सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष समेत तमाम भाजपा समर्थक अचानक 'जेंडर-विरोधी अपशब्दों और गालियों' को लेकर बहुत संवेदनशील हो गए हैं. असल में युवाओं की 'ग़लत' भाषा की आलोचना की आड़ में यह नरेंद्र मोदी की छवि बचाने का प्रयास है.
शिक्षा मंत्रालय का मौजूदा संकट केवल पेपर लीक, नीट विवाद या एनटीए की विश्वसनीयता पर उठे सवालों तक सीमित नहीं है. मौजूदा सरकार के लिए इसका महत्व इन तात्कालिक मुद्दों से कहीं अधिक व्यापक है.
जो सैको की किताब 'द वंस एंड फ्यूचर रायट' पहले फ्रेंच में प्रकाशित हुई. भारत में भी यह उम्मीद की जा रही थी कि इसका भारतीय संस्करण - अंग्रेज़ी में - जल्द ही पाठकों के हाथों में होगा. हालांकि, अब लगभग तय है कि इसका भारतीय संस्करण पाठकों तक नहीं पहुंचेगा.
सरकार ने कहा है कि राष्ट्रगान से पहले अनिवार्य तौर पर हमेशा राष्ट्रीय गीत- वंदे मातरम, को पूरे छह छंदों के साथ गाना होगा. यह दावा करना कि वंदे मातरम का दर्जा बढ़ाया जा रहा है, असल में राष्ट्रगान को नीचा दिखाने का एक तरीका है.
हालिया रिलीज़ फिल्म 'इन गलियों में' लखनऊ की पृष्ठभूमि में एक छोटे से शहर में अंतरधार्मिक प्रेम की बारीकियों को दर्ज करते हुए समाज की इस पर प्रतिक्रिया दिखाती है. प्रोपगैंडा फिल्मों की भीड़ में बदलाव जैसी इस फिल्म के निर्देशक अविनाश दास से द वायर की संपादक सीमा चिश्ती की बातचीत.
वीडियो: ‘अयोध्या: द डार्क नाइट’ के लेखक-पत्रकार धीरेंद्र के झा और ‘अयोध्या: सिटी ऑफ फेथ, सिटी ऑफ डिस्कॉर्ड’ नामक किताब के लेखक-पत्रकार वलय सिंह से द वायर की संपादक सीमा चिश्ती की बातचीत.
सूचना और प्रसारण मंत्रालय द्वारा तैयार प्रसारण सेवा (विनियमन) विधेयक, 2023 या प्रसारण विधेयक को सेंसरशिप चार्टर के बतौर देखा जा सकता है, जहां 'केंद्र सरकार' स्वतंत्र समाचारों को सेंसर बोर्ड जैसे दायरे में घसीटना चाहती है.
साक्षात्कार: सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सिग्नल की प्रेसिडेंट मेरेडिथ ह्विटेकर का मानना है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को विनियमित किया जाना चाहिए. साथ ही वे मानती हैं कि यूज़र्स की निजता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाना चाहिए.
आधुनिक भारत में हिंदू धर्म के संबंध में गांधी जो करने की कोशिश कर रहे थे, गीता प्रेस उसके ठीक उलट लड़ाई लड़ रही थी और लड़ रही है.
कर्नाटक में कांग्रेस की जीत ने 2015 के दिल्ली और 2020 पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की याद दिलाई है, जहां किसी एक दल ने मोदी-शाह के रुतबे को चुनावी मैदान में पछाड़ दिया था. लेकिन फिर भी ऐसा नहीं है कि ऐसी जीत के साथ भारत के लोकतंत्र में अचानक सब ठीक हो गया हो.