किसी भी स्थान पर हों, हरे-भरे वृक्ष और कहीं भी जन्मे मनुष्य रूपी कलावृक्ष दीर्घायु होते हैं. स्वामीनाथन जब लोक-आदिवासी कला रचने/गढ़ने वाले कलाकारों को ढूंढते मध्य प्रदेश की आदिवासी बसाहटों में घूम रहे होंगे, वहां के वृक्ष उन्हें कौतुक से देख रहे होंगे. उन वृक्षों पर आ-आकर बैठतीं-उड़ती चिड़ियां चहचहाकर उनका ध्यान अपनी ओर खींच रही होंगी.
हरियाली से घिरी किसी पहाड़ी से बहकर आता पानी उनके पैरों को छू रहा होगा. मगर क्या वहां जैसा स्वामीनाथन ने तब देखा अब भी वैसा कुछ बचा होगा? शायद कुछ भी नहीं.
क्या उनमें से अधिकांश जगहें खून से लाल होंगीं? क्या उन ज़मीनों को उत्पादन और खनन करने, रोज़गार पैदा करने के नाम पर हिंसा का चरम रूप प्रदर्शित करते हुए, वहां के रहवासियों को, उनकी फ़रियाद सुनने के स्थान पर, उन्हें उनकी ज़मीन से अपदस्थ करते हुए धनपतियों को आवंटित कर दिया होगा? शायद हां.
यदि आज के समय में युवा कलाकारों की टोली संग लिए वह लोक आदिवासी कला और उन्हें रचने वाले लोक कलाकारों को खोजने के लिए यात्राएं करते तो उन्हें कितना और कैसा मिलता. दूसरा यह भी कि यह सब देखकर वे अपनी रचना में पहाड़ों, जंगलों और पक्षियों को किस तरह दिखलाते. वहां वे स्वयं आदिवासी कलाकारों के हाथों आदिवासी कला को कैसा चित्रित होते देखते?
स्वामीनाथन की राजनीतिक सचेतनता
वरिष्ठ कला आलोचक-कवि प्रयाग शुक्ल अपनी लिखी किताब ‘स्वामीनाथन: एक जीवनी‘ में इन प्रश्नों की पड़ताल करते हैं. शुक्ल स्वामीनाथन की राजनीतिक सचेतनता का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि राजनीतिक पहचान के स्तर पर पहले वह समाजवादी थे, फिर बाद में जयप्रकाश नारायण से वैचारिक असहमति के चलते उन्होंने और अरुणा आसफ़ अली जैसों ने समाजवादी समूह को छोड़कर भारतीय वामपंथी राजनीतिक दल से अपना नाता जोड़ा.
आगे चलकर स्वामीनाथन कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्णकालिक कार्ड होल्डर बने. दिल्ली में काम करते और अपनी अन्य गतिविधियों के चलते वे वामपंथी राजनीति के एक मजबूत और सक्रिय वैचारिक प्रतीक के रूप में मिलते हैं. मगर वहीं पर यह जीवनी उनके कला-लेखों में परिलक्षित होने वाली राजनीतिक-सामाजिक चेतना पर विशेष कुछ नहीं बतलाती.
क्या यह संभव है कि कला-समीक्षा के स्तर पर वे अपनी सामाजिक-राजनीतिक सचेतनता से किनारा कर लेते हों? शायद नहीं. कारण कि उनकी जन पक्षधर चेतना भोपाल गैस-त्रासदी में मारे गए आम लोगों की स्मृति और श्रद्धांजलि स्वरूप बनाये गए कला प्रतीकों के रूप में पक्षियों को चुनती है. चिड़िया प्रतीक बन जाती हैं उन आम जनों की निरीहता का, जिसे फांस लेना, निशाना बना लेना और जिसकी गर्दन मरोड़ लेना शक्तिशालियों के लिए आसान है.
भारत भवन में रूपंकर को रचने-गढ़ने के लिए आदिवासी लोक कला और आदिवासी लोक कलाकारों की खोज के क्रम में युवा कलाकारों के गठित समूह के साथ उनका आदिवासी इलाकों में विचरना उनकी प्रारंभिक वैचारिकी से उनके गहरे सरोकार की बानगी हैं.
लोक कलाकारों के बीच उठना-बैठना, उनके जीवन और सम्मान के लिए लड़-भिड़ जाना इसी वैचारिकी के अंतर्गत आता है. अपने चित्रों में बार-बार पेड़, पहाड़, चिड़िया चित्रित करने वाले स्वामीनाथन क्या इस बात के लिए आगाह कर रहे थे कि इन सभी का, जिन्हें मैं अपने चित्रों में रच रहा हूं, भविष्य ख़तरे में है? यह उनके इस सामाजिक दायित्व का प्रमाण था कि कला के माध्यम से वह इन सबके संरक्षण की मुहिम चलाए हुए थे.
जीवन, जीवन में उपस्थित वैविध्य से समृद्ध होता है. फिर वह वैविध्य चाहे संपन्नता से भरे हों अथवा विपन्नता से. उतार-चढ़ाव, क्षरण-पतन, हासिल कर लेना और किए हासिल को गंवा देना, जीवन को उल्लेख के योग्य बनाता है. मित्रताएं-संगतें, विस्थापन-स्थापन, आंसू और खुशी सब जीवन को जी लिये जाने की मिठास और उल्लास से भरते हैं.
स्वामीनाथन के पास कला संयम होने के साथ-साथ जीवन संयम भी बहुत था
स्वामीनाथन का जीवन भी इन्हीं सब क्रियाओं और कार्रवाईयों से बनता है. उनकी जीवनी पढ़कर लगता है, जीवन और कला में ‘कुछ खास करना’ उनके हिस्से के समय की निरंतर बने रहने वाली क्रिया है. उनके पास कला संयम होने के साथ-साथ जीवन संयम भी बहुत था इसके बावजूद कि उनकी संलग्नता कितनी अधिक और कितनी जगहों पर थी.
इसके बाद भी वे अपने भीतर की संघर्षशील चेतना के चलते ललित कला अकादमी में सुधार के लिये अपने साथियों के साथ मिलकर संघर्ष करते हैं और उसमें सफलता भी हासिल करते हैं.
‘परसिविंग फिंगर्स’ जैसे चर्चित कला-निबंध के लेखक स्वामीनाथन की जीवनी को कवि प्रयाग शुक्ल ने गहरी संवेदनशीलता के साथ लिखा है. उल्लेखनीय यह भी है कि उन्होंने लिखने के लिए बस स्वामीनाथन के जीवन को ही नहीं चुना उन्होंने उनके उत्कृष्ट कलाविद्, कुशल संपादक और एक सतर्क प्रकाशक होने के पक्ष का भी स्थान-स्थान पर उल्लेख किया है.
प्रयाग जी ने जीवनीकार की दृष्टि से अपने विषय की गरिमा का भी ध्यान रखा है. मसलन, कवि ओक्तिवीयो पॉज़ के साथ उनके आत्मीय संबंधों को उन्होंने रेखांकित करने के क्रम में यह बतलाया है कि भले स्वामीनाथन जब चाहे दूतावास में पॉज़ से मिलने चले जाते थे पर वे पाज़ के किसी देश का राजदूत होने से प्रभावित नहीं थे और कम-से-कम वहां उनकी मुफ्त की शराब की व्यवस्था तो हो ही जाती थी.
यह सच भी है कि इस दौरान स्वामीनाथन के लिए विश्वकला को समझने और उस पर आलोचनात्मक लेखन के द्वार खुले. मगर उनका असहनीय सर्दी के चलते पोलैंड से मात्र एक बरस में वापस चले आना यह भी दर्शाता है कि कुछ हासिल करने के नाम पर पोलैंड की बर्फ़ में जम जाने को स्वामीनाथन तैयार नहीं थे.
वे विश्वकला के लेंस से भारतीय कला को नहीं देखना चाहते थे
इसीलिए शायद वे विश्वकला को तो जानना चाहते थे मगर विश्वकला के लेंस से वे भारतीय कला को नहीं देखना चाहते थे. भारतीय कला को लेकर उनकी अपनी मौलिक संवेदनशील और भविष्योन्मुखी समझ थी और उसी के माध्यम से वह उन रास्तों को खोजना चाहते थे.
एक तरफ़ शुक्ल स्वामीनाथन के महात्मा गांधी से मिलने जैसे प्रसंग को रेखांकित करते हैं तो वहीं उनके जीवन से जुड़े साधारण प्रसंगों को भी उसी तल्लीनता से दिखलाते हैं. मसलन, कैसे एक बार बेहद खराब मौसम में शिमला में फंसी अपनी मौसी को लेने अपने मित्र की कार से दिल्ली से शिमला जाते हैं.
यहां वे अपने कलाकार- भविष्य की रक्षा की परवाह नहीं करते और स्वयं को खतरे में डालते हैं जो दिखलाता है कि कैसे स्वामीनाथन अपने जीवन में स्थान-स्थान पर अपना बड़ा और बेहतर मनुष्य होना साबित करते हैं.
प्रसंग जीवन बनाते हैं और जीवन से जीवनी बनती चली जाती है. कवियों- लेखकों का भारत भवन आना-जाना चलता ही रहा है. भारत भवन के प्रांगण में बने उस चबूतरे पर बैठे वे जो उनके साथ भी रहे, यह याद दिलाना नहीं भूलते कि यहीं तो स्वामीनाथन बैठे रहते थे. खासतौर पर बाहर से आये मित्रों को.
भोपाल में अनेक लेखक-कलाकार हैं जिनकी स्मृति में वहां बैठे स्वामीनाथन उभरते रहते हैं. और मुझ सरीखे जो स्वामीनाथन को इस जीवनी को पढ़कर जान रहे हैं और जिन्होंने स्वामीनाथन को नहीं देखा वे उनके वहां बैठे होने की कल्पना करते हैं.
जीवनी में हमें स्वामीनाथन के भारत भवन से पूर्व धूमिमल गैलरी और उनके मालिकों से उनकी गहरी आत्मीयता और उनके योगदान का भी परिचय मिलता है. साथ ही कलाकारों द्वारा गठित 1890 नामक कला संस्था के बारे में भी जानने को मिलता है, जिसकी एकमात्र आयोजित कला प्रदर्शनी का उद्घाटन जवाहर लाल नेहरू ने किया था.
मुंबई में कलाकारों द्वारा गठित प्रोग्रेसिव आर्टिस्ट ग्रुप का जिक्र भी इसके जिक्र के साथ किया गया है. जीवनी में चित्र प्रदर्शनियों में कविता पाठ की शुरुआत करने वाले स्वामीनाथन की कुछ कविताएं भी शामिल की गई हैं. कितने ही कवियों से स्वामीनाथन की गहरी आत्मीयता थी, जिसका जिक्र प्रयाग जी ने इस जीवनी में किया है.
हिंदी के तत्कालीन लेखकों के स्वामीनाथन पर लिखे लेख भी उल्लेखनीय हैं जिनके कुछ प्रमुख हिस्से जीवनी में शामिल किए गए हैं. स्वामीनाथन ने साहित्य और कला के बीच पुल बनाने का ही नहीं उस पर लगातार चलने, टहलने, और उसकी पुलिया पर बैठकर जीवन और कला दोनों को संवारने का काम किया.
स्वामीनाथन की इस जीवनी का अद्भुत आकर्षण यह भी है कि इससे गुज़रते हुए आप स्वयं को स्वामीनाथन के पास बैठा उनके साथ समय बिताता, उन्हें काम करता देखना शुरू कर देते हैं. जिन्हें स्वामीनाथन की समकालीनता मिली उसे तो सराहा ही जा सकता है. मगर जिनका समय स्वामीनाथन के समय के साथ नहीं था, वे इस जीवनी में स्वामीनाथन की सघन उपस्थिति को अपनी उपस्थिति में घोल सकते हैं.
स्वामीनाथन की यह जीवनी स्वामीनाथन के साथ संगत की तरह है. बीड़ी फूंकते कवि मुक्तिबोध की और बीड़ी धौंकते स्वामीनाथन, दोनों की बीड़ियों को जोड़िए कि कैसे एक बीड़ी एक कलाकार और एक कवि को एक-सा नज़र आता दिखा देती है. लगता है मुक्तिबोध और स्वामीनाथन एक ही समय में एक ही बीड़ी पी रहे थे.
(लेखक कवि, सामाजिक और राजनीतिक विश्लेषक हैं.)
