महाराष्ट्र की राजनीति जिन्हें ‘दादा’ कहकर पुकारती थी, वे अजित अनंतराव पवार 28 जनवरी 2026 की सुबह एक ऐसे हादसे में चल बसे, जिसमें उनकी ही सत्ता-भाषा की तरह गति, जोखिम और निर्णय की तीखी विडंबना वाली गंध थी. मुंबई से निकला उनका चार्टर्ड विमान बारामती में लैंडिंग की कोशिश के दौरान आग की लपटों में गिरा. तस्वीरों और वीडियोज़ में धुआं एक काली और बेचैन लिखावट की तरह खुले मैदान पर फैलता दिखा. इस दुर्घटना में उनके साथ अन्य लोगों की भी मृत्यु हुई और राज्य की सत्ता-संरचना में अचानक एक कुर्सी या पद नहीं, पूरा का पूरा एक ‘पावर-रूम’ खाली हो गया.
महाराष्ट्र की राजनीति अगर एक थिएटर है तो अजित पवार उन कलाकारों में थे, जिन्हें मंच की रोशनी जितनी अच्छी तरह पढ़नी आती थी, उतनी ही साफ़ दिखाई देती थीं पर्दे के पीछे की रस्सियां; कौन-सी रस्सी किस हाथ में है, किस गांठ से सत्ता का परदा गिरता है और किस खींच में तालियां बदलकर सन्नाटा हो जाती हैं.
नवंबर 2019 की वह सुबह इसी थिएटर का सबसे तेज़ सीन-चेंज थी. पवार ने अचानक पाला बदला, भाजपा के साथ सरकार का हिस्सा बने और लगा जैसे एक ही मिनट में पूरा सेट नया हो गया हो. लेकिन राजनीति की यह ‘हड़बड़ी’ जितनी चमकदार थी, उतनी ही नश्वर निकली. अस्सी घंटे भी पूरे नहीं हुए थे कि वह सरकार ढह गई. मानो मंच पर खड़ा महल कागज़ का था और हवा में पहली ही सांस से ढह गया.
महाराष्ट्र की आधुनिक राजनीति में यह अध्याय आज भी एक अजीब किस्म की फुर्ती, दुस्साहस और क्षण भंगुरता का सबसे सघन रूपक बना हुआ है: सत्ता की वह कहानी जो इतनी जल्दी लिखी गई कि स्याही सूखने से पहले ही मिट गई.
पवार दिसंबर 2024 से देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व वाली सरकार में एकनाथ शिंदे के साथ उपमुख्यमंत्री थे. यह एक नई त्रयी थी, जो महाराष्ट्र के समकालीन गठबंधनों की सबसे संक्षिप्त परिभाषा बन चुकी थी. 5 दिसंबर 2024 के शपथ-ग्रहण में वे उपमुख्यमंत्री के रूप में शामिल हुए. उनकी राजनीति आंकड़ों, बजट और जमीनी नेटवर्क की राजनीति थी. उसी ने उन्हें बार-बार उसी पद तक पहुंचाया, जिसे महाराष्ट्र में अक्सर ‘सत्ता का इंजन-रूम’ कहा जाता है यानी उपमुख्यमंत्री और वित्त-योजना जैसे विभागों का केंद्र.
पहचान का सफ़र
उनका जन्म 22 जुलाई 1959 को अहमदनगर ज़िले के देओलाली प्रवरा में हुआ था. वे शरद पवार के भतीजे थे. उस परिवार की दूसरी पीढ़ी, जिसने पश्चिमी महाराष्ट्र की सहकारी अर्थव्यवस्था को राजनीति की नसों में बदल दिया. कॉलेज की पढ़ाई अधूरी छोड़कर उन्होंने परिवार की ज़िम्मेदारी संभाली और आगे चलकर वही अधूरापन उनके सार्वजनिक जीवन में एक अलग ढंग से पूरा हुआ. विधानसभा के भीतर और बाहर, फाइलों में और खेतों की मेड़ों पर. सहकारिता आंदोलन से राजनीति का एक ऊबड़-खाबड़ सफ़र. वे सुनेत्रा पवार के पति थे. उनके दो पुत्रों—पार्थ और जय के पिता; लेकिन उनकी मूल पहचान शरद पवार के भतीजे के ही रूप में थी.
पवार का ‘पहला विद्यालय’ चुनावी राजनीति नहीं, सहकारिता थी. 1982 में वे एक स्थानीय सहकारी शुगर फैक्ट्री के बोर्ड में पहुंचे और वहीं से उनकी भाषा में ‘विकास’ का अर्थ साफ़ हुआ. पानी, सड़क, क्रेडिट और वह संगठन-शक्ति, जो गांवों के भीतर विश्वास का हिसाब रखती है. बाद के वर्षों में पुणे जिला केंद्रीय सहकारी बैंक में लंबा कार्यकाल और फिर बारामती की राजनीति— इन सबने उन्हें उस दुर्लभ श्रेणी में रखा, जो राज्य की अर्थ-धमनियों को पढ़ते हुए सत्ता के साथ चलती है.
1991 में बारामती से वे निर्वाचित होकर आए; उसी दौर में सत्ता के बड़े मंच और परिवार की रणनीति का वह प्रसंग भी जुड़ा रहा, जिसमें उन्होंने सीट अपने चाचा शरद पवार के लिए खाली की. उस समय पीवी नरसिम्हा राव की सरकार बनी तो उसमें शरद पवार को बतौर रक्षा मंत्री शामिल किया गया था. लेकिन अजित पवार की ‘वापसी’ के केंद्र में हमेशा बारामती ही रही, जहां उनके जीवन की यात्रा आज ठहरी.
वही निर्वाचन-क्षेत्र, जहां वे बार-बार जीतते रहे और जहां समर्थक उन्हें एक प्रशासक की तरह नहीं, एक घरेलू शक्ति-स्वर की तरह सुनते थे. वे 1991 का विधानसभा उपचुनाव जीते; लेकिन उसके बाद लगातार 1995, 1999, 2004, 2009, 2014, 2019 और 2024 में वे विधानसभा का चुनाव जीतते रहे. वे महाराष्ट्र के बहुत मज़बूत नेता थे.
राजनीति में मौजूदगी
वे छह बार उपमुख्यमंत्री बने; लेकिन यह सिर्फ़ पदों की गणना नहीं. यह इस बात का भी संकेत रही कि वे अलग-अलग मुख्यमंत्रियों और गठबंधनों के बीच एक स्थिर ‘कार्यकारी धुरी’ की तरह टिके रहे. कांग्रेस के पृथ्वीराज चव्हाण से लेकर देवेंद्र फडणवीस, उद्धव ठाकरे और एकनाथ शिंदे तक, वे बार-बार सत्ता का राजनीतिक व्याकरण लेकर आए और उसमें ख़ुद को प्रासंगिक बनाए रखा.
और फिर भी, उनकी राजनीति सिर्फ़ तकनीकी नहीं थी. उसमें एक कच्ची मानवीय धार भी थी, जो कभी-कभी सार्वजनिक नैतिकता की दीवार से टकरा जाती थी. अप्रैल 2013 में सूखे और पानी की मांग से जुड़ी एक सभा में ‘डैम में पेशाब’ वाले कथन ने भारी विवाद खड़ा किया. बाद में उन्होंने माफ़ी मांगी और उसे अपनी ‘सबसे बड़ी भूल’ कहा. एक ऐसा क्षण, जिसमें सत्ता की कठोरता अचानक एक असहज आत्म-स्वीकार में बदल गई.
उनके कार्यकालों पर विवाद भी आए. ख़ासकर जल संसाधन विभाग और परियोजनाओं से जुड़े आरोपों के संदर्भ में. 2012 के आसपास सिंचाई परियोजनाओं में अनियमितताओं और ‘इरीगेशन स्कैम’ को लेकर राज्य की राजनीति गरमाई; समय-समय पर यह मुद्दा वापस लौटता रहा और रिपोर्टों के मुताबिक़ उन्हें बाद में एक सरकारी पैनल-प्रक्रिया से ‘क्लीन चिट’ जैसी बातें भी कही गईं, जबकि कानूनी-राजनीतिक बहसें चलती रहीं. इसी तरह लवासा परियोजना से जुड़ी लीज़िंग और जल-क्षेत्र के फैसलों पर भी आलोचनाएं दर्ज हुईं.
एक निर्णायक मोड़ 2023–24 के आसपास आया, जब राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के भीतर विभाजन और वैधता की लड़ाई अपने चरम पर पहुंची. चुनाव आयोग के आदेश के बाद पार्टी का नाम और ‘घड़ी’ चुनाव चिह्न अजित पवार गुट को मिला और शरद पवार गुट को अलग नाम ग्रहण करना पड़ा. यह महज़ प्रतीक-युद्ध नहीं था. यह बताता था कि भारतीय दल-राजनीति में संगठन, संख्या और चुनाव चिह्न कभी-कभी विचारधारा से अधिक निर्णायक हो जाते हैं और परिवार भी एक संवैधानिक-प्रशासनिक दस्तावेज़ में बदल सकता है.
उनकी राजनीति के प्रशंसक उन्हें एक ऐसे ‘वर्कहॉर्स’ के रूप में याद करेंगे, जिसने बजट की भाषा को ग्रामीण अर्थव्यवस्था की बोली में उतारा और बारामती को ‘मॉडल’ कहे जाने लायक बनाने की कहानी को अपने नाम के साथ जोड़ दिया. आलोचक उन्हें सत्ता-यथार्थवाद का प्रतीक मानेंगे, जिसमें लक्ष्य अक्सर नैतिक वाक्यों से तेज़ चलता है. पर मृत्यु के क्षण में, दोनों पक्षों के तर्क एक पल को ठिठक जाते हैं: क्योंकि राजनीति, आख़िरकार, मनुष्य की नश्वरता पर ही लिखी गई दीर्घ टिप्पणी है.
अजित पवार अपने पीछे पत्नी, पुत्रों और एक ऐसी राजनीतिक विरासत छोड़ गए हैं, जो पूरी तरह ‘सरल’ नहीं है. उसमें सहकारिता की मिट्टी है, गठबंधनों का गणित है और भाषा की फिसलन भी. बारामती के आकाश में आज सुबह धुएं की जो परत उठी, वह सिर्फ़ एक हादसे का दृश्य नहीं है; महाराष्ट्र के सत्ता-इतिहास के एक अध्याय पर अचानक गिरा एक आश्चर्यजनक कठोर विराम है.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)
