बंगनामा: बांकुड़ा से परिचय

बांकुड़ा कई साम्राज्यों के अधीन रहा, अंग्रेज़ों ने भी यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं, कृषि चक्र, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ, तथा स्थानीय देवी-देवताओं का प्रभाव बना रहा.

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बांकुड़ा ज़िला कुछ अहम मायनों में बंगाली परंपराओं और रीतियों का संरक्षित द्वीप बना रह गया जहां बाहर की शक्तियों का प्रभाव न्यूनतम रहा है. (फोटो साभार: फेसबुक)

अलीपुरद्वार से अगस्त 1993 में मेरा तबादला हो गया. पश्चिम बंगाल के लाल माटी वाले पश्चिमी भाग को राड़ बांग्ला के नाम से जाना जाता है. इसी क्षेत्र में स्थित बांकुड़ा ज़िले में मैंने अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट (एडीएम) एवं ज़िला परिषद के अतिरिक्त कार्यकारी पदाधिकारी का पद ग्रहण किया. बांकुड़ा शहर ज़िला का प्रशासनिक मुख्यालय तथा वाणिज्यिक केंद्र बिंदु है. कुछ लोग कहते हैं कि बांकुड़ा का नाम वहां के राजा बांकू राय के नाम पर पड़ा है, कुछ अन्य का कहना है कि बिष्नुपुर के राजकुमार बीर बांकुड़ा ने इस शहर को अपने नाम से स्थापित किया था.

बांकुड़ा ज़िले की पहचान एक ग्रामीण, कृषि प्रधान ज़िले की थी क्योंकि उद्योग के नाम पर उस वक्त कुछ चावल मिलों के अलावा वहां और कुछ न था. साथ ही वहां की कृषि भूमि का एक बड़ा अंश अब खेती के लिए वर्षा पर आश्रित नहीं रह गया था. ज़िले के उत्तर में दामोदर बराज तथा दक्षिण में कंशावती नदी पर मुकुटमणिपुर बांध के निर्माण और इनसे निकले नहर व्यवस्थाओं की वजह से कई इलाक़ों के कृषि उत्पादन में अच्छी-ख़ासी उन्नति हुई थी. पर जैसा कि मुझे कुछ ही दिनों में ज्ञात हुआ, हर पिछड़े क्षेत्र में ‘उन्नति’ का अर्थ एक नहीं होता.

बांकुड़ा ज़िला मेरे लिए संपूर्णतः नया था इसलिए शुरुआत के कुछ सप्ताह मैंने ज़िला परिषद तथा प्रशासन द्वारा लागू किए जा रही योजनाओं का निरीक्षण करते हुए नई जगह को समझने का प्रयत्न किया. जैसा मैंने इस स्तंभ में पहले (बंगनामा 20) साझा किया है, उन दिनों देश भर में साक्षरता का मान बढ़ाने के लिए ज़ोर-शोर से राष्ट्रीय अभियान चलाया जा रहा था. बांकुड़ा ज़िले में भी यह अभियान कुछ दिनों पूर्व आरंभ किया गया था.

एक दिन मैं ज़िले के दक्षिणी भाग में स्थित ख़ातरा 2 ब्लॉक के बहरामुड़ी गांव में एक साक्षरता शिविर में बैठा आठ-दस महिलाओं से बातें कर रहा था. हर एक के सामने या हाथ में नई चमकती साक्षरता की किताब थी. अधिकतर महिलाएं मुझे पहले पन्ने  का पाठ पढ़ कर सुनाने की कोशिश कर रही थीं. उनमें से किसी के पास न तो कॉपी थी न पेंसिल. मैं समझ गया था कि यहां पढ़ाने, पढ़ने और इनकी देख-रेख की सख़्त ज़रूरत है.

उनसे बातें करते-करते मुझे पता चला कि मज़दूरी के अलावा वे साल के पेड़ के पत्तों से दोने और पत्तल बनाती हैं और हर सप्ताह उसे हाट में बेचती हैं. उनमें से एक से मैंने पूछा, ‘ए बार हाटे कोतो टाका रोज़गार कोरलेन? (इस बार हाट में आपने कितने रुपये कमाये?).’ उस महिला के उत्तर को सुन कर मैं चकरा गया. उसने कहा, ‘दुई कुड़ी पांच टाका. (दो बीस पांच रुपये).’

मैंने स्थानीय एसडीओ की ओर देखा तो उन्होंने बताया, ‘सार, ओ बोलचे पैंताल्लिश टाका (सर, वो कह रही हैं पैंतालीस रुपये.).’ फिर उन्होंने मुझे समझाया कि ज़िले के गांवों में निरक्षर गरीब लोग एक से बीस तक ही गिन सकते हैं. उसके आगे फिर वह इसी तरह काम चलाते हैं- बीस के पुंज बनाकर. विस्मित मैंने पूछा, ‘ताले तो मात्रो चार शो परजंत जावा जाय. (तब तो चार सौ तक ही ज़ाया जा सकता है).’

एसडीओ ने कहा, ‘बोधाय तारचेए बेशी जावार ओदेर दरकार होय ना (शायद इससे ज़्यादा गिनने की इन्हें ज़रूरत नहीं पड़ती).’

यह भी मार्के की बात थी कि आर्थिक एवं शिक्षा के क्षेत्रों में सीमित विकास के बावजूद ज़िला इतिहास, संस्कृति, तथा हस्तशिल्प के क्षेत्रों में अत्यंत समृद्ध था. बांकुड़ा पहुंचने के चंद दिनों के बाद ही कलेक्टेरेट में मेरा परिचय हुआ ज़िला समाज कल्याण अधिकारी श्री राम चंदर शुक्ल से जो एक शौक़िया पुरातत्ववेत्ता भी थे. उन्होंने ज़िले के संबंध में कई रुचिकर बातें बताईं जिनमें यह भी था कि यहां सुसुनिया पहाड़ के आस-पास पुरा-पाषाण तथा मध्य-पाषाण युग के मानव वास के चिह्न तथा अवशेष मिले है और पहाड़ के नीचे एक छोटे झरने के पास ही स्थित है इस राज्य का सबसे पुराना, चौथी शताब्दी, गुप्त काल का शिलालेख.

क़रीब एक महीने बाद की बात है, वर्षा का समय था और दिन के कोई तीन बजे होंगे. बारिश तभी थमी थी और मैं तथा श्री राम चंदर शुक्ल दौरे के बाद सुसुनिया पहाड़ के पास से गुजरते हुए बांकुड़ा लौट रहे थे. शुक्ल जी ने मुझसे पूछा, ‘सर, अभी मौसम अच्छा है. क्या आप उस जगह जाना चाहेंगे जहां पुरा-पाषाण औज़ार मिले हैं?’ तब मैं ‘मौसम’ से उनका अभिप्राय नहीं समझ सका मगर मैंने हामी भर दी.

उन्होंने ड्राइवर को गाड़ी पहाड़ी के नीचे जंगल के किनारे एक रास्ते से ले जाने को कहा. आगे जाकर हम एक ढालान के पास रुक गए. हमारे सामने एक कालातीत दृश्य था. बारिश के बहते पानी की पतली उंगलियां मानो ढलान के चेहरे से कंकरीले लाल मिट्टी के परतों को हटा कर छिपे पाषाण रहस्यों को उजागर कर रही थीं. हमारे पुरातत्ववेत्ता ने दिखाया कि कैसे बिना बड़ी क्षति पहुंचाए हुए उस ढलान के उभरे हुए सतह की छानबीन की जा सकती है.

इन्हीं में हमें चकमक पत्थर के कुछ रूखे हस्त कुल्हाड़ी भी मिले, जो शुक्ल जी के अनुसार क़रीब 20,000 से 40,000 वर्ष पुराने यानी पुरा-पाषाण काल के थे. वहां से वे मुझे पहाड़ी के ऊपर एक अन्य स्थान पर ले गए जहां हमें पत्थरों के बीच कुछ सख़्त काले और स्लेटी पत्थर से बने तीक्ष्ण और तेज तीर के टूटे नोक भी मिले, जो मध्य पाषाण युग के थे. इन्हीं हथियारों से उस काल के मानव जानवरों का शिकार कर अपना पेट भरते होंगे. कुछ वक्त के लिए हम समय यात्री हो गए थे.

केवल इतिहास ही नहीं मुझे बांकुड़ा ज़िले में बंगाल की ग्रामीण कृषि-निर्भर लोक संस्कृति को नज़दीक से देखने का अवसर भी मिला. मेरी समझ में बांकुड़ा ज़िला कुछ अहम मायनों में बंगाली परंपराओं और रीतियों का संरक्षित द्वीप बना रह गया जहां बाहर की शक्तियों का प्रभाव न्यूनतम रहा है. बांकुड़ा से 36 किलोमीटर पूरब की ओर स्थित है बिष्नुपुर शहर जो एक हज़ार वर्ष से अधिक अवधि तक मल्ल वंश के राजाओं का राजधानी था. इसीलिए यह क्षेत्र मल्लभूम के नाम से भी जाना जाता है.

इस राज्य को अफ़ग़ानों ने (15 वीं सदी) तथा मुग़ल साम्राज्य ने (16 वीं सदी) अपने अधीन तो किया पर इस पर राज नहीं किया बस वार्षिक शुल्क लेते रहे. इसी तरह मराठों ने मल्लभूम पर कई धावे किए, बहुत लूट-पाट और बर्बादी मचायी पर कभी यहां शासन नहीं किया. अंग्रेजों ने यहां शासन किया और राजस्व भी बटोरा लेकिन ग्रामीण समाज तथा रीति रिवाज़ों पर कोई छाप नहीं छोड़ पाए. यहां के वासियों के जीवन पर ऋतुओं का, कृषि चक्र का, चैतन्य महाप्रभु और वैष्णव पंथ का, तथा स्थानीय देवी देवताओं का प्रभाव बना रहा. इसीलिए आपको बांकुड़ा में गांवों के प्रवेश मार्ग के पास खड़े मिलेंगे मिट्टी से बने धर्मावतार के मूर्ति तथा बड़े पीपल या बट वृक्ष के नीचे मनसा देवी के वेदी.

और इन सबके साथ बना रहा है यहां के पारंपरिक हस्त शिल्पों का प्रचलन. देश में बहुत कम ज़िले होंगे जहां इतनी तरह की सामग्रियों से भिन्न हस्तशिल्प तैयार किए जाते हैं- मिट्टी, लकड़ी, पत्थर, पीतल, सोला, इत्यादि. इस स्तंभ में आगे इनमें से कुछ परिचित-अपरिचित प्रथाओं तथा हस्तशिल्पों से आपका परिचय करवाउंगा, जैसे बांकुड़ा का घोड़ा. क्या इस सजीले घोड़े को देख कर आपके मन में कभी यह प्रश्न जगा कि इसकी गरदन इतनी लंबी कैसे हो गई?

(चन्दन सिन्हा पूर्व भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी, लेखक और अनुवादक हैं.)

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