राष्ट्रगान बनाम राष्ट्रगीत, सरकार की राष्ट्रीय प्रतीकों के ख़िलाफ़ लड़ाई की अगली कड़ी है

सरकार ने कहा है कि राष्ट्रगान से पहले अनिवार्य तौर पर हमेशा राष्ट्रीय गीत- वंदे मातरम, को पूरे छह छंदों के साथ गाना होगा. यह दावा करना कि वंदे मातरम का दर्जा बढ़ाया जा रहा है, असल में राष्ट्रगान को नीचा दिखाने का एक तरीका है.

7 नवंबर, 2025 को नई दिल्ली में राष्ट्रगीत 'वंदे मातरम' के 150 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में प्रधानमंत्री. (फोटो साभार: पीआईबी)

मोदी सरकार राष्ट्रगान को दूसरे नंबर पर लाना चाहती है.

सरकार ने कहा है कि इसे गाने से पहले अब हमेशा राष्ट्रीय गीत- वंदे मातरम, पूरे छह छंदों के साथ गाना होगा. मगर क्यों?

भारत के गौरव और नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर द्वारा रचित ‘जन गण मन’ से आखिर कैसा डर है कि गृह मंत्रालय के एक गुप्त आदेश के ज़रिए ‘नियमों’ में बदलाव करके इसके महत्व को कम किया जा रहा है?

यह दावा करना कि राष्ट्रीय गीत ‘वंदे मातरम’ का दर्जा बढ़ाया जा रहा है, असल में राष्ट्रगान को नीचा दिखाने का एक तरीका है. ‘वंदे मातरम’ के शुरुआती दो छंद बेहद सुंदर और मधुर हैं और उनका पहले से ही बहुत सम्मान किया जाता है. दशकों से चली आ रही परंपरा के अनुसार, जब संसद का सत्र समाप्त हुआ, तब समापन के प्रतीक के रूप में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ नहीं, बल्कि राष्ट्रीय गीत की धुन बजाई गई.

2024 के लोकसभा चुनाव, जो एक बहुत ही बुनियादी मुद्दे यानी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संविधान के खिलाफ होने और उसे बदलने की मंशा रखने के डर, पर लड़े गए थे, उसके बारे में फिर सोचने की ज़रूरत है.

कई सांसदों और मंत्रियों ने भी ‘400 पार’ का नारा यह कहते हुए दिया था कि इससे वे संविधान में संशोधन कर सकें. सांसदों, मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों ने भाजपा की 400 से अधिक सीटें जीतने की इच्छा के बारे में बात की ताकि वे आरक्षण को खत्म कर सकें; मध्य प्रदेश के धार में तो ख़ुद नरेंद्र मोदी ने कहा था कि ‘मोदी को चार सौ सीटें इसलिए चाहिए कि कांग्रेस अयोध्या के राम मंदिर पर बाबरी ताला न लगा दे’ या जम्मू-कश्मीर में अनुच्छेद 370 को वापस लाने की अपनी कथित योजना में सफल न हो सके.

इसमें बात पर कोई शक होना चाहिए कि संविधान बदलने से भी आगे जाकर, भाजपा भारत के खिलाफ अब डंके की चोट पर जो मुख्य लड़ाई लड़ रही है, वह उन संवैधानिक प्रतीकों के खिलाफ है जो बेहद महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे इस बात का प्रतीक हैं कि यह राष्ट्र किसके लिए है और यह किसका है- यह सबका है.

यह डर कि भाजपा वाकई में संविधान में संशोधन कर देगी, काफी हद तक उसकी हार का कारण बना, भले ही वह किसी तरह जोड़-तोड़ कर गठबंधन की सरकार बनाने में सफल रही. लोकसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत से पिछड़ने के कुछ ही दिनों बाद महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने कहा था कि ‘400 पार’ के नारे के बाद लोगों के मन में संविधान में बदलाव और आरक्षण खत्म किए जाने को लेकर गहरी आशंका पैदा हो गई थी.

भाजपा ने ‘नई शिक्षा नीति 2020’ के तहत हिंदी को थोपने की हरसंभव कोशिश की है, और इसके बाद विधेयकों के नामकरण, देशभर में जाने वाली सार्वजनिक सूचनाओं और साइनबोर्ड में भी हिंदी ही इस्तेमाल की जा रही है. लेकिन राष्ट्रगान का हिंदी या संस्कृत में न होना उनके लिए चीजों को मुश्किल बना देता है, क्योंकि यह बांग्ला में है. यह बात निश्चित रूप से भाजपा को परेशान तो करती होगी. विशेष रूप से आज की तारीख़ में, जब देश से ‘घुसपैठियों’ को निकालने वाली बयानबाज़ी के साथ ‘अवैध प्रवासियों’ से देश को मुक्त करने के आह्वान हो रहे हैं, और निशाने पर बांग्लाभाषी ही हैं.

ऐसे में राष्ट्रगान को सीधे तौर पर हटाना मुश्किल हो सकता है, इसलिए एक ऐसे दूसरे गीत (वंदे मातरम) को प्राथमिकता देना, जहां तीसरे छंद के बाद का संदर्भ भारत के ‘मुसलमानों से लड़ने’ की बात कहता है, उनके लिए आदर्श विकल्प है. गीत के विवादित छंदों को शामिल कर राष्ट्रगान से पहले ‘हिंदू बनाम मुस्लिम’ की धुन छेड़ना फ़िलहाल उनके लिए एक दोहरे फायदे वाली स्थिति है.

‘जन गण मन’ की रचना ऐसे प्रसिद्ध ‘अंतरराष्ट्रीयतावादी’ ने की थी, जो 1930 के दशक के नाजीवाद और इतालवी फासीवाद जैसे संकीर्ण और बहिष्कारी राष्ट्रवाद से अपनी स्पष्ट घृणा ज़ाहिर कर चुके थे. इन्हीं विचारधाराओं ने हिंदुत्ववादियों को प्रेरित किया था और ख़ुद आरएसएस के संस्थापकों- एमएस गोलवलकर और हेडगेवार के शब्दों में, ये संघ के गठन के लिए गहरी प्रेरणा थे. राष्ट्रगान को उसके ऊंचे दर्जे से हटा पाना संघ को राष्ट्रीय आंदोलन से जुड़े एक और जीवंत सिद्धांत- टैगोर के विचारों और दर्शन- को पूरी तरह से बर्बाद करने में मदद करेगा.

टैगोर का एक अन्य गीत ‘आमार सोनार बांग्ला’ बांग्लादेश का राष्ट्रगान है, और यह भारत को अपने पूर्वी पड़ोसी के साथ जोड़ता है. राष्ट्रगान के महत्व को कम करना दक्षिण एशिया के इस बंधन को तोड़ने का भी जरिया बनता है. ‘वंदे मातरम’ को प्राथमिकता देना दक्षिण एशियाई संबंधों को ‘हिंदुत्ववादी ताकत’ के बतौर पेश करने जैसा है. क्या इस अधिसूचना के आने के समय के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है? (हालांकि, गृह मंत्रालय ने अभी तक इसकी पुष्टि नहीं की है.)

‘वंदे मातरम’ के प्रति सम्मान बढ़ाने का जो यह महीन पर्दा डाला जा रहा है, वह असल में बहुत ही कमजोर है. इसके पीछे का मुख्य विचार अपनी शक्ति का प्रदर्शन करना और यह दिखाना है कि अल्पमत वाली एक सरकार भी भारत के ताने-बाने के साथ छेड़छाड़ करना चाहती है.

ऐतिहासिक तौर पर बात करें, तो आरएसएस हमारे लगभग सभी राष्ट्रीय प्रतीकों के साथ असहज रहा है. नागपुर स्थित संघ मुख्यालय पर पहली बार राष्ट्रीय ध्वज साल 2002 में फहराया गया था. राष्ट्रगान का किसी के प्रति ‘शत्रुतापूर्ण न होना’ और ‘साझा व सकारात्मक राष्ट्रवाद’ की भावना से ओत-प्रोत होना, हिंदुत्व की संकीर्णता के विरुद्ध है.

हाल ही में आई किताब ‘वी द पीपल ऑफ इंडिया’ में टीएम कृष्णा ने इन सभी बातों को प्रमुखता से उठाया है कि कैसे हमारे हर राष्ट्रीय प्रतीक का जन्म उस राष्ट्रीय आंदोलन में हुआ था, जिसमें आरएसएस की कोई भागीदारी नहीं थी. आरएसएस ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ को मानता था, जो मुसलमानों के लिए पाकिस्तान की मांग करने वाली मुस्लिम लीग का ही अक्स था- हिंदुओं के लिए अलग राष्ट्र की मांग. ये राष्ट्रीय प्रतीक उन्हें उनके अपने अंधेरे इतिहास की याद दिलाते हैं, साथ ही उस ‘साझा भारत’ का सच भी बताते हैं, जिसे आरएसएस नकारना और ख़त्म कर देना चाहता है.

ऐसा लगता है कि अब राष्ट्रगान को अपमानित करने की बारी है, और वह भी राष्ट्रीय गीत के छूटे हुए छंदों के प्रति ‘ज्यादा सम्मान’ दिखाने के बहाने.

शायद यही इसके ख़िलाफ़ खड़े होने का सबसे सही समय है.

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