नई दिल्ली: केंद्रीय विधि एवं न्याय मंत्रालय ने शुक्रवार (13 फरवरी) को संसद में जानकारी दी कि पिछले एक दशक में भारत के मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) के कार्यालय को मौजूदा जजों के ख़िलाफ़ 8,630 शिकायतें मिली हैं.
बार एंड बेंच की खबर के मुताबिक, सरकार की ओर से यह डेटा विधि एवं न्याय राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) अर्जुन राम मेघवाल ने द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) के सांसद माथेस्वरन वीएस द्वारा लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के जवाब में दिया गया.
उल्लेखनीय है कि माथेस्वरन वीएस ने मंत्रालय से उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार, यौन दुराचार या अन्य गंभीर अनियमितताओं से संबंधित शिकायतों की सूची मांगी थी.
इसके जवाब में अर्जुन राम मेघवाल ने सर्वोच्च न्यायालय से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर लिखित जवाब प्रस्तुत करते हुए बताया कि मौजूदा न्यायाधीशों (सिटिंग जजों) के ख़िलाफ़ 8630 शिकायतें मिली हैं. इनमें सबसे ज्यादा 1170 शिकायतें वर्ष 2024 में मिलीं, जबकि सबसे कम 518 शिकायतें 2020 में सीजेआई कार्यालय को प्राप्त हुई हैं.

अपने सवाल में माथेस्वरन ने यह भी पूछा था कि क्या इन शिकायतों पर कोई कार्रवाई की गई है.
हालांकि, विधि मंत्रालय के जवाब में इस पहलू का कोई उल्लेख नहीं किया गया. साथ ही यह भी स्पष्ट नहीं किया गया कि शिकायतों पर की गई कार्रवाई का कोई रिकॉर्ड क्यों नहीं है.
इस संबंध में सासंद द्वारा एक और सवाल यह उठाया गया था कि क्या केंद्र सरकार को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा भ्रष्टाचार, यौन दुराचार या अन्य गंभीर अनियमितताओं से संबंधित उच्च न्यायालयों या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ प्राप्त शिकायतों के रिकॉर्ड या डेटाबेस को बनाए रखने के लिए उपयोग की जाने वाली किसी व्यवस्था की जानकारी है.
यदि हां, तो विगत दस वर्षों में ऐसी कितनी शिकायतें प्राप्त हुईं और उन पर वर्षवार क्या कार्रवाई की गई.
सवाल में ये भी पूछा गया था कि क्या सरकार का विचार न्यायपालिका के सदस्यों के ख़िलाफ़ मिली शिकायतों को व्यवस्थित रूप से दर्ज करने, निगरानी करने और उनकी जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दिशा निर्देश जारी करने या कदम उठाने का है.
इन सबके जवाब में केवल इतना कहा गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश ‘आंतरिक प्रक्रिया’ के अनुसार न्यायाधीशों के ख़िलाफ़ शिकायतें प्राप्त करने के लिए सक्षम हैं.
जवाब में आगे यह भी कहा गया कि केंद्रीयकृत लोक शिकायत निवारण एवं निगरानी प्रणाली (सीपीग्राम) या किसी अन्य माध्यम से प्राप्त उच्च न्यायपालिका के सदस्यों के ख़िलाफ़ शिकायतें मुख्य न्यायाधीश या संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को भेजी जाती हैं, जो ऐसी शिकायतों को प्राप्त करने के लिए सक्षम हैं.
मंत्री ने माथेस्वरन के इस सवाल का भी जवाब नहीं दिया कि क्या सरकार उच्च न्यायपालिका के सदस्यों के ख़िलाफ़ शिकायतों की व्यवस्थित रिकॉर्डिंग, निगरानी और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए दिशानिर्देश जारी करने या कदम उठाने का प्रस्ताव करती है.
इस संबंध में पत्रकार सौरभ दास ने एक सोशल मीडिया पोस्ट के माध्यम से चिंता जाहिर करते हुए कहा, ‘मद्रास हाईकोर्ट के पूर्व कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश टी. राजा के ख़िलाफ़ भ्रष्टाचार और कदाचार की शिकायतों से संबंधित मेरे मामले में दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष, सर्वोच्च न्यायालय रजिस्ट्री ने शपथ पत्र में कहा है कि वह मांगे गए प्रारूप में डेटा नहीं रखती है. लेकिन फिर संसद को वर्षवार डेटा कैसे दिया गया?’
#BREAKING: Over 8,600 complaints were received against sitting judges by the Office of the Chief Justice of India in last ten years alone!
The Supreme Court of India presented this data to the Union Law Ministry in response to a Parliamentary question by Mr. Matheswaran V.S.… pic.twitter.com/fWNMJF89DW
— Saurav Das (@SauravDassss) February 13, 2026
उन्होंंने आगे सवाल उठाया, ‘तो क्या सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री दिल्ली उच्च न्यायालय के समक्ष शपथ पर झूठ बोल रही है? यदि ऐसा है, तो यह अभूतपूर्व है और डेटा देने से इनकार करके एक न्यायाधीश का संरक्षण करने वालों के ख़िलाफ़ कड़ी से कड़ी कार्रवाई की जानी चाहिए! किसका संरक्षण किया जा रहा है? वे ऐसा क्यों कर रहे हैं? और मेरे आरटीआई प्रश्न का हां या ना में जवाब देने से उन्हें क्या डर है? यहां तक कि वे माननीय उच्च न्यायालय को गुमराह करने की हद तक चले गए. आज व्यवस्था का पर्दाफाश हो गया है! जवाबदेही तय होनी चाहिए.’
