नई दिल्ली: राजस्थान के राज्यपाल हरिभाऊ बागड़े ने कानूनी और संवैधानिक चिंताओं का हवाला देते हुए पूर्व सरकारों द्वारा पारित 10 विधेयकों को पुनर्विचार के लिए राज्य विधानसभा को लौटा दिया है.
इनमें से नौ विधेयक पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार के दौरान पारित हुए थे, जबकि एक विधेयक 2008 में पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के पहले कार्यकाल का है.
न्यू इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, इस घटनाक्रम की जानकारी बुधवार (28 जनवरी) को विधानसभा में दी गई.
गहलोत सरकार के दौरान पारित जिन नौ विधेयकों को लौटाया गया है, उनमें ‘राजस्थान मॉब लिंचिंग से संरक्षण विधेयक, 2019’, ‘सम्मान और परंपरा के नाम पर वैवाहिक संबंधों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप निषेध विधेयक, 2019’, नवंबर 2020 में पारित कृषि से जुड़े तीन संशोधन विधेयक, 2022 में स्वीकृत दो निजी विश्वविद्यालय विधेयक, तथा अगस्त 2023 में पारित ‘राजस्थान बिजली (टैरिफ) विधेयक, 2023’ और ‘नाथद्वारा मंदिर (संशोधन) विधेयक, 2023’ शामिल हैं.
विधानसभा के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार, 2019 के ‘ऑनर किलिंग’ से जुड़े विधेयक को लौटाते समय राज्यपाल ने बताया कि प्रस्तावित कानून में भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), 1860 और दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी), 1973 का उल्लेख है, जिन्हें अब बदल दिया गया है.
राज्यपाल ने यह भी कहा कि ‘भारतीय न्याय संहिता, 2023’ की धारा 103 में ऑनर किलिंग जैसे अपराध से निपटने के लिए पर्याप्त प्रावधान मौजूद हैं.
संवैधानिक प्रावधानों के तहत, यदि किसी राज्य विधेयक के प्रावधान मौजूदा केंद्रीय कानूनों से टकराते हैं, तब राज्यपाल उसे वापस भेज सकते हैं. राज्यों को केवल राज्य सूची के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार है. समवर्ती सूची के मामलों में केंद्र और राज्य दोनों कानून बना सकते हैं, लेकिन टकराव की स्थिति में केंद्रीय कानून को प्राथमिकता मिलती है और राज्य का कानून उस पर हावी नहीं हो सकता.
उस समय गहलोत सरकार ने कहा था कि ‘परिवार, जाति या समुदाय की इज्जत के नाम पर सहमति से सगोत्र, अंतर-जातीय, अंतर-समुदाय या अंतरधार्मिक विवाह करने वाले वयस्कों पर स्वयंभू संगठनों द्वारा अवैध दबाव और धमकी की घटनाओं में बढ़ोतरी हुई है.’
सरकार ने ऐसे मामलों में दंपति या उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार करने वालों को भी जिम्मेदार ठहराने का प्रस्ताव रखा था.
विधेयक में विभिन्न श्रेणियों की सजा का प्रावधान था, जिसमें मौत होने की स्थिति में सबसे कड़ी सजा शामिल थी. ऐसे दंपति या उनमें से किसी एक की हत्या करने पर दोषी को ‘मृत्युदंड या आजीवन कारावास (जो व्यक्ति के शेष प्राकृतिक जीवन तक रहेगा)’ और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा दी जा सकती थी.
पिछले वर्ष राजस्थान मॉब लिंचिंग से संरक्षण विधेयक, 2019 के मामले में भी इसी तरह के आधार बताए गए थे. सरकार का कहना था कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 117 (जानबूझकर गंभीर चोट पहुंचाना) और धारा 189 (गैरकानूनी जमावड़ा) ऐसे अपराधों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं.
इस विधेयक में मॉब लिंचिंग को संज्ञेय, गैर-जमानती और गैर-समझौता योग्य अपराध बनाने का प्रस्ताव था, जिसके लिए आजीवन कारावास और 5 लाख रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान था.
विधेयक के अनुसार, लिंचिंग का मतलब था- धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, जन्मस्थान, भाषा, खान-पान की आदतों, सेक्सुअल ओरिएंटेशन, राजनीतिक जुड़ाव या जातीय पहचान जैसे आधारों पर किसी भी भीड़ द्वारा अचानक या योजनाबद्ध तरीके से हिंसा करना, या हिंसा के लिए उकसाना या सहायता करना या प्रयास करना.
