नई दिल्ली: बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदायों, विशेष रूप से हिंदुओं के खिलाफ़ हिंसा की घटनाओं को लेकर भारत में जारी बहस अब तथ्यों, आंकड़ों और राजनीतिक दृष्टिकोणों के बीच एक उलझी हुई तस्वीर पेश कर रही है.
एक आरटीआई आवेदन के जवाब से यह सामने आया है कि ढाका स्थित भारतीय उच्चायोग के पास बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ होने वाली हिंसा से जुड़ा अपना कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं है.
आरटीआई एक्टिविस्ट अजय बासुदेव बोस द्वारा दायर आरटीआई आवेदन के जवाब में भारतीय उच्चायोग ने 5 फरवरी को बताया कि बांग्लादेश में 4 अगस्त 2024 से 31 दिसंबर 2025 के बीच अल्पसंख्यकों के खिलाफ 3,000 से अधिक हिंसक घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें हत्या, बलात्कार, पूजा स्थलों पर हमले, धार्मिक अपमान, घरों व व्यवसायों की लूट और तोड़फोड़ शामिल हैं. लेकिन यह आंकड़े उच्चायोग द्वारा जुटाए गए नहीं हैं.
भारतीय उच्चायोग खुद नहीं रखता हिंसा का हिसाब!
आरटीआई के जवाब में भारतीय उच्चायोग ने जो आंकड़े उपलब्ध कराए हैं, वे बांग्लादेश की एक प्रमुख गैर-सरकारी अल्पसंख्यक संस्था ‘बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल’ द्वारा जुटाए गए हैं. इसकी जानकारी खुद उच्चायोग ने दी है.

स्वतंत्र पत्रकार और विदेश मामलों की विशेषज्ञ निरुपमा सुब्रमण्यम के मुताबिक, उच्चायोग का एनजीओ के डेटा पर निर्भरता ‘थोड़ी अजीब’ है, खासकर तब जब यह मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों में इतना बड़ा बन चुका है.
द वायर हिंदी से बातचीत में वह कहती हैं:
आरटीआई से यह सामने आता है कि भारतीय उच्चायोग के पास खुद इस तरह के मामलों का कोई रिकॉर्ड नहीं है और उन्होंने विवरण के लिए एक एनजीओ साइट देखने को कहा है. यह थोड़ा अजीब है, खासकर तब जब यह मुद्दा भारत-बांग्लादेश संबंधों में इतना बड़ा बन चुका है और भारत सरकार कड़े बयान दे रही है.
आमतौर पर यह उम्मीद की जाती है कि सरकार इन घटनाओं पर करीबी नज़र रख रही होगी. लेकिन यहां तो सरकार एक एनजीओ द्वारा दिए गए आंकड़ों पर निर्भर दिखाई देती है.
वह आगे जोड़ती हैं, ‘यह दिलचस्प है, खासकर यह देखते हुए कि देश (भारत) के भीतर सरकार का रुख एनजीओ के प्रति काफ़ी सख़्त रहा है. ऐसे में एनजीओ के दावों की बांग्लादेश सरकार के संस्करण से तुलना कर जांच की जानी चाहिए.’
हालांकि, निरुपमा स्पष्ट करती हैं कि बांग्लादेश में जो कुछ हो रहा है, उससे साफ़ ज़ाहिर है कि अल्पसंख्यक समुदाय, जिनमें सबसे बड़ा समूह हिंदुओं का है, खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है. वह कहती हैं, ‘इस मोर्चे पर समस्या है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता.’
तो बांग्लादेश सरकार का क्या कहना है?
अगस्त 2024 में पूर्व प्रधानमंत्री शेख़ हसीना के सत्ता से हटने के बाद से बांग्लादेश में अल्पसंख्यक समुदाय पर हमलों, हत्याओं और संपत्तियों को आग लगाए जाने की कई ख़बरें सामने आई हैं. हालांकि, सरकार का दावा है कि इनमें से अधिकांश घटनाएं धार्मिक नफ़रत से प्रेरित नहीं हैं.
19 जनवरी, 2026 को जारी एक आधिकारिक बयान में बांग्लादेश की अंतरिम सरकार ने कहा कि वर्ष 2025 के दौरान अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े अधिकांश मामले ‘सांप्रदायिक नहीं बल्कि आपराधिक प्रकृति’ के थे.
मुख्य सलाहकार मोहम्मद यूनुस के प्रेस विंग की ओर से जारी इस बयान में कहा गया कि जनवरी से दिसंबर 2025 के बीच पुलिस रिकॉर्ड की समीक्षा में अल्पसंख्यकों से जुड़े कुल 645 घटनाक्रम दर्ज हुए. सरकार के अनुसार इनमें से केवल 71 मामलों में सांप्रदायिक तत्व पाए गए, जबकि शेष घटनाएं जमीन विवाद, पड़ोसियों के झगड़े, चोरी, व्यक्तिगत दुश्मनी, बलात्कार और अस्वाभाविक मौतों जैसे अपराधों से जुड़ी थीं, जिनका धर्म से सीधा संबंध नहीं था.
सरकार ने यह भी कहा कि जिन 71 मामलों में सांप्रदायिक पहलू सामने आए, उनमें मंदिरों में तोड़फोड़, आगजनी, धमकियां और एक हत्या की घटना शामिल है. इन मामलों में पुलिस ने एफआईआर दर्ज की और कई मामलों में गिरफ्तारियां भी हुईं. बाकी घटनाओं में भी पुलिस कार्रवाई और जांच की गई है.
हालांकि, अधिकारों पर काम करने वाले संगठनों के आंकड़े सरकार के दावों से अलग तस्वीर दिखाते हैं.
बांग्लादेश के प्रमुख मानवाधिकार संस्था ऐन ओ सलीश केंद्र के अनुसार, वर्ष 2025 में देश में सांप्रदायिक हिंसा की 221 घटनाएं दर्ज की गईं, जिनमें एक व्यक्ति की मौत और 17 लोग घायल हुए. यह संख्या बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के बताए आंकड़ों से कम है, लेकिन सरकार द्वारा प्रस्तुत आंकड़ों से अधिक है.
बांग्लादेश सरकार का कहना है कि अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करना सरकार की संवैधानिक और नैतिक जिम्मेदारी है. हालांकि, सरकार का यह पक्ष ऐसे समय सामने आया है जब बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल ने चुनाव नजदीक आने के साथ सांप्रदायिक हिंसा बढ़ने का आरोप लगाया है.
वहीं भारत की ओर से भी लगातार यह चिंता जताई जा रही है कि अल्पसंख्यकों के खिलाफ़ हमलों को ‘व्यक्तिगत या राजनीतिक विवाद’ बताकर टालने की कोशिश की जा रही है, जिससे पीड़ित समुदायों में असुरक्षा की भावना और गहरी होती है.
ध्यान देने वाली बात है कि भारत की चिंताओं को ढाका पहले ही ‘दोहरा मापदंड’ बता चुका है. नवंबर 2024 में बांग्लादेश ने कहा था कि भारत अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर चयनात्मक रवैया अपना रहा है और भारतीय मीडिया बांग्लादेश के खिलाफ़ बड़े स्तर पर फर्जी ख़बरें चला रहा है.
बांग्लादेश सरकार का यह भी कहना था कि भारत की प्रतिक्रियाओं और भारतीय मीडिया की रिपोर्टिंग ने दोनों देशों के बीच बयानबाज़ी को और तेज़ किया है, जिससे ज़मीनी हकीकत की बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप हावी हो जाते हैं.
राजनीतिक या वास्तविक चिंताएं?
द वायर हिंदी से बातचीत में निरुपमा सुब्रमण्यम ने बारीकी से यह भी इंगित किया है कि भारतीय मीडिया में हर हिंसा की घटना को जिस तरह से बड़े पैमाने पर कवर किया जाता है, उससे यह धारणा निर्मित होती है कि हिंदुओं को ‘उनके धर्म की वजह से निशाना बनाया जा रहा है.’
निरुपमा सुब्रमण्यम का विश्लेषण मीडिया कवरेज के प्रभाव पर एक चिंताजनक तस्वीर देता है:
‘इस तरह की कवरेज भारत में प्रतिक्रियाएं पैदा करती है, फिर उन भारतीय प्रतिक्रियाओं पर बांग्लादेश की प्रतिक्रिया आती है, और दोनों तरफ़ की बयानबाज़ी और तेज़ हो जाती है. यह पूरा सिलसिला उन तत्वों के हाथ मज़बूत करता है जो नहीं चाहते कि भारत और बांग्लादेश के बीच दोस्ताना रिश्ते बने रहें.’
प्रतिक्रियाओं का यह चक्र, जो मीडिया पर निर्भर करता है, न केवल द्विपक्षीय रिश्तों को प्रभावित करता है बल्कि घटनाओं के राजनीतिकरण को भी तेज़ करता है. ऐसे में तथ्यात्मक साक्ष्यों और आधिकारिक डेटा का अभाव ही सार्वजनिक बहस को भारी-भरकम बयानबाज़ी में ले जाता है.
इस तरह के विमर्श का प्रभाव केवल मीडिया की ही नहीं, राजनीतिक और कूटनीतिक संवाद पर भी होता दिखता है. निरुपमा का विश्लेषण यह सवाल उठाता है कि क्या इन घटनाओं को ‘घरेलू राजनीति’ के लिए भी उपयोग किया जा रहा है? उन्होंने कहा:
मोदी सरकार इन घटनाओं को जिस आक्रामक तरीके से उठाती है, उससे यह सवाल खड़ा होता है कि क्या यह वह घरेलू राजनीतिक कारणों से कर रही है.
बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों की जिम्मेदारी किसकी?
आरटीआई के जवाब में भारतीय उच्चायोग ने यह भी कहा है कि बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, जो उस देश के ही नागरिक हैं, के कल्याण की ज़िम्मेदारी बांग्लादेश सरकार पर है. जवाब में लिखा है:
भारत का मानना है कि सभी नागरिकों, जिनमें अल्पसंख्यक भी शामिल हैं, के जीवन और स्वतंत्रता की रक्षा की प्राथमिक जिम्मेदारी बांग्लादेश सरकार की है.
यह रुख़ अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक ‘समझदारी’ भरे दृष्टिकोण के रूप में देखा जाता है, पर यह भी यह संकेत देता है कि भारत पूरी तरह से स्वयं कोई मुआवज़ा या हस्तक्षेप पर आधारित नीति नहीं अपनाना चाहता. इस आलोक में निरुपमा कहती हैं:
वे (अल्पसंख्यक) उस देश के नागरिक हैं और भारत को यह संकेत नहीं देना चाहिए कि वह वहां की हिंदू अल्पसंख्यक को संरक्षित कर रहा है. ठीक उसी तरह, भारत भी पाकिस्तान द्वारा भारतीय मुसलमानों के लिए किसी भी कल्याणकारी कदम को स्वीकार नहीं करेगा.
डेटा का अंतर: सरकारी बनाम नागरिक समूह
जहां बांग्लादेश हिंदू बुद्धिस्ट क्रिश्चियन यूनिटी काउंसिल के आंकड़े 3,000 से अधिक घटनाओं को दर्शाते हैं, वहीं बांग्लादेश सरकार अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े अधिकांश मामलों को ‘सांप्रदायिक प्रकृति’ का मानने से ही इनकार कर रही है.
सरकारी रिकॉर्ड और एनजीओ डेटा के आंकड़ों में भारी अंतर है. विश्लेषकों का कहना है कि इस तरह के संवेदनशील विषय पर स्वतंत्र, तटस्थ और स्वीकार्य आंकड़ों के अभाव से न केवल पत्रकारिता बल्कि द्विपक्षीय रिश्तों पर भी भ्रम फैलता है.
तथ्य यह है कि भारत की प्रमुख कूटनीतिक मिशन भी स्वयं रिकॉर्ड नहीं रखती, यह प्रश्न उठाता है कि क्या विदेश मंत्रालय और उच्चायोग स्तर पर इन घटनाओं की नियमित सार्वजनिक रिपोर्टिंग या निगरानी हो रही है या नहीं.
