सोनम वांगचुक ने कोर्ट में कहा- मैं सरकार की आलोचना कर सकता हूं, सरकारी कार्रवाई का विरोध एंटी-नेशनल नहीं

लद्दाख के जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि वे सरकार की आलोचना कर सकते हैं और सरकार की कार्रवाई या निष्क्रियता के ख़िलाफ़ विरोध को न तो राष्ट्र विरोधी कहा जा सकता है और न ही राज्य विरोधी. उन्होंने जोड़ा कि वे शांतिपूर्ण मार्चों और प्रदर्शनों के माध्यम से अपनी असहमति व्यक्त कर सकते हैं.

सोनम वांगचुक. (फ़ाइल फोटोः पीटीआई)

नई दिल्ली: जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक, जो इस समय जोधपुर सेंट्रल जेल में बंद हैं, ने शीर्ष अदालत में दलील दी है कि लद्दाख की नाज़ुक पारिस्थितिकी और स्वदेशी संस्कृति की रक्षा के लिए उसे संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने में सरकार की देरी या निष्क्रियता की शांतिपूर्ण आलोचना को राष्ट्र विरोधी गतिविधि नहीं माना जा सकता.

रमन मैग्सेसे पुरस्कार से सम्मानित वांगचुक सितंबर 2025 से जेल में हैं. उन्हें उस समय हिरासत में लिया गया था जब लद्दाख को राज्य का दर्जा देने और संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए थे.

द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अरविंद कुमार की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष पेश होते हुए वांगचुक और उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि सरकार ही राष्ट्र नहीं होती.

सिब्बल ने अदालत में दलील दी, ‘मैं सरकार की आलोचना कर सकता हूं. सरकार की कार्रवाई या निष्क्रियता के खिलाफ विरोध को न तो राष्ट्र विरोधी कहा जा सकता है और न ही राज्य विरोधी. मैं शांतिपूर्ण मार्चों और प्रदर्शनों के माध्यम से असहमति व्यक्त कर सकता हूं.’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने इस आरोप से इनकार किया कि उन्होंने सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए ‘अरब स्प्रिंग’ जैसी किसी क्रांति का आह्वान किया था.

ज्ञात हो कि अरब स्प्रिंग पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका में वर्ष 2010 से 2018 के बीच हुए सरकार-विरोधी हिंसक आंदोलनों की श्रृंखला को कहा जाता है.

उन्होंने लद्दाख की स्वच्छ और प्राकृतिक विरासत को बचाने के लिए वांगचुक द्वारा वर्षों से किए जा रहे शांतिपूर्ण प्रयासों की ओर ध्यान दिलाया. सिब्बल ने कहा कि लद्दाख में बड़े पैमाने पर निवेश आ रहा है, जो क्षेत्र की विशिष्ट और संवेदनशील पारिस्थितिकी के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है.

सिब्बल ने कहा कि स्थानीय प्रशासन ने नजरबंदी आदेश जारी करने वाली प्राधिकरण को गुमराह करने के लिए चुनिंदा वीडियो भेजे हैं. उन्होंने इस आरोप को भी खारिज किया कि वांगचुक ने किसी साक्षात्कार में यह कहा था कि बाहरी आक्रमण की स्थिति में लद्दाख के लोग सेना की मदद नहीं करेंगे.

सिब्बल ने कहा, ‘यह गलत है, यही इस मामले की समस्या है. अधिकारियों ने प्राधिकरण को गुमराह किया है. मेरे पास उसी वीडियो का लिंक है जिसमें वह सरकार और प्रधानमंत्री की प्रशंसा कर रहे हैं, वीडियो में शांतिपूर्ण विरोध का स्पष्ट उल्लेख है.’

वरिष्ठ अधिवक्ता ने वांगचुक पर हिंदू देवताओं के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने के आरोपों को भी खारिज किया और कहा कि हैकर्स और ट्रोल्स ने गलत तरीके से इसे प्रचारित किया है.

रिपोर्ट के अनुसार, सिब्बल ने कहा, ‘बिना एडिट किए वीडियो पूरी तस्वीर सामने लाता है. उनका आशय यह था कि कश्मीर से लद्दाख को अलग करने के बाद केंद्र सरकार संविधान की छठी अनुसूची के तहत दी जाने वाली सुरक्षा का अपना वादा निभाने में असफल रही. उन्होंने एक रूपक (allegorical) के तौर पर कहा कि जैसे भगवान राम ने सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाया और फिर छोड़ दिया, उसी तरह केंद्र सरकार ने लद्दाख के साथ किया.’

उन्होंने आगे कहा, ‘यह केवल भगवान राम से जुड़ा एक अलंकारिक उदाहरण था. अगर ऐसे बयानों के आधार पर किसी को हिरासत में लिया जाएगा, तो फिर बोलना ही बंद कर देना चाहिए. उनकी पत्नी स्वयं एक हिंदू हैं.’

सिब्बल ने ज़ोर देकर कहा कि किसी भी नागरिक को सरकार की आलोचना करने का अधिकार है.

उन्होंने कहा, ‘वह कहते हैं कि वे किसी भी तरह की हिंसा नहीं होने देंगे. छठी अनुसूची एक राजनीतिक दल द्वारा किया गया वादा है, जो 2020 में दिया गया था. अगर 2025 में कोई चुनाव से पहले उस वादे को पूरा करने की मांग करता है, तो इसमें गलत क्या है? सरकार-विरोधी भावनाएं राज्य की सुरक्षा को प्रभावित नहीं करतीं. मैं सरकार की आलोचना कर सकता हूं – हम यह हर समय करते हैं. यही लोकतंत्र है. और लोकतंत्र का हिस्सा शांतिपूर्ण विरोध और पदयात्राएं हैं. क्या शांति भंग करने को लेकर दंड प्रक्रिया संहिता के तहत कोई कार्रवाई हुई? नहीं.’

सिब्बल ने वांगचुक की पेट से जुड़ी बीमारी को लेकर किसी विशेषज्ञ डॉक्टर से जांच कराने का अनुरोध भी किया. उन्होंने कहा कि यह बीमारी दूषित पानी के कारण हुई है. वांगचुक को राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में रखा गया है, जो उनके गृह नगर लेह से लगभग 1,400 किलोमीटर दूर है.

मामले की अगली सुनवाई 2 फरवरी को होगी.