हाईकोर्ट ने गांधी को पढ़ने, निबंध लेखन कला को ध्यान में रखते हुए पॉक्सो दोषी की सज़ा कम की

बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा पांच साल की बच्ची के यौन उत्पीड़न के दोषी ठहराए गए व्यक्ति को मिली उम्रक़ैद की सज़ा को कम करते हुए 12 साल कर दिया है. अदालत ने दोषी के जेल में रहते हुए निबंध लिखने समेत कई कार्यक्रमों में भाग लेने के चलते यह नरमी दिखाई है.

(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रबर्ती/द वायर)

नई दिल्ली: बॉम्बे हाईकोर्ट ने यौन अपराधों से बच्चों के संरक्षण (पॉक्सो) अधिनियम के तहत सज़ा काट रहे एक व्यक्ति के सर्टिफिकेट्स और ‘निबंध लेखन कला’ को देखते हुए बीते सप्ताह उनकी सज़ा कम करने का फैसला किया है.

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, हाईकोर्ट ने विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा आरोपी को दोषी ठहराए जाने के फैसले को बरकरार रखते हुए, उनकी सज़ा में नरमी बरतने का निर्णय लिया. इसमें अदालत ने जेल में रहते हुए निबंध लिखने समेत कई कार्यक्रमों में भाग लेने के चलते दोषी व्यक्ति की उम्रकैद की सज़ा को 12 साल में बदल दिया है.

इसमें अन्य बातों के अलावा महात्मा गांधी के विचारों को पढ़ने, निबंध लिखने और पुस्तकों के विश्लेषण करने के कार्यक्रमों में भाग लेने से प्राप्त प्रमाण पत्रों को ध्यान में रखा गया है.

उल्लेखनीय है कि घाटकोपर चॉल में रहने वाले अपिलकर्ता व्यक्ति की उम्र 20 साल थी, जब उसने दिसंबर 2016 में अपने पड़ोसी की पांच साल की बेटी का यौन उत्पीड़न किया था. इस मामले में उसे 2020 में दोषी ठहराया गया था. उच्च न्यायालय ने विशेष पॉक्सो अदालत द्वारा आरोपी को दोषी ठहराने में कोई गलती नहीं पाई, लेकिन सज़ा की अवधि को आजीवन कारावास से घटाकर 12 साल करने के कई कारण बताए.

अदालत के अनुसार, अपिलकर्ता पहले ही नौ साल से अधिक की सज़ा काट चुके हैं और जब यह अपराध किया था, तब उनका कोई आपराधिक रिकॉर्ड नहीं था. इसके साथ ही अदालत ने इस बात पर भी ज़ोर दिया कि अभियुक्त को कोविड-19 के दौरान भी जमानत पर रिहा नहीं किया गया था.

अदालत ने दोषी ठहराए गए व्यक्ति के जेल में रहते हुए प्राप्त किए गए तीन प्रमाण पत्रों पर भी ध्यान दिया, जिन्हें उनके वकीलों ओपी लालवानी और जिप्सन जॉन ने प्रस्तुत किया था.

न्यायाधीशों ने अपने आदेश में कहा कि इनमें पुणे स्थित तिलक महाराष्ट्र विद्यापीठ द्वारा ‘पुस्तकों के विश्लेषण’ कार्यक्रम में भाग लेने के लिए जारी किया गया प्रमाण पत्र, मुंबई स्थित रामचंद्र प्रतिष्ठान द्वारा ‘निबंध प्रतियोगिता’ में भाग लेने के लिए जारी किया गया प्रमाण पत्र और मुंबई सर्वोदय मंडल द्वारा ‘महात्मा गांधी के विचारों के अध्ययन’ के लिए जारी किया गया प्रमाण पत्र शामिल है, जिसमें उन्होंने सफलतापूर्वक परीक्षा दी थी.

इस मामले की सुनवाई के दौरान जस्टिस सारंग कोटवाल और संदेश पाटिल की खंडपीठ ने कहा, ‘इन सभी कारकों पर सामूहिक रूप से विचार करने पर, हमें सज़ा सुनाते समय उनके प्रति कुछ नरमी दिखानी चाहिए.’

न्यायाधीशों ने यह भी कहा कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए, उन्होंने न्यूनतम 10 वर्ष की सज़ा से अधिक सज़ा सुनाई है. पीठ ने कहा, ‘हमारी राय में 12 वर्ष की सज़ा न्यायसंगत होगी.’

लाइव लॉ के मुताबिक, ये मामला 9 सितंबर 2016 का है, जब पीड़ित पांच साल की बच्ची पड़ोस में पानी भरने गई थी. उस समय अभियुक्त द्वारा उसे अपना गुप्तांग मुंह में रखने के लिए मजबूर किया गया था. इसके बाद वह बच्ची डरकर घर लौट आई और उसने अपनी मां को सब कुछ बताया.

इस संबंध में पीड़िता की मां ने एफआईआर दर्ज कराई थी, जिसके बाद अभियुक्त को गिरफ्तार कर लिया गया था.

हालांकि, कोर्ट ने अपीलकर्ता के इस तर्क को खारिज कर दिया कि पीड़िता को उसके माता-पिता ने साजिश के तहत उनसे बदला लेने के लिए उनके खिलाफ गवाही देने ऐसे अपराध में फंसाने के लिए ‘सिखाया’ होगा.

अदालत ने कहा, ‘यह बहुत ही असंभव है कि पांच साल की छोटी बच्ची को आरोपी से कोई द्वेष हो या वह इस तरह की झूठी कहानी गढ़े. पीड़िता और उसकी मां का बयान बिल्कुल स्वाभाविक प्रतीत होता है. वे तुरंत थाने गए और बयान दर्ज कराया.’

कोर्ट ने आगे कहा कि घटना के समय पीड़िता पांच साल की नाबालिग बच्ची थी. जब वह गवाह के रूप में पेश हुई तब वह आठ साल की थी. दर्ज साक्ष्य स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उसने तथ्यों को बहुत स्पष्ट रूप से और बिना किसी के सिखाए-पढ़ाए बताया था. इसलिए अदालत पाती है कि आईपीसी की धारा 376 और पॉक्सो अधिनियम की धारा 6 के तहत अपराधों के संबंध में अभियोजन पक्ष ने अपना मामला संदेह से परे साबित कर दिया है.