नई दिल्ली: सितंबर 2025 में हुए जेन ज़ी (युवा) प्रदर्शनों के बाद हुए पहले चुनाव में नेपाल के मतदाताओं ने पुराने राजनीतिक नेतृत्व को नकार दिया है. मतदाताओं ने तीन साल पहले बनी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) को भारी समर्थन दिया, जिससे उसके नेता बालेन्द्र ‘बालेन’ शाह के प्रधानमंत्री बनने का रास्ता साफ होता दिख रहा है.
नेपाल के निर्वाचन आयोग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, आरएसपी 18 सीटें जीत चुकी है और 99 अन्य सीटों पर आगे चल रही है. इसके मुकाबले नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल (यूनिफाइड मार्क्सिस्ट-लेनिनिस्ट) काफी पीछे रह गए.
रैपर से राजनेता बने और काठमांडू के पूर्व मेयर बालेन शाह (35 वर्षीय) ने झापा-5 सीट पर अपने प्रतिद्वंद्वी, यूएमएल नेता और पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली पर अच्छी बढ़त बना ली है.
हिंदू राष्ट्र और बालेन शाह
पूर्व पत्रकार रवि लामिछाने के नेतृत्व वाली आरएसपी ने सोशल मीडिया का प्रभावी इस्तेमाल करते हुए खुद को युवा नेतृत्व वाली पार्टी के रूप में पेश किया है, जो अपने प्रतिद्वंद्वियों की तुलना में भ्रष्टाचार और टूटे वादों से कम दागदार दिखती है.
कुछ विश्लेषकों का कहना है कि बालेन और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (आरएसपी) के भीतर राजशाही और हिंदू राष्ट्रवाद के प्रति सहानुभूति हो सकती है. बालेन अक्सर दिवंगत राजा महेन्द्र की शैली में कपड़े पहनते हैं. राजा महेन्द्र वही शासक थे जिन्होंने 1960 में तख्तापलट कर थोड़े समय के लोकतंत्र को खत्म कर दिया था और उसके बाद कई दशकों तक तानाशाही शासन चला.
बालेन की सोशल मीडिया पोस्ट में ‘जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है’ जैसे वाक्य भी मिलते हैं, जो हिंदू राष्ट्रवादियों का एक लोकप्रिय नारा है. भारत में आरएसएस से जुड़े विश्व हिंदू परिषद (विहिप) का वाक्य भी ‘धर्मो रक्षति रक्षित:’ ही है.
हर हर महादेव।।
धर्मो रक्षति रक्षितः pic.twitter.com/OXZ1mtjDu0
— Balen Shah (@ShahBalen) February 15, 2026
हालांकि आरएसपी के चुनावी वादों में ऐसी व्यक्तिगत सहानुभूतियों का कोई उल्लेख नहीं है. लेकिन फॉरेन पॉलिसी मैगजीन से बातचीत में स्वतंत्र शोधकर्ता भास्कर गौतम ने कहा है कि राजशाही से अलग, हिंदू श्रेष्ठता की ओर धीरे-धीरे हो रहे सांस्कृतिक बदलाव में भी खतरा है.
उन्होंने बालेन और अन्य बड़े राजनेताओं द्वारा धार्मिक संकेत देने की प्रवृत्ति की ओर इशारा किया, जो पहले नेपाल में असामान्य थी.
उन्होंने कहा, ‘अब यह हर जगह दिखने लगा है. यहीं वे सफल हुए हैं.’ यह बात उन्होंने हिंदू स्वयंसेवक संघ जैसे हिंदू दक्षिणपंथी संगठनों की ओर संकेत करते हुए कही, जो खुद को एक गैर-लाभकारी संगठन बताता है, और जिसकी सैकड़ों शाखाएं हैं. यह संगठन उसी ‘परिवार’ से जुड़ा माना जाता है, जिससे भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) भी जुड़ी है.
नेपाल और राजशाही
1768 में जब गोरखा के राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल को एकीकृत किया था, तब से लेकर 2008 यानी 200 वर्ष से अधिक समय तक नेपाल हिंदू राजतंत्र रहा.
नेपाल का राजशाही से धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में परिवर्तन तब शुरू हुआ जब राजा ज्ञानेंद्र शाह ने 2005 में माओवादी विद्रोह को खत्म करने के नाम पर निर्वाचित नेताओं से सत्ता छीन ली थी. लेकिन यह कदम उल्टा पड़ गया. अगले ही साल एक बड़े जन आंदोलन के दबाव में ज्ञानेंद्र को संसद बहाल करनी पड़ी.
2007 में लागू किए गए अंतरिम संविधान ने देश को धर्मनिरपेक्ष घोषित किया और साथ ही ऐसे प्रावधान किए जिन्होंने राजशाही के अंत का रास्ता तैयार किया. बाद में 2015 में लागू स्थायी संविधान ने नेपाल की इस नई स्थिति को औपचारिक रूप से पक्का कर दिया.
नेपाल चुनाव का समीकरण
संसद के कुल 275 सदस्यों में से 165 सदस्य प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से चुने जाएंगे, जबकि बाकी 110 सदस्य आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के जरिए चुने जाएंगे. नेपाल के चुनावों में लगभग 1.89 करोड़ नागरिक मतदान करने के पात्र थे. इनमें से लगभग 60 प्रतिशत मतदाताओं ने गुरुवार (5 मार्च 2026) को मतदान किया.
165 सीटों के लिए प्रत्यक्ष मतदान के तहत करीब 3,400 उम्मीदवार मैदान में हैं, जबकि 110 सीटों के लिए आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत 3,135 उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं.
पिछले साल 8 और 9 सितंबर को जेन ज़ी युवाओं के दो दिन तक चले तीव्र प्रदर्शनों के कारण प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को पद से हटना पड़ा था. उस समय वे नेपाली कांग्रेस के समर्थन से बनी गठबंधन सरकार का नेतृत्व कर रहे थे, जिसे लगभग दो-तिहाई बहुमत का समर्थन प्राप्त था.
ओली के पद से हटने के बाद राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने 12 सितंबर को प्रतिनिधि सभा को भंग कर दिया और सुशीला कार्की को कार्यवाहक प्रधानमंत्री नियुक्त किया.
जेन ज़ी युवाओं द्वारा उठाए गए प्रमुख मुद्दों में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई, सुशासन, भाई-भतीजावाद का अंत और राजनीतिक नेतृत्व में पीढ़ीगत बदलाव जैसी मांगें शामिल हैं.
नेपाल के चुनावी नतीजों पर भारत में भी करीबी नजर रखी जा रही है, क्योंकि नेपाल की राजनीतिक दिशा, क्षेत्रीय विवादों और इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव को लेकर चिंताएं बनी हुई हैं.
