नई दिल्ली: अरबपति गौतम अडानी के वकील ने एक अमेरिकी संघीय अदालत को बताया है कि वे अमेरिकी प्रतिभूति और विनिमय आयोग (सिक्योरिटीज़ एंड एक्सचेंज कमीशन-एसईसी) के साथ इस बात पर बातचीत कर रहे हैं कि कानूनी समन किस तरह स्वीकार किया जाए.
यह जानकारी ऐसे समय सामने आई है, जब एसईसी ने भारतीय सरकार के कथित 14 महीनों के असहयोग के बाद अदालत से ईमेल के ज़रिए समन भेजने की अनुमति मांगी थी.
न्यूयॉर्क के ईस्टर्न डिस्ट्रिक्ट की अमेरिकी ज़िला अदालत में शुक्रवार (23 जनवरी) को दाख़िल एक संक्षिप्त पत्र में, सुलिवन एंड क्रॉमवेल क़ानूनी फर्म के वकील रॉबर्ट जे. गिउफ़्रा जूनियर ने अदालत को बताया कि प्रतिवादी पक्ष और एसईसी समन की प्रक्रिया को लेकर आपसी सहमति बनाने पर चर्चा कर रहे हैं. यह पत्र गौतम अडानी की ओर से, और सह-प्रतिवादी सागर अडानी की सहमति के साथ दाख़िल किया गया है.
पत्र में कहा गया है, ‘प्रतिवादी पक्ष के वकील और एसईसी, एसईसी की याचिका को लेकर एक आपसी समझौते (स्टिप्युलेशन) पर बातचीत कर रहे हैं.’ प्रतिवादियों ने अदालत से अनुरोध किया है कि जब तक यह आपसी सहमति तय नहीं हो जाती, तब तक एसईसी की याचिका पर कोई फ़ैसला न सुनाया जाए.
एसईसी ने 21 जनवरी को अदालत में दाख़िल अपनी याचिका में बताया था कि वह फरवरी 2025 से हेग कन्वेंशन के तहत गौतम और सागर अडानी को कानूनी नोटिस भेजने की कोशिश कर रही है. हेग कन्वेंशन देशों के बीच कानूनी दस्तावेज़ों की सेवा से जुड़ी एक अंतरराष्ट्रीय संधि है, जिसके तहत भारत में विधि एवं न्याय मंत्रालय अधिकृत प्राधिकरण है.
हालांकि, एसईसी का कहना है कि भारत सरकार ने इन प्रयासों को बार-बार बाधित किया. अप्रैल 2025 में मंत्रालय ने यह कहते हुए समन भेजने का अनुरोध खारिज कर दिया था कि दस्तावेज़ों पर आवश्यक मुहरें और हस्ताक्षर नहीं हैं. एसईसी का दावा है कि हेग कन्वेंशन के तहत ऐसी औपचारिकताएं अनिवार्य नहीं हैं और भारत को पहले भेजे गए कई मामलों में कभी इसकी मांग नहीं की गई.
मई 2025 में जब एसईसी ने विस्तृत स्पष्टीकरण के साथ दोबारा अनुरोध भेजा, तो भारत के विधि मंत्रालय ने कई महीनों तक कोई जवाब नहीं दिया और इसके बाद किए गए फ़ॉलो-अप पर भी मंत्रालय चुप्पी साधे रहा. इसके बाद दिसंबर 2025 में मंत्रालय ने एक नई आपत्ति उठाई और एसईसी के एक आंतरिक नियम का हवाला देते हुए कहा कि इस मामले में एजेंसी को हेग कन्वेंशन का सहारा लेने का अधिकार नहीं है. एसईसी ने इस दलील को ‘बेबुनियाद’ करार दिया.
इन परिस्थितियों को देखते हुए एसईसी ने अदालत से अनुरोध किया था कि उसे अडानी समूह के अमेरिकी क़ानूनी सलाहकारों के ज़रिए, साथ ही उनके कॉरपोरेट ईमेल पतों पर ईमेल के माध्यम से भी समन भेजने की अनुमति दी जाए.
अपनी याचिका में एसईसी ने कहा, ‘मंत्रालय के रुख़ और हेग कन्वेंशन के तहत सेवा की पहली कोशिश के बाद से बीते लंबे समय को देखते हुए, अब यह उम्मीद नहीं है कि इस संधि के ज़रिए समन की प्रक्रिया पूरी हो पाएगी.’
गौरतलब है कि एसईसी ने 20 नवंबर, 2024 को अडानी समूह के ख़िलाफ़ सिविल धोखाधड़ी के आरोपों में मामला दर्ज किया था. एजेंसी का आरोप है कि अडानी परिवार ने भारतीय सरकारी अधिकारियों को सैकड़ों मिलियन डॉलर की रिश्वत देने से जुड़ी एक योजना को अंजाम दिया.
ये आरोप सितंबर 2021 में अडानी ग्रीन एनर्जी द्वारा जारी किए गए बॉन्ड से जुड़े हैं, जिसके ज़रिए अमेरिकी निवेशकों से 17.5 करोड़ डॉलर से अधिक जुटाए गए थे. एसईसी का कहना है कि इस बॉन्ड ऑफ़रिंग से जुड़े दस्तावेज़ों में कंपनी के भ्रष्टाचार-रोधी उपायों को लेकर भ्रामक और ग़लत जानकारियां दी गई थीं.
अडानी समूह ने इन आरोपों को पूरी तरह ‘बेबुनियाद’ बताते हुए कहा है कि वह अपने बचाव में सभी उपलब्ध क़ानूनी विकल्प अपनाएगा.
