सांप्रदायिक विद्वेष झेलते, थक रहे देश के लिए दीपक का दख़ल ख़ुशख़बरी की तरह है

देश की संवैधानिक संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं, वे महज़ दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.

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भेदभाव बरतने के लिए धार्मिक पहचान पर दिए जा रहे जोर के बरक्स यह जताने की जरूरत है कि इंसानियत किसी एक पहचान की मोहताज नहीं है. (फोटो: अरेंजमेंट/इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

‘नाम क्या है तुम्हारा?’
‘आज़ाद.’
‘पिता का नाम?’
‘स्वतंत्र.’
‘करते क्या हो?’
‘भारत माता को आज़ाद कराने की साधना.’
‘और रहते कहां हो?’
‘जेल में.’

1921 में महात्मा गांधी द्वारा ऐतिहासिक असहयोग आंदोलन की घोषणा के बाद पुलिस ने 15 वर्षीय चंद्रशेखर तिवारी (जो बाद में क्रांतिकारियों के हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन के कमांडर-इन-चीफ बने, चंद्रशेखर आज़ाद नाम से जाने गए और सांस रहते अंग्रेजों के हाथ न लगने की अपनी प्रतिज्ञा निभाते हुए 27 फरवरी, 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में शहीद हुए) को उसमें भाग लेने के ‘कुसूर’ में पकड़ा और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया तो सवाल-जवाब के इस सिलसिले के बाद मजिस्ट्रेट ने उनको पंद्रह कोड़े लगाकर छोड़ देने की सज़ा सुनाई.

‘वंदे मातरम’ का नारा लगाते और ‘महात्मा गांधी की जय बोलते हुए वे यह सज़ा भुगतकर निकले तो देश को लगा कि उन्होंने आज़ाद होने की पात्रता परीक्षा पास कर ली है.

यहां इस प्रसंग से बात शुरू करने का एक खास प्रयोजन है- उत्तराखंड स्थित कोटद्वार में बजरंग दल के स्वयंभू ‘सूरमाओं’ द्वारा वकील अहमद नामक मुस्लिम कपड़ा व्यवसायी को उसकी दुकान के नाम को लेकर तंग करने से जुड़ा हुआ. ये ‘सूरमा’ अपनी तथाकथित धार्मिक आस्था के नाम पर उसे डरा-धमकाकर अपनी दुकान का नाम बदलने को मजबूर कर रहे थे, तब वहीं एक जिम चलाने वाले युवा दीपक कुमार कश्यप ने मौके पर पहुंचकर मामले में दखल देते हुए ‘सूरमाओं’ को रोक दिया.

जैसा कि बहुत स्वाभाविक था, इससे खीझे हुए ‘सूरमाओं’ ने ‘तुम कौन हो, दाल-भात में मूसरचंद?’ के अंदाज में उनका नाम पूछा तो उन्होंने बताया, ‘मोहम्मद दीपक’.

बताने का अंदाज कुछ ऐसा था कि अगर तुम्हारा सवाल इस संकीर्ण सोच के तहत है कि मैं हिंदू होकर मुसलमान वकील अहमद की तरफ से या उनके हक में क्यों बोल रहा हूं तो लो, मैं इस विभाजन को खत्म करके ‘मोहम्मद दीपक’ बन जाता हूं.

बाद में सोशल मीडिया जारी एक वीडियो में दीपक ने यह कहते हुए कि ‘सबसे पहले मैं इंसान हूं’, यह सवाल भी पूछा कि हम इंसान एक-दूसरे को दुश्मन मानेंगे तो देश आगे कैसे बढ़ेगा? पुलिस ने उनको इसका सिला उनके विरुद्ध गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज करके दिया तो भी वह विचलित नहीं हुए, न ही डरे.

आगे बढ़ने से पहले साफ करना जरूरी है कि हम चंद्रशेखर आज़ाद और दीपक की तुलना नहीं कर रहे. उनमें तुलना का कोई सवाल ही नहीं है. आज़ाद के ज़िक्र का उद्देश्य सिर्फ यह जताना है कि दीपक ने (जैसा कि उन्होंने एक बातचीत में बीबीसी हिंदी को बताया) उस पल की जरूरत के हिसाब से अपने नाम का जैसा उपयोग किया, उसकी इस देश में पुरानी परंपरा है.

लिखा होगा कभी शेक्सपियर ने कि नाम में क्या रखा है, हमारे नायक अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध अपने संघर्षों में अपने नामों का उपयोग कर या उनमें हेरफेर की मार्फत एकजुटता के बड़े संदेश देते आए हैं.

धार्मिक व सांप्रदायिक विद्वेष

यकीनन, इस परंपरा का ही प्रभाव है कि धार्मिक व सांप्रदायिक विद्वेष के ‘खिलाड़ियों’ को झेलते-झेलते थक रहे देश ने इस मामले में दीपक के दखल को बहुत बड़ी खुशखबरी की तरह लिया. ऐसे, जैसे कहना चाहता हो कि बहुत हुआ, अब पानी सिर से ऊपर हो चला है और चूंकि उसमें चुपचाप डूबना हमें गवारा नहीं, इसलिए मुकाबले में उतरना होगा.

इस सिलसिले में शैला नेगी (नैनीताल स्थित मल्लीताल व्यापार मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष की बेटी, जो पिछले साल एक नाबालिग से कथित दुष्कर्म को सांप्रदायिक रंग दे रही हिंसा पर आमादा नफरती भीड़ से जा भिड़ी थीं) की याद दिलाते हुए वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ठीक ही कहते हैं कि दीपक ने नफ़रती भीड़ के सामने खड़े होकर (इस मुकाबले का) एक रास्ता दिखाया है. (क्योंकि इससे पहले तो हम यही देखते आ रहे थे कि उन्मादी भीड़ें किसी भी बेकुसूर को दूसरे धर्म का होने के कारण बेख़ौफ़ होकर पीट डालती थीं और कोई उसे बचाने नहीं आता था.)

बकौल रवीश कुमार: राजनीति ने जिस चालाकी से नफ़रत को जनता के बीच बांट दिया है और जिसके असर से जनता भीड़ में बदलकर अपने आप सड़कों पर हंगामा कर रही है, उसके मद्देनजर ज़रूरी है कि उसी जनता के बीच से नफरत का जवाब तैयार हो.

यह इसलिए और जरूरी है कि संविधान की बनाई संस्थाएं नफ़रत से लड़ नहीं रहीं. वे दिखावे की कार्रवाई करती हैं या अक्सर नफ़रती भीड़ के साथ खड़ी रह जाती है. नफ़रत से लैस भीड़ के आगे समाज जिस तरह चुप्पी साध रहा है, उससे यही संकेत जाता है कि समाज भी उस हिंसा में शामिल है. दीपक ने इस चुप्पी को तोड़ दिया है.

‘भारत का हीरो’

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने दीपक को ‘भारत का हीरो’ बताते हुए एक सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा है कि ‘दीपक संविधान और इंसानियत के लिए लड़ रहे हैं- उस संविधान के लिए जिसे भाजपा और संघ परिवार रोज़ रौंदने की साज़िश कर रहे हैं. वे नफ़रत के बाज़ार में मोहब्बत की दुकान के जीवित प्रतीक हैं और यही बात सत्ता को सबसे ज़्यादा चुभती है.’ उन्होंने ‘डरो मत’ कहकर भी दीपक के प्रति एकजुटता जताई है.

दूसरी तरफ राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और उनकी पार्टी के सांसद इमरान प्रतापगढ़ी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर राज्यसभा में चर्चा के दौरान अपने भाषणों में दीपक का एक ऐसे निडर नौजवान के रूप में जिक्र किया है जिसने समाज में मोहब्बत की रोशनी फैलाई और नफरत फैलाने वालों के सामने सद्भावना की ढाल बना.

इसी सिलसिले में ऑल इंडिया मुस्लिम इत्तिहादुल मुस्लिमीन के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने दीपक को असली भारतीय बताते हुए कहा है कि वे उस साहसी युवक को सलाम करते हैं, जिसने 70 साल के बुजुर्ग वकील अहमद का साथ दिया. उन्होंने यह भी कहा है कि यही वह भारत है, जिसे संविधान ने बनाया है और जिसे कुछ लोग नष्ट करना चाहते हैं.

उत्तर प्रदेश की नगीना लोकसभा सीट से सांसद और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ ने तो दीपक का विरोध कर रहे बजरंगदलियों को यह संकेत भी दिया है कि अगर दीपक को खरोंच भी आई, तो उनकी आर्मी कड़ी प्रतिक्रिया देगी. उनके समर्थकों ने यह ऐलान भी किया है कि दीपक अब अकेले नहीं हैं और वे उनके साथ खड़े हैं.

लेकिन विडंबना कि ये पंक्तियां लिखने तक भारतीय जनता पार्टी (जो केंद्र में भी सत्ता में है और उत्तराखंड में भी) को दीपक की हौसलाअफजाई के लिए दो शब्द कहना भी गवारा नहीं हुआ है. उत्तराखंड पुलिस ने तो उनके विरुद्ध मुकदमा दर्ज करके ही उनका ‘स्वागत’ करना ठीक समझा है.

इंसानियत किसी एक पहचान की मोहताज नहीं

जैसा कि पहले कह आए हैं, दीपक का कहना है कि उन्होंने किसी रणनीति के तहत नहीं बल्कि उस पल की ज़रूरत (कहना चाहिए, नजाकत) के लिहाज से अपना नाम दीपक कुमार के बजाय मोहम्मद दीपक बताया. ताकि वहां भेदभाव बरतने के लिए धार्मिक पहचान पर दिए जा रहे जोर के बरक्स यह जताने की जरूरत पूरी कर सकें कि इंसानियत किसी एक पहचान की मोहताज नहीं है.

लेकिन उन्होंने भले ही रणनीति के बजाय उस पल की नजाकत के लिहाज से अपने को मोहम्मद दीपक बताया हो, अब वह उस परंपरा का अंग कहें या वाहक बन गए हैं, जिसके तहत आज़ादी की लड़ाई के दौरान हमारे नायकों ने हम पर तरह-तरह के अन्याय व अत्याचार करने वाले अंग्रेजों के विरुद्ध एकजुटता जताने के लिए अपने नामों के साथ उनके जैसे ‘प्रयोग’ किए और इस तरह किए कि दुश्मन से कुछ कहते या करते नहीं बना.

याद कीजिए, ‘इंकलाब के शायर’ कहलाने वाले स्मृतिशेष जोश मलीहाबादी ने दर्पपूर्वक कहा था: काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब, मेरा नारा इंक़लाब ओ इंक़लाब ओ इंक़लाब. (मेरा नाम जवानी है, काम इंकलाब लाना और ना’रा इंक़लाब, सिर्फ और सिर्फ इंकलाब.) यहां जोश जिस जवानी की बात करते हैं, निस्संदेह, दीपक उसी के प्रतिनिधि हैं.

और हां, यह परंपरा चंद्रशेखर आज़ाद, जोश या दीपक तक ही सीमित नहीं है. बीती शताब्दी के चौथे पांचवें दशक में उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में किसानों द्वारा अपनी जोत की भूमि का स्वामित्व पाने के लिए शुरू किए गए ‘निजाई बोल आंदोलन’ में भी एक किसान नेता ने एकजुटता के लिए अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह‘ रख लिया था.

राम मोहम्मद उक्त आंदोलन शुरू होने के कुछ वर्षों बाद अचानक राम मोहम्मद सिंह के रूप में धूमकेतु की तरह सक्रिय हुए और पहली बार अक्टूबर, 1944 में व्यापक चर्चा में आए थे. तब, जब उसके अनुयायी कोई पांच सौ सशस्त्र किसान लड़ाकों ने डेढ़ हजार के आसपास सामान्य किसान पुरुषों, महिलाओं व बच्चों के साथ एक शोषक जमींदार की कोठी घेर ली थी.

जानकारों के मुताबिक, राम मोहम्मद सिंह पहले नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आज़ाद हिंद फौज में सैनिक थे और बर्मा (अब म्यांमार) में उसके बैनर पर कई युद्धों में लड़े थे. स्वदेश लौटे तो बस्ती में किसानों के आंदोलन में सक्रिय हो गए थे और उन्होंने वहां किसानों की एक क्रांतिकारी पार्टी भी बना ली थी.

जब उन्होंने देखा कि धार्मिक व सांप्रदायिक विभाजन किसानों की एकता में बाधक बन रहे हैं तो उन्होंने उन विभाजनों को खत्म करने के लिए अपने नाम में हिंदू भगवान राम के साथ इस्लाम के पैगंबर मोहम्मद का नाम भी जोड़ लिया. इससे उन्हें विभाजनों के खात्मे में भरपूर मदद मिली और वे कोई पांच सौ गांवों में किसानों का मजबूत संगठन खड़ा करने में सफल हो गए.

दिलचस्प बात यह कि उनकी क्रांतिकारी पार्टी का कार्यालय एक मंदिर से संचालित होता था. लेकिन बाद में राम मोहम्मद सिंह का क्या हुआ, ठीक से कुछ पता नहीं चलता. कहते हैं कि किसानों के एक के बाद एक एक्शनों (जिनमें दोनों पक्षों से कई जानें भी गई थी) के बाद पुलिस एकदम से पीछे पड़ गई तो उसे छकाने के लिए राम मोहम्मद सिंह ऐसे भूमिगत हुए कि फिर कभी सार्वजनिक तौर पर नहीं देखे गए.

अंत में दीपक को शुभकामनाएं देते हुए मैं अपने शहर के कवि स्मृतिशेष कुंवर नारायण के शब्दों में यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा कि: कोई दुख/ मनुष्य के साहस से बड़ा नहीं/ वही हारा/ जो लड़ा नहीं.

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं.)