काशी की प्रतिसत्ता अब सत्ता की चपेट में है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

बनारस कभी पांडित्य, साहित्य, परंपरा आदि के लिए जाना जाता था; आजकल वहां जो भव्यता सरकारी फ़िजूलखर्ची से बिखेर दी गई है, उसके कारण जाना जा रहा है. इस बार, कई बरसों बाद, वहां एक साहित्य उत्सव के सिलसिले में जाना हुआ तो भव्यता के गलियारों से गुज़रना नहीं हुआ. गुज़रा संकरी गलियों-सड़कों से जो कुछ अधिक चमकीली दुकानों से जनाकीर्ण हैं और उनमें से अधिकांश के नाम अब अंग्रेज़ी में लिखे हुए हैं.

एक कवि मित्र ने मिठाई का जो डिब्बा दिया उस पर सारी इबारत अंग्रेज़ी में है. एक समय था जब बनारस के विचारपूर्वक आधुनिकता के प्रति आलोचनात्मक रुख़ अपनाया था. अब वह आधुनिकता की चपेट में है. साहित्य उत्सव में यों तो हिंदी की अच्छी ख़ासी उपस्थिति और सक्रियता थी पर सुनने वाले अधिकांशतः स्कूलों के छात्र थे जो या तो अंग्रेज़ी में बात करते थे या बनावटी हिंदी में. उत्सव थोड़ा विपर्यस्त था और हर सत्र विलंबित था, लगभग नियमपूर्वक, विलंबित होता रहा. क्या कहां हो रहा है यह पता करना मुश्किल होता था क्योंकि यकायक मंच बदल जाता था.

बनारस के रसिक जन कम ही आए: जो लोग आए उनमें से अधिकांश किसी न किसी सत्र में बोलने के लिए आमंत्रित थे. इसी श्रृंखला के एक साहित्य उत्सव में जब मैं पहले, कई बरस पहले, आया था, तो बनारस के लोग उसमें थे. इस बाद जो लोग आए उनमें से अधिकांश तफ़रीह करने के भाव से आए: वह एक सत्र में कुछ देर रुककर, अन्यत्र चल रहे सत्र में जाते रहे. विलंब तो बनारस के जैविक स्वभाव में है, इस अर्थ में उत्सव निश्चय ही बनारसी था.

मुझे जब व्योमेश शुक्ल के साथ एक सार्वजनिक संवाद में कुछ बतियाने का अवसर मिला तो मैंने कहने की कोशिश की, लगता है काशी, जैसा कि बहुत सारा भारत भी, अपनी प्रश्नवाचकता से, अपनी बौद्धिक और सर्जनात्मक निर्भीकता और नवाचार से विरत-विपथ हो रहा है. कबीर-तुलसी से लेकर जयशंकर प्रसाद, प्रेमचंद आदि उसी प्रश्नाकुल परंपरा और उसके पुनराविष्कार के शिखर रहे हैं और सभी काशी में थे. काशी में जयकार अपने सत्व में सिर्फ़ शिव और काल की होती थी, किसी और सत्ता की नहीं. प्रश्नाकुल पांडित्य, निर्भीक विद्वत्ता, उदग्र चिंतन की, सजग और विपथगामी सर्जनात्मकता की काशी अब दिखाई नहीं पड़ती- हो सकता है कि अंतःसलिल हो गई हो.

काशी सिर्फ़ धर्म की नहीं, बुद्धि और ज्ञान की प्रश्नांकन और संशय की भी नगरी रही है. उसकी, एक तरह से, प्रतिसत्ता थी- शायद यह कहना अपरिपक्व लगे कि अब लगता है वह सत्ता की चपेट में है.

कवि व्योमेश शुक्ल की संस्था ‘रूपवाणी’ जाने का अवसर एक शाम निकल आया. बहुत संकरी गली में स्थित उसकी बैठकी बहुत सुरुचिपूर्ण है जहां कई गतिविधियां होती रहती हैं. उनके पास युवा सहचारियों की बड़ी सूक्ष्म और संवेदनशील टीम है जो बड़ी तत्परता और उत्साह से जब कुछ करती है. प्रसाद की कविता है जिस नदी को पहली बार जाना था, वह नदी वरुणा पिछली बार बहुत सिकुड़ी और गंदी दीख पड़ी थी: इस बार वह जलपूरित लगी और उसके घाट भी बन गए हैं.

बनारस के साहित्यिक जीवन में, बल्कि एक तरह से हिंदी जगत् में काशी नागरी प्रचारिणी सभा का पुनरुद्धार और सक्रियता एक बेहद वांछनीय परिघटना है. उसके पीछे बल्कि आगे व्योमेश शुक्ल हैं. सभा ने जो पुस्तकें नए रूपरंग में इधर प्रकाशित की हैं वे पुस्तकों के रूपाकार में लगभग प्रतिमान ही बन गई हैं: उनमें सादगी, सुरुचि और नवाचार की त्रयी दिखाई पड़ती है.

इस नए चरण में ‘नागरीप्रचारिणी पत्रिका’ को पुनर्नवा किया गया है. राजकुमार के संपादन में उसका पहला अंक विविध और रोचक सामग्री से भर पूर है. इस समय हिंदी में जो शोध हो रहा है उससे चुनकर यह अंक कई विचारोजक और तथ्यसंपन्न लेख प्रस्तुत करता है. अपने पहले अंक से ही यह पत्रिका हिंदी की श्रेष्ठ शोध पत्रिका बन गई है. सभा के मुखपत्र ‘नागरी’ को भी पुनर्जीवित किया है, संपादक व्योमेश शुक्ल ने. पत्रिका काशी पर एकाग्र है. उसमें महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम निराला के पत्र का छायाचित्र, आचार्य रामचंद्र शुक्ल की शवयात्रा की तस्वीर सभा के अभिलेख-संचयन से प्रकाशित हैं. कुछ दस्तावेज़ी साक्ष्य इस बात का भी एकत्र किया गया है कि प्रेमचंद की शवयात्रा में उनके बेटे अमृत राय लिखित जीवनी के अनुसार बहुत कम लोगों का होना सही नहीं है- ख़ासी बड़ी संख्या में लोग थे जिसमें प्रसाद, नंददुलारे वाजपेयी, जैनेन्द्र कुमार, बाबूराव विष्णु पराड़कर, रामदास गौड़ आदि शामिल थे.

यह बहुत प्रीतिकर है कि नागरी प्रचारिणी सभा का पुनरुदय उसके विचार-क्षेत्र के कई पक्षों को लेकर इतना सार्थक रूप से सक्रिय है. यह तब हो पा रहा है जब काशी को पूजा-अर्चना और अंधभक्ति का शहर बनाने के लिए बहुत खर्चीली मेहनत की जा रही है.

संशय की एक शाम

‘रूपवाणी’ की एक शाम की बैठकी में संसार भर में इस समय जो हो रहा है उस पर मित्रों के बीच मुक्त भाव से चर्चा होती रही- एकाग्र नहीं, इधर-उधर भटकती-बहकती हुई. यह अचरज बार-बार प्रगट हुआ कि इस समय संसार में जिस तरह से युद्ध चल रहे हैं, तानाशाहियां उरूज पर है, धौंस-डर-घृणा-झूठ का माहौल और आतंक दोनों व्यापक हो रहे हैं, लोकतंत्र लगातार सिकुड़ रहा है, उदार मूल्यों पर रोज़ हमले हो रहे हैं, उनके चलते यह उम्मीद कितनी निराधार हो गई लगती है कि मनुष्यता फिर उदारता, सहिष्णुता, पारस्परिकता, सद्भाव, समरसता की ओर लौटेगी!

संशय तो यह अब प्रबल हो चला है कि बर्बरता की ओर तेजी से वापसी हो रही है और तथाकथित उदार मूल्य पूरी तरह से अप्रासंगिक हो चुके हैं. संसार मूल्यों से नहीं प्रबंधन से चल रहा है. संसार अपने दृश्य और वैचारिक अभिव्यक्ति में इस क़दर मायावी हो चुका है कि लगता है कि संसार को माया मानने और वास्तविक न मानने का एक प्राचीन भारतीय विचार नया विद्रूपित अवतार ले रहा है.

संशय का एक पक्ष यह भी उभरा कि शायद मनुष्यता के लंबे इतिहास में हम ऐसे मुक़ाम पर आ गए हैं जहां मनुष्य का जैविक स्वभाव ही रूपान्तरित होने जा रहा है. शुभ-अशुभ, उदार-कट्टर, सद्भाव-दुर्भाव, सच-झूठ, एकान्त-सामुदायिकता, व्यक्ति-समाज, धर्म-अध्यात्म, ईमान-बेइमानी, गुण-अवगुण, नियति-भविष्य, अच्छा-बुरा आदि को लेकर जो एक विश्वव्यापी मतैक्य सा है वह पूरी तरह बदल जाएगा.

बड़ी खलबली-सी मची हुई है. कई बार लगता है कि दुनिया को समझने-बूझने के हमारे साधन बहुत अपर्याप्त हो चुके हैं. अप्रत्याशित इतने नियमित रूप से, लगभग हर दिन होता है और उससे विस्मय होने के बजाय लाचारी और ऊब के भाव जागते हैं. इतिहासकार शायद यह बता सकते हैं कि दिग्भ्रम और संशय के ऐसे समय भी आए हैं और हम उनसे उबरे है.

इस बार का संशय यह भर नहीं है कि शायद समय बदल गया है, भयानक तेज़ी से, वह यह है कि समय नहीं मनुष्य का स्वभाव मौलिक रूप से बदल रहा है कई जैविक सहसाब्दियों बाद. संशय यह भी है कि हमारा आकलन और हमारी समझ दोनों ही अपर्याप्त हैं. हमारा समय एकबारगी सत्यातीत भर नहीं, विचारातीत भी हो गया है.

अलविदा

उर्दू और भारतीय कविता के एक मूर्धन्य अख़्तर उल ईमान की मृत्यु को तीस बरस हो रहे हैं. अनिल माहेश्वरी के हिंदी अनुवाद में उनकी आत्मकथा ‘इस आबाद ख़राबे में’ सेतु प्रकाशन से आई है. उनकी 1982 में लिखी पंक्तियों ने ध्यान खींचा:

मैं इसी तरह चलता रहूंगा
यह हरी, काली, लाल और सफ़ेद ज़मीं
क्या सफ़र का कोई साथी है? नहीं, कोई नहीं.
इस सफ़र में जो कोई धूल मेरे पांव से चिपकी है,
मैंने उसे भी पैर से झाड़ दिया है.
जो कुछ तुम्हारा था, मैंने उसे लौटा दिया है.
जो कुछ तुम्हारा है, वापस ले जाओ.
कल मत कहना, मैं सच्चा नहीं था.
कल मत कहना कि मेरी नीयत बुरी थी.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)