नई दिल्ली: आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में सूचना का अधिकार (आरटीआई) अधिनियम, 2005 की फिर से समीक्षा करने की बात कही गई है. यह सर्वे गुरुवार (29 जनवरी) को संसद में पेश किया गया. सर्वेक्षण में सुझाव दिया गया है कि नीतियां बनाते समय होने वाली आंतरिक चर्चाओं से जुड़ी जानकारी को सार्वजनिक करने से छूट देने पर विचार किया जाना चाहिए. साथ ही, ऐसे खुलासों को रोकने के लिए, जो ‘शासन के कामकाज में बाधा डाल सकते हैं,’ संसद की निगरानी में मंत्रियों को वीटो का अधिकार देने की संभावना भी जताई गई है.
सर्वेक्षण ने माना कि आरटीआई कानून लोकतंत्र को मजबूत करने, जवाबदेही तय करने और भ्रष्टाचार से लड़ने का एक अहम साधन है. लेकिन इसमें यह भी कहा गया कि कहीं-कहीं यह कानून अपने आप में ही उद्देश्य बनता जा रहा है, जहां सिर्फ जानकारी उजागर होने को ही सफलता माना जाता है, भले ही उससे शासन में कोई सुधार न हो. सर्वेक्षण के मुताबिक, यह कानून न तो ‘बेवजह की जिज्ञासा’ शांत करने के लिए बनाया गया था और न ही बाहर से सरकार के कामकाज को बारीकी से नियंत्रित करने के लिए.
सर्वेक्षण ने अधिनियम की समीक्षा के तहत सुझाव दिया है कि विचार-विमर्श से जुड़े नोट्स, वर्किंग पेपर्स और ड्राफ्ट टिप्पणियों को तब तक सार्वजनिक न किया जाए, जब तक वे अंतिम निर्णय का हिस्सा न बन जाएं. इसके अलावा अधिकारियों के सेवा रिकॉर्ड, तबादलों और गोपनीय स्टाफ रिपोर्टों को भी सार्वजनिक होने से बचाने की बात कही गई है.
सबसे अहम सुझाव यह है कि एक सीमित दायरे वाला मंत्रिस्तरीय वीटो लागू करने पर विचार किया जाए, जो संसद की निगरानी में हो, ताकि ऐसी जानकारी के खुलासे को रोका जा सके जो सरकार के कामकाज में बाधा डाल सकते हैं.
सर्वेक्षण ने आरटीआई कानून की तुलना अमेरिका, ब्रिटेन और स्वीडन जैसे देशों के समान कानूनों से करते हुए कहा कि वहां आंतरिक कर्मचारियों से जुड़े नियम, अंतर-विभागीय ज्ञापन और वित्तीय नियम आमतौर पर सार्वजनिक नहीं किए जाते. इसके मुकाबले, भारतीय कानून में ऐसी छूट काफी कम है, जिसके कारण ड्राफ्ट नोट्स, आंतरिक पत्राचार और अधिकारियों के निजी रिकॉर्ड भी अक्सर सार्वजनिक हो जाते हैं, भले ही उनका जनहित से सीधा संबंध कम हो.
सर्वेक्षण ने यह भी बताया कि अमेरिका, ब्रिटेन और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों में नीतियों पर होने वाली आंतरिक चर्चाओं और ड्राफ्ट दस्तावेजों को सुरक्षा दी जाती है, लेकिन भारत में विचार-विमर्श प्रक्रिया के लिए ऐसी कोई सामान्य छूट नहीं है. यहां फाइल नोटिंग्स, आंतरिक राय और ड्राफ्ट नोट्स भी सूचना की श्रेणी में आते हैं, जबकि केवल कैबिनेट से जुड़े दस्तावेजों को फैसला होने तक अस्थायी रूप से गोपनीय रखा जाता है.
अपने तर्क को विस्तार देते हुए सर्वेक्षण ने चिंता जताई कि अगर हर ड्राफ्ट या टिप्पणी सार्वजनिक कर दी जाएगी, तो अधिकारी खुलकर अपनी बात रखने से बच सकते हैं. वे ज्यादा सतर्क भाषा का इस्तेमाल करेंगे और नए या साहसिक विचार देने से हिचक सकते हैं.
हालांकि, सर्वेक्षण ने साफ किया कि उसका उद्देश्य हर बात को गोपनीय रखना नहीं है. इसमें कहा गया है कि लोकतंत्र तब बेहतर चलता है जब अधिकारी स्वतंत्र रूप से विचार-विमर्श कर सकें और बाद में जिन फैसलों का वे समर्थन करते हैं, उनके लिए जवाबदेह हों, न कि प्रक्रिया के दौरान व्यक्त हर अधूरे या प्रारंभिक विचार के लिए.
सतर्क नागरिक संगठन की अक्टूबर 2025 की मूल्यांकन रिपोर्ट के अनुसार, 30 जून 2025 तक 29 सूचना आयोगों के समक्ष 4.13 लाख अपीलें और शिकायतें लंबित थीं.
पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा कि डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 ने पहले ही आरटीआई अधिनियम को कमजोर कर दिया है, जिससे जानकारी देने से इनकार करने का दायरा काफी बढ़ गया है और यह ‘सूचना का अधिकार’ से ‘इनकार का अधिकार’ बनता जा रहा है.
उन्होंने सर्वेक्षण की टिप्पणियों पर सवाल उठाते हुए कहा, ‘क्या यह बताया जा सकता है कि आरटीआई की वजह से शासन को कैसे नुकसान पहुंचा है? लोकतंत्र में सरकारी फैसलों पर खुलकर चर्चा होनी चाहिए, और आरटीआई लोगों को इन फैसलों तक पहुंचने का अधिकार देता है.
कांग्रेस का विरोध
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के जवाब में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने शुक्रवार को मोदी सरकार पर सूचना का अधिकार अधिनियम को कमजोर करने का आरोप लगाया.
The Economic Survey has called for “re-examination” of the Right to Information Act.
It also suggests a possible “Ministerial veto” to withhold information and wants to explore the possibility of shielding public service records, transfers and staff reports of bureaucrats from… pic.twitter.com/njBRyDzroy
— Mallikarjun Kharge (@kharge) January 30, 2026
खड़गे ने एक्स पर लिखा, ‘आर्थिक सर्वेक्षण ने आरटीआई अधिनियम की ‘फिर से समीक्षा’ की मांग की है… मनरेगा को खत्म करने के बाद क्या अब आरटीआई की बारी है?’ उन्होंने दो दशक पुराने ग्रामीण रोजगार कार्यक्रम की जगह ‘विकसित भारत गारंटी फॉर रोजगार एंड आजीविका मिशन (ग्रामीण)’ (वीबी-जी राम जी) लागू किए जाने का जिक्र किया.
खड़गे ने कहा कि सर्वेक्षण में जानकारी रोकने के लिए संभावित ‘मंत्रिस्तरीय वीटो’ का सुझाव दिया गया है. साथ ही, नौकरशाहों के सेवा रिकॉर्ड, तबादलों और स्टाफ रिपोर्टों को भी सार्वजनिक जांच से बाहर रखने पर विचार करने की बात कही गई है।
उन्होंने कहा, ‘2019 में मोदी सरकार ने सूचना आयुक्तों के कार्यकाल और वेतन पर नियंत्रण कर आरटीआई अधिनियम को कमजोर कर दिया, जिससे स्वतंत्र निगरानी संस्थाएं अधीनस्थ कार्यकर्ताओं में बदल गईं.’
खड़गे ने जोड़ा कि 2025 तक 26,000 से अधिक आरटीआई मामले लंबित थे.
उन्होंने डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन एक्ट, 2023 का जिक्र करते हुए कहा कि इसने ‘आरटीआई के जनहित प्रावधान को कमजोर कर दिया और भ्रष्टाचार को छिपाने तथा जांच को रोकने के लिए निजता का इस्तेमाल हथियार की तरह किया.’
उन्होंने आगे कहा, ‘पिछले महीने (दिसंबर 2025) तक केंद्रीय सूचना आयोग बिना मुख्य सूचना आयुक्त के काम कर रहा था. 11 वर्षों में यह सातवीं बार था जब इस अहम पद को जानबूझकर खाली रखा गया.’
पारदर्शिता कार्यकर्ताओं के सामने मौजूद जोखिमों पर प्रकाश डालते हुए खड़गे ने कहा, ‘2014 से अब तक 100 से ज्यादा आरटीआई कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है. इससे ऐसा डर का माहौल बन गया है, जिसमें सच सामने लाने वालों को निशाना बनाया जाता है और असहमति दबाई जाती है. कांग्रेस-यूपीए सरकार द्वारा पारित व्हिसलब्लोअर्स प्रोटेक्शन एक्ट, 2014 को भी भाजपा ने आज तक लागू नहीं किया है.’
ट्रांसपेरेंसी एक्टिविस्ट अंजलि भारद्वाज ने एक्स पर लिखा है, ‘आरटीआई कानून पर एक बार फिर हमला किया जा रहा है. आर्थिक सर्वेक्षण में बिना किसी सबूत या आंकड़ों के इस कानून की दोबारा समीक्षा की मांग की गई है, और छूट के दायरे व प्रकृति को बढ़ाने का सुझाव दिया गया है. इसमें यह भी कहा गया है कि मंत्रियों को जानकारी देने से इनकार करने का वीटो अधिकार दिया जाए और नीतिगत चर्चाओं को सार्वजनिक निगरानी से बाहर रखा जाए.’
