नहीं है कि हम अपने देश में उन मनोवैज्ञानिक, सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक परिस्थितियों को पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं या करना चाहिए, जो सदियों पहले यहां विद्यमान थीं.
क्योंकि समय की दुनिया में, मनुष्य के पास आगे बढ़ते रहने के अलावा कोई विकल्प नहीं है. वास्तव में, वह भविष्य के लिए कुछ प्रकाश और मार्गदर्शन पाने के लिए पीछे मुड़कर देख सकता है, लेकिन वह कभी वापस नहीं लौट सकता.
इतिहास का बदला लेने के लिए लोगों को मनुष्य ही न रहने देने पर आमादा शक्तियों के दुर्भाग्य से डॉ. प्रसाद ने साफ-साफ यह भी कह दिया था कि ‘हमारा प्रयास इतिहास को सुधारने का नहीं’, बल्कि दुनिया के सामने यह घोषणा करने का है कि आध्यात्मिक जीवन का महान सत्य यह सिखाता है कि प्रत्येक व्यक्ति को जीवन के उस सर्वोच्च गौरव तक पहुंचने के लिए पूर्ण स्वतंत्रता और अवसर प्राप्त होने चाहिए, जिसके लिए उसका अनुभव और प्राकृतिक प्रतिभा उसे पात्र बनाती है.
इसके साथ ही, उन्होंने इस प्रतिज्ञा को कर्तव्य बताया था कि’ जिस प्रकार हमने इस ऐतिहासिक मंदिर- जो हमारी प्राचीन आस्था का प्रतीक है – का जीर्णोद्धार किया है, उसी प्रकार अपने लोगों की समृद्धि के मंदिर में भी नवजीवन डालेंगे.’
उनका विचार था कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार तभी पूरा होगा जब हमारी समृद्धि का मंदिर स्थापित हो जाएगा. दूसरे शब्दों में, जब हम अपनी संस्कृति के स्तर को इतना ऊंचा उठाएंगे कि यदि कोई आधुनिक अल-बरूनी हमारे देश को देखे, तो वह हमारी संस्कृति के बारे में उन्हीं भावपूर्ण शब्दों में अपनी बात कहे, जैसे एक हज़ार साल पहले अल-बरूनी ने अपने समय के भारत के बारे में अपनी बात कही थी.
जाहिर है कि इस भाषण में वे किसी भी मामले में कहीं से भी मोदी भक्तों व हिंदुत्ववादियों का पक्ष नहीं लेते. उनके साथ एक कदम भी नहीं चलते, न उनकी बात करते हैं. इसलिए भक्त इसकी चर्चा से परहेज़ करते हुए सिर्फ यह प्रचारित करते रहते हैं कि वे नेहरू के विरोध के बावजूद सोमनाथ के समारोह में भाग लेने गए थे.
हां, जानकारों के अनुसार इसके कुछ वर्षों बाद वे फिर सोमनाथ गए थे. लेकिन क्या इतने भर से वे ‘सनातनी हिंदू’ नहीं रह जाते (भले ही उक्त भाषण में खुद को यही पहचान बताते हों) और हिंदुत्ववादी हो जाते हैं?
क्या यह उसी तरह का मामला नहीं है, जैसे हिंदुत्ववादियों ने सरदार वल्लभभाई पटेल को बरबस अपने पाले में खींचकर ‘अपना’ बना लिया है?
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
