युद्ध के दौरान सत्ता ही समाज हो जाती है; समाज की स्वतंत्र सत्ता ग़ायब कर दी जाती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आम तौर पर सत्तारूढ़ शक्तियों और उनके अंधभक्त अनुयायियों को छोड़कर हर कहीं व्यापक समाज युद्ध के विरुद्ध ही होता है. सबसे अधिक जनधन हानि समाज को ही उठाना पड़ती है.

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(इलस्ट्रेशन: परिप्लब चक्रवर्ती/द वायर)

पश्चिम एशिया में युद्ध शुरू होने के तीन सप्ताह बाद सरकार ने यह बात स्वीकारी कि युद्ध के कारण हम पर अनेक दुष्प्रभाव पड़ने जा रहे हैं जो ‘चिंताजनक’ हैं पर वह आश्वस्त कर रही है कि हम उनसे निपट लेंगे और हमारी काफ़ी तैयारी है. उसने यह इसरार भी किया कि जिन मसलों को लेकर युद्ध हो रहा है उनसे बातचीत और राजनय से ही निपटा जा सकता है.

उसने होर्मुज़ से जहाजों पर लगाई बंदिशों की निंदा तो की, पर अमेरिका-इज़रायल द्वारा सारे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों और व्यापक सहमति का सरासर ढीठ उल्लंघन करते हुए ईरान पर किए हमले पर कुछ नहीं कहा. उसकी निंदा करना तो दूर.

आम तौर पर सत्तारूढ़ शक्तियों और उनके अंधभक्त अनुयायियों को छोड़कर हर कहीं व्यापक समाज युद्ध के विरुद्ध ही होता है. सबसे अधिक जनधन हानि समाज को ही उठाना पड़ती है. बड़ी संख्या में नागरिक हताहत होते हैं और सामान्य जनजीवन प्रभावित होता है.

एक समस्या यह होती है कि जब युद्ध चल रहा हो तो समाज अपनी असहमति या असहयोग कैसे-कहां व्यक्त करे. कोई भी सत्ता उसे राजद्रोह क़रार दे सकती है, अक्सर देती ही हैं. बल्कि युद्ध के दौरान सत्ताएं जानबूझकर समाज का स्वयं स्थानापन्न बनने और उसे लगभग अतिक्रमित या स्थगित करने का उपक्रम करती हैं.

माहौल ऐसा बनाया जाता है कि युद्ध के दौरान राज ही समाज है और समाज की स्वतंत्र सत्ता ग़ायब हो जाती है या कर दी जाती है.

ऐसे दुर्भाग्यपूर्ण समय में समाज के कुछ साहसिक अंग, उसके लेखक-कलाकार और बुद्धिजीवी आदि युद्ध की अमानवीयता, उसकी अंततः विफलता, उसके द्वारा की जा रही बर्बादी-ख़राबी, उसके द्वारा लादी जा रहे अभावों और कटौतियों को दर्ज़ करते और उनकी सतर्क समीक्षा और आलोचना करते हैं. वे युद्ध को एकमात्र विकल्प मानने की मानसिकता का खोखलापन ज़ाहिर करते हैं.

दूसरे शब्दों मे, राज द्वारा ऐसे ऐतिहासिक क्षणों में समाज को हड़पे जाने या अपने में विलय का प्रतिरोध करते हैं. यह ऐसी नागरिक नैतिकता से उपजा आचरण है जो समाज को ऐसे समय में सच्ची सामाजिकता और अंतःकरण का आयतन विस्तृत करता है.

इस मुक़ाम पर यह सवाल उठता है कि क्या आज भारतीय समाज, जो युद्ध हो रहे हैं, से लेकर गाज़ा, यूक्रेन और ईरान तक उनके चलते मनुष्यता, अंतःकरण, मानवीय बिरादरी के पक्ष में स्पष्ट और मुखर है?

गांधी और हिंदी साहित्य

नई दिल्ली स्थित मोतीलाल नेहरू कॉलेज ने पिछले सप्ताह ‘गांधी वैचारिकी और हिंदी साहित्य’ विषय पर एक परिसंवाद आयोजित किया जिसमें जाने का मौका मिला. मुझे लगा कि साहित्य पर जो कई प्रभाव पड़ते हैं, उनमें विचार भी हैं पर वही एकमात्र नहीं है.

साहित्य स्वयं भी विचार की एक विधा है- वह अपने से मनुष्य की स्थिति-नियति, आत्म और पर, व्यक्ति और समाज, मानवीय संबंध, भाषा और अभिव्यक्ति आदि के बारे में स्वायत्त रूप से सोचता-विचारता है. साहित्य, सच्चा और महत्वपूर्ण साहित्य किसी विचार या विचारधारा या वैचारिकी का उपनिवेश नहीं होता. जिन वैचारिकियों ने हिंदी साहित्‍य को प्रभावित किया उनमें गांधी वैचारिकी भी एक है. लेकिन गांधी के यहां विचार और आचरण में, वैचारिक आग्रहों और कर्म में दूरी कम से कम है.

गांधी के यहां विचार शुद्ध विचार नहीं है, वह सकर्मक विचार है: वह आचरण से पुष्ट-सशक्त, सत्यापित या मटमैला होता रहा है.

गांधी का हिंदी साहित्य से संबंध उनके साहित्य से संबंध का एक हिस्सा है. उन जिन लेखकों का प्रभाव था उनमें तोल्स्तोय, रस्किन के अलावा तुलसीदास भी थे. लेकिन उनके राम तुलसीदास के दशरथनंदन कम, कबीर के राम अधिक थे. उनकी रामराज्य की अवधारणा तुलसीदास से आयी थी पर उन्होंने उसका राजनीतिक-सांस्कृतिक पुनराविष्कार किया था. उनके द्वारा संकलित ‘आश्रम भजनावली’ में तुलसी, कबीर आदि कई भक्त कवियों की रचनाएं शामिल थीं.

गांधी का अपने समय के अनेक हिंदी लेखकों जैसे प्रेमचंद, मैथिली शरण गुप्त, जैनेन्द्र कुमार, बनारसी दास चतुर्वेदी आदि से संवाद था. उनकी हिंदी साहित्य की स्थिति के बारे में धारणा का निराला ने मुखर सार्वजनिक प्रतिवाद किया था. उग्र के एक कहानी-संग्रह को, जिसमें समलैंगिकता आदि को लेकर कुछ कहानियां थीं और जिसे घासलेटी साहित्य क़रार देकर अश्लीलता के विरुद्ध एक अभियान चल रहा था, गांधी ने अश्लील नहीं पाया था. वह बनारसी अभियान ध्वस्त हो गया था.

हिंदी के अनेक लेखकों-कवियों ने गांधी को लेकर कई महत्वपूर्ण कृतियां लिखीं. उन्हें हिंदी साहित्य सम्मेलन के एक वार्षिक अधिवेशन का सभापति बनाया गया. गांधी का हिंदी- प्रेमी जगज़ाहिर रहा है. हिंदी को देश की राष्ट्रभाषा बनाने का विचार सबसे सशक्त ढंग से उन्होंने ही प्रतिपादित किया था. देश के सभी हिस्सों में उनके भाषण अधिकांशतः हिंदी में ही होते थे. उनके प्रसिद्ध प्रार्थना-प्रवचन भी हिंदी में ही दिए जाने थे.

हिंदी का प्रचार-प्रसार करने के लिए उनकी पहल पर ही राष्ट्रभाषा प्रचार समिति गठित की गई थी. गांधी ने जो भाषा-नीति विकसित की थी, हिंदी उसके केंद्र में थी. इस पर भी ध्यान जाना चाहिए कि उनके कई रैडिकल राजनीतिक प्रोजेक्ट और अवधारणाओं के नाम हिंदी में थे: सत्याग्रह, स्वराज, असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा, भारत छोड़ो आंदोलन. अपनी आत्मकथा और हिंद स्वराज को छोड़कर, बाद में गांधी ने अपनी पुस्तकें हिंदी में ही लिखीं.

यह भी कहा जा सकता है कि गांधी ने अपने उदाहरण और व्यापक प्रभाव से देश की अनेक मातृभाषाओं में लिखने-पढ़ने-का आत्मविश्वास जगाया. गांधी ने दी हुई भाषा के ढांचे में जो बदलाव किए, उसे बोलचाल आदि के ज़्यादा नज़दीक लाया, उनके अलावा उन्होंने, एक तरह से, विचार और कर्म की, राजनीति और सामाजिकता की एक नई समावेशी भाषा विकसित की.

उनके यहां विचार की भाषा संवादपरक है; संघर्ष की भाषा अहिंसक है; अध्यात्म की भाषा सर्वधर्मसमभाव में रसी-बसी है; धर्म की भाषा निर्भयता से आप्लावित है और अनुभूति की भाषा में ‘पीर पराई’ का अहसास अनिवार्य है.

यह नोट करना दिलचस्प है कि जिस समय गांधी का प्रभाव पड़ना शुरू हुआ उस समय हिंदी साहित्य में अपने से रूढ़ियों, बासे पड़ गए अभिप्रायों आदि से स्वतंत्रता संग्राम शुरू हो गया था. वह स्वाभाविक रूप से व्यापक संग्राम से जुड़ गया. विजयदेव नारायण साही ने छायावाद को ‘सत्याग्रह युग’ बताया है.

हिंदी में समावेशिता, खुलापन, ग्रहणशीलता और प्रश्नवाचकता में इज़ाफा हुआ. उसमें अखिल भारतीयता का बोध अधिक स्पष्ट और सक्रिय हुआ. गांधी ने अपने विचार, कर्म और संग्राम में साधारण को केंद्रीयता दी और इसी दौरान हिंदी में जिस आधुनिकता ने फैलाना-बढ़ना शुरू किया उसमें साधारण की केंद्रीयता और महिमा प्रतिष्ठित और व्यापक हुई.

बीसवीं सदी के चौथे दशक में प्रगतिशीलता की नई वैचारिकी ने जन्म लिया और उसे व्यापक करने और फैलाने का बहुत संगठित प्रयत्न हुआ. एक तरह से यह नई वैचारिकी लेखकों को यथार्थ के अधिक नज़दीक लगी और उसकी व्याप्ति ने गांधी के प्रभाव को शिथिल करना शुरू किया.

इस पर भी ध्यान देना चाहिए कि गांधी की अध्यात्मपरकता और धर्मबोध को हिंदी साहित्य ने सिरे से नकार दिया. नतीजन, साहित्य का धर्मों से, धर्मनिरपेक्षता के आग्रह के चलते, संवाद बंद हो गया. इस विसंवाद के भी कुछ दुर्भाग्यपूर्ण फलितार्थ हुए.

हिंदी में बंटवारे के बाद अपने अंचल से मुसलमानों के पाकिस्तान चले जाने से जो सामाजिक ख़ालीपन आया होगा उसे न तो दर्ज किया गया, न साहित्य में महसूस ही. हिंदी अंचल में, धर्मनिरपेक्ष साहित्य के बावजूद, इधर धर्मांधता, सांप्रदायिकता, हिंसा-हत्या-झूठ-घृणा की मानसिकता बहुत प्रबल, व्यापक और आक्रामक हो गई है. यह भी स्पष्ट है कि गांधी ने जो वैकल्पिक आधुनिकता प्रस्तावित की थी, उस पर हिंदी साहित्य ने कभी गंभीरता से विचार तक नहीं किया.

भले धीरे-धीरे साहित्य में गांधी वैचारिकी का प्रभाव घटता गया, बीच-बीच में ऐसी कृतियां, बड़ी और महत्वपूर्ण आयी हैं जिनमें गांधी की उपस्थिति है. रेणु के उपन्यास ‘मैला आँचल’ और मुक्तिबोध की लंबी कविता ‘अँधेरे में’ का उल्लेख किया जा सकता है. नरेश मेहता के उपन्यास ‘यह पथ बन्धु था’ में भी ऐसी ही उपस्थिति है.  मुक्तिबोध 1964 में प्रकाशित कविता में जो रैडिकल संशोधन पारंपरिक अवधारणा ‘सत्-चित्-आनंद’ में कर उसे ‘सत्-चित्-वेदना’ कर देते हैं उसके पीछे गांधी ही हैं.

इधर एक क्रूर सांप्रदायिक-धर्मांध-आततायी शासन में वैचारिक स्तर पर गांधी के कई प्रयत्नों सत्याग्रह, असहयोग, सविनय अवज्ञा आदि का पुनर्वास हो रहा है.

(लेखक वरिष्ठ साहित्यकार हैं.)