भूले-बिसरे: संविधान के बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ के अंदेशों पर अंकुश याद रखा जाना चाहिए

वर्तमान में हम भारतीय बेहद यक़ीन के साथ कहते हैं कि देश में कोई सरकार आए, वह संविधान के मूल यानी बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती. क्योंकि यह ढांचा 'संविधान की आत्मा' है. हालांकि याद रखने योग्य बात यह है कि 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक फैसले से पहले यह विश्वास हमारे पास नहीं था.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

आज की तारीख में हम भारत के लोग प्रायः गहरे विश्वास के साथ बहुत जोर देकर कहते हैं कि देश में कोई भी और कैसी भी सरकार आए, वह संविधान के मूल यानी बुनियादी ढांचे से छेड़छाड़ नहीं कर सकती. क्योंकि यह ढांचा ‘संविधान की आत्मा’ है और इस आत्मा को संसद भी, कितने भी बड़े बहुमत से, नहीं बदल सकती.

लेकिन इस बाबत यह जानना भी बहुत जरूरी है कि 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के बहुचर्चित मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सुनाए गए ऐतिहासिक आश्वस्तिकारी फैसले से पहले यह विश्वास हमारे पास नहीं था.

दरअसल, संविधान अपरिवर्तनीय प्रलेख बनकर न रह जाए और उसमें भविष्य की जरूरतों के मद्देनजर जरूरी संशोधन किए जा सकें, इसके लिए उसके निर्माताओं ने संसद को जो अधिकार दिए थे, उनकी बिनाह पर देश की सरकारें तब तक इस गलतफहमी की शिकार थीं कि वे संसद में अपने सुविधाजनक बहुमत से संविधान में जितने भी और जिस भी तरह के चाहें, उतने जरूरी-गैरजरूरी संशोधन करती रह सकती हैं.

इससे कई बार ऐसे अंदेशे पैदा हो जाते थे कि किसी दिन कोई निरंकुश सरकार संविधान को पूरा का पूरा या इस सीमा तक बदलने पर न उतर आए कि देशवासियों के लिए उसका कोई मतलब ही नहीं रह जाए.

यहां यह भी गौरतलब है कि तब तक केंद्र में एक बार भी सत्ता परिवर्तन नहीं हुआ था और कांग्रेस का एकछत्र राज था. इस कारण कांग्रेस के विरोधी ऐसे अंदेशों के बहाने उसे खूब घेरा करते थे. यह भी कहते थे कि उसकी तानाशाही प्रवृत्तियों के कारण ऐसे अंदेशे लगातार बड़े हो रहे हैं. ऐसे आरोप लगाने वालों में हमारे वर्तमान सत्ताधीशों के पूर्वज भी शामिल थे.

तब, सर्वोच्च न्यायालय ही था (जिसे अब हम दर्पपूर्वक कस्टोडियन ऑफ द कांस्टीट्यूशन यानी संविधान का संरक्षक कहते हैं), जिसने उक्त ( केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य) मामले में अपने दूरगामी महत्व के फैसले से ऐसे अंदेशों का एकमुश्त तौर पर हमेशा के लिए शमन कर दिया.

ऐतिहासिक सुनवाई

प्रसंगवश, उक्त मामला 1970 में तब शुरू हुआ, जब केरल की तत्कालीन सी. अच्युतमेनन सरकार ने 1963 के केरल भूमि सुधार कानून में व्यापक संशोधन करके एक जनवरी, 1970 से नए भूमि सुधार कानून लागू किए और कासरगोड जिले में स्थित एडनीर मठ के प्रमुख स्वामी केशवानंद भारती ने यह कहते हुए उनको सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी कि वे उनके संपत्ति के अधिकार और धार्मिक कार्यों के प्रबंधन के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करते हैं.

मामले की नियमित सुनवाई 1972 में 31 अक्टूबर को शुरू हुई, जिसमें यह प्रश्न सबसे बड़ा होकर उभरा कि क्या संसद के पास संविधान में संशोधन करने की असीमित शक्ति है? नागरिकों के मौलिक अधिकारों का मुद्दा तो उसमें पहले से ही शामिल था.

तब सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अभूतपूर्व कदम उठाते हुए सुनवाई के लिए गठित अब तक की सबसे बड़ी 13 जजों की संवैधानिक पीठ ने ऐतिहासिक सुनवाई के बाद 24 अप्रैल, 1973 को 7-6 के बहुमत से फैसला सुनाया कि संसद संविधान के किसी भी हिस्से (प्रस्तावना और मौलिक अधिकारों सहित) में संशोधन कर सकती है, लेकिन वह इसके ‘मूल ढांचे’ को, जिसमें लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संघीय ढांचा और न्यायिक समीक्षा जैसी विशेषताएं शामिल हैं, बदल या नष्ट नहीं कर सकती.

इस मामले में यह जानना भी दिलचस्प है कि मामले की 68 दिन सुनवाई की गई थी, जिसके बाद सुनाया गया फैसला 703 पन्नों का था.

जानकार बताते हैं कि इस फैसले के पीछे प्रसिद्ध न्यायविद नानी पालकीवाला की संवैधानिक विशेषज्ञता से परिपूर्ण दलीलों की बड़ी भूमिका थी. पालकीवाला अपने वक्त के देश ही नहीं दुनिया के गिने-चुने वरिष्ठ न्यायविदों में से एक थे.

मामले में सत्तापक्ष (इंदिरा गांधी की सरकार) का तर्क था कि संविधान में कहीं नहीं लिखा है कि संसद यथोचित बहुमत से उसमें मनचाहे परिवर्तन नहीं कर सकती. इसके विरुद्ध पालकीवाला की दलील थी कि संविधान कोई निर्जीव दस्तावेज नहीं है बल्कि उसकी एक आत्मा भी है, जो उसके मूल ढांचे में बसती है और आत्मा को कतई नहीं बदला जा सकता. किसी भी हालत में नहीं.

इससे पहले पालकीवाला ने मामले में सरकार का पक्ष रख रहे न्यायविद एचएम सेर्वई द्वारा अन्यत्र व्यक्त विचार को भी अपने तर्कों का आधार बनाकर यह कहते हुए उन्हें निरुत्तर कर दिया था कि संविधान उन आम कानूनों की तरह नहीं है, जिनमें आमूल-चूल बदलाव किया जा सकता है.

उन्होंने जोर देकर कहा था कि सरकार जब चाहे संविधान बदल सकेगी तो नागरिकों के मूल अधिकारों का कोई मतलब ही नहीं रह जाएगा.
एक और दिलचस्प तथ्य यह कि मील के पत्थर सरीखा यह फैसला तत्कालीन चीफ जस्टिस एसएम सीकरी के कार्यकाल के अंतिम दिन आया था.

फैसला बदलवाने की कोशिश

1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा रायबरेली लोकसभा सीट से उनका चुनाव अवैध करार दिए जाने और फलस्वरूप उनके इस्तीफे की बढ़ती मांगों के बीच देश में इमरजेंसी लगाकर नागरिकों के सारे मौलिक अधिकार छीन लिए तो उनकी सरकार ने इस फैसले को पलटवाने के लिए फिर से सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया तो तत्कालीन चीफ जस्टिस एएन रे ने सरकार के विधिवत पुनर्विचार याचिका दायर किए बिना ही पुनर्विचार के लिए फिर 13 जजों की पीठ बना दी.

तब पालकीवाला फिर इसके विरुद्ध खड़े हुए. उन्होंने इस बात को लेकर गंभीर आपत्ति दर्ज कराई कि सरकार के विधिवत पुनर्विचार याचिका दायर किए बगैर चीफ जस्टिस ऐसा कैसे कर सकते हैं?

निरुत्तर चीफ जस्टिस ने 12 नवंबर, 1975 को उक्त नवगठित पीठ भंग कर दी और बात वहीं खत्म हो गई.

जहां तक पालकीवाला की बात है, वे इससे पहले इंदिरा गांधी की सरकार द्वारा बैंकों के राष्ट्रीयकरण व राजे-रजवाड़ों के प्रिवीपर्स की समाप्ति की दिशा में उठाए गए समाजवादी व प्रगतिशील कदमों के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में दी गई अपनी दलीलों के लिए भी जाने जाते थे.

19 जुलाई, 1969 को अध्यादेश के रास्ते बैंकों के राष्ट्रीयकरण का मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुंचा तो उसके खिलाफ उनकी दलीलों के मद्देनजर न्यायालय ने अध्यादेश को अवैध करार दे दिया. तब सरकार ने कानून बनाकर बैंकों के राष्ट्रीयकरण की राह की बाधा दूर की.
कुछ ऐसा ही राजे-रजवाड़ों के प्रिवीपर्स की समाप्ति के मामले के सर्वोच्च न्यायालय पहुंचने पर भी हुआ था.

पालकीवाला ने दलील दी कि संवैधानिक नैतिकता संवैधानिक वैधता से बड़ी चीज है और इस मामले में उसकी अनदेखी की गई है तो सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी दलील स्वीकार कर ली थी और पराजित सरकार को प्रिवीपर्स खत्म करने के लिए संविधान में 26वां संशोधन करके न्यायालय के फैसले को पलटना पड़ा था.

कौन थे नानी पालकीवाला?

इस सबसे पालकीवाला की जो छवि बनी थी, वह उनको दक्षिणपंथ के नजदीक ले जाती थी. यों, आमतौर पर वे व्यक्तिगत अधिकारों, सीमित हस्तक्षेप वाली सरकार और उदार आर्थिक नीतियों के पक्षधर उदारवादी संविधान विशेषज्ञ, साथ ही व्यक्तिगत स्वतंत्रता, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक मूल्यों व अल्पसंख्यकों के अधिकारों के प्रबल पक्षधर माने जाते थे.

यह मान्यता उन्हें तत्कालीन भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में विशिष्ट स्थान देती थी. अलबत्ता, वे अंधाधुंध समाजवाद और अत्यधिक सरकारी नियंत्रण के मुखर आलोचक हुआ करते थे.

1920 में 16 जनवरी को बम्बई के एक मध्यवर्गीय पारसी परिवार में जन्मे नानी पालकीवाला के जीवन के दिलचस्प तथ्यों में से एक यह भी है कि बचपन में वे बहुत हकलाते थे. चूंकि उनके पूर्वज पालकी बनाने का धंधा करते थे, उनके नाम में पालकीवाला शब्द जुड़ गया था. लेकिन वे खुद न पालकी बनाने के धंधे में थे और न वकील या संविधान विशेषज्ञ बनना चाहते थे.

मुंबई के सेंट जेवियर कॉलेज से अंग्रेजी में एमए के बाद वे लेक्चरर बनना चाहते थे, लेकिन नाकाम रहे तो वकालत पढ़ी और 1944 में बम्बई की एक लॉ फर्म जॉइन कर 1954 में अपना पहला मुकदमा लड़ा और पीछे मुडकर नहीं देखा. हां, वकील व न्यायविद के साथ वे प्रखर अर्थशास्त्री भी थे.

मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रीकाल (1977-1979) में जब जिमी कार्टर अमेरिका के राष्ट्रपति थे, पालकीवाला अमेरिका में भारत के राजदूत हुआ करते थे. एक दिन एक अमेरिकी अखबार ने उनकी एक ऐसी तस्वीर छाप दी, जिसमें वे कार्टर की मां लिलियन को जूते पहनाते लग रहे थे. इसे लेकर हंगामा मचा तो पालकीवाला का जवाब था कि यह लिलियन जैसी किसी भी मां के सम्मान के उनके संस्कार से जुड़ा हुआ मामला है और जरूरत हुई तो वे लिलियन को दुबारा जूते पहनाने से भी नहीं हिचकेंगे. इसके बावजूद हंगामा नहीं थमा तो पालकीवाला को वापस बुला लिया गया.

बाद में पता चला कि बात बस इतनी-सी थी कि लिलियन (जो कभी बम्बई में नर्स थीं और भारत से गहरा लगाव रखती थीं) ने पालकीवाला से अपने लिए एक जोड़ी कोल्हापुरी चप्पल मंगाने का आग्रह किया तो उसे पूरा करने के लिए पालकीवाला जैसे ही उनके पैरों का नाप लेने झुके, उक्त अखबार के फोटोग्राफर ने तस्वीर ले ली और उसे जूते पहनाने की तस्वीर के रूप में प्रकाशित करा दिया.

1979 में मद्रास (अब चेन्नई) के एक डाक्टर ने आंखों का अस्पताल खोला और उसके उद्घाटन हेतु पालकीवाला को आमंत्रित किया तो चकित रह गया जब लौटते वक्त उन्होंने दरियादिली दिखाते हुए उसको अस्पताल के लिए दो करोड़ रुपये का चेक दे दिया. कृतज्ञ डॉक्टर ने बदले में अस्पताल के साथ उनका नाम जोड़ना चाहा, तो उसे ऐसा करने से भी मना कर दिया, क्योंकि वे अपने दान का प्रचार करने के खिलाफ थे.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)