नई दिल्ली: दिल्ली हाईकोर्ट ने सोमवार (19 जनवरी) को उन्नाव रेप पीड़िता के पिता की हिरासत में मौत से संबंधित मामले में उत्तर प्रदेश के भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के पूर्व विधायक कुलदीप सिंह सेंगर को राहत देने से इनकार कर दिया.
द हिंदू की खबर के मुताबिक, जस्टिस रविंदर दुदेजा ने कहा कि कुलदीप सिंह सेंगर ने हालांकि 10 साल की कुल सज़ा में से 7.5 साल जेल में बिताए हैं और इस मामले में दोषसिद्धि के ख़िलाफ़ उनकी अपील पर फैसला करने में देरी हुई है, फिर भी उन्हें इस ‘देरी के आधार पर’ राहत नहीं दी जा सकती, क्योंकि यह देरी आंशिक रूप से सेंगर द्वारा दायर की गई कई याचिकाओं के चलते ही हुई है.
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि अब इस अपील पर केवल गुण-दोष के आधार पर जल्द-से-जल्द सुनवाई होनी चाहिए.
लाइव लॉ के अनुसार, पीठ ने याचिका यह कहते खारिज़ कर की कि सेंगर के आपराधिक इतिहास और मामले की परिस्थितियों में ऐसा कोई नया बदलाव नहीं आया, जिसके आधार पर उन्हें राहत दी जा सके.
अदालत ने कहा कि आरोपी के पिछले रिकॉर्ड और अपराध की गंभीरता को देखते हुए उन्हें फिलहाल कोई राहत नहीं दी जा सकती. कोर्ट ने निर्देश दिया कि मुख्य अपील पर त्वरित गति से सुनवाई की जाए ताकि मामले का अंतिम निपटारा हो सके.
मालूम हो कि इससे पहले सेंगर ने जून, 2024 में भी अपनी सज़ा निलंबित करने को लेकर अदालत का दरवाज़ा खटखटाया था, जिसे कोर्ट द्वारा नामंजूर कर दिया गया था. यह उनकी राहत पाने की दूसरी कोशिश थी.
इस मामले में पीड़िता का आरोप था कि 3 अप्रैल, 2018 को उनके पिता को कथित तौर पर अवैध हथियार मामले में फंसाया गया और पुलिस द्वारा उन्हें कुलदीप सिंह सेंगर के इशारे पर गिरफ्तार किया गया. कुछ दिनों बाद 29 अप्रैल, 2018 को न्यायिक हिरासत में उनकी मौत हो गई थी.
दिल्ली उच्च न्यायालय ने मार्च 2020 में पूर्व भाजपा विधायक सेंगर, उनके भाई एवं पांच अन्य को पीड़िता के पिता की न्यायिक हिरासत में मौत की साजिश रचने का दोषी ठहराया था और उन्हें दस साल की कैद की सजा सुनाई गई थी.
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर अगस्त, 2019 में इस मामले से जुड़े सभी पांच केस उत्तर प्रदेश से दिल्ली ट्रांसफर कर दिए गए थे.
20 दिसंबर, 2019 को सेंगर को 2017 में नाबालिग से बलात्कार करने के एक अलग मामले में उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी.
इस सज़ा को पिछले महीने दिल्ली हाईकोर्ट ने निलंबित करते हुए सेंगर को ज़मानत दे दी थी, जिसका व्यापक पैमाने पर विरोध देखने को मिला था.
इसके बाद 29 दिसंबर को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली हाईकोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी थी. तब अदालत ने कहा था कि इस मामले की विशेष परिस्थितियों को देखते हुए अभियुक्त को रिहा नहीं किया जा सकता.
