नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा है कि सहिष्णुता का मूल विचार यह है कि किसी व्यक्ति की मान्यताओं या विचारधारा से असहमति उसके दमन का आधार नहीं बन सकती. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि असहमति रखने वालों को राज्य और गैर-राज्य तत्वों की जबरदस्ती से संरक्षण मिलना चाहिए.
लाइव लॉ की एक रिपोर्ट के अनुसार, पिछले सप्ताह इंदौर इंस्टिट्यूट ऑफ लॉ द्वारा आयोजित ‘श्रीमती निर्मला देवी बाम अंतरराष्ट्रीय मूट कोर्ट प्रतियोगिता’ में संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि असहिष्णु समाज न तो प्रगतिशील हो सकता है और न ही समावेशी.
जस्टिस भुइयां ने कार्यक्रम में कहा, ‘दूसरों की मान्यताओं और विचारधारा से असहमति उनके दमन का कारण नहीं हो सकती, क्योंकि सहिष्णुता यह स्वीकार करती है कि किसी विषय पर एक से अधिक दृष्टिकोण हो सकते हैं.’ उन्होंने कहा कि सहिष्णुता संविधान की प्रस्तावना में निहित बंधुत्व सुनिश्चित करने की संकल्प से पैदा होती है.
जज ने कहा कि असहिष्णुता की भावना ‘अपनी मान्यताओं को दूसरों की मान्यताओं से ज़्यादा सही और श्रेष्ठ मानने की कट्टर सोच’ से पैदा होती है, और जब यह हावी होती है तो तर्कशीलता को पीछे छोड़ देती है.
उन्होंने आगे कहा, ‘एक असहिष्णु समाज कभी भी प्रगतिशील और समावेशी समाज नहीं बन सकता.’ उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि असहमति रखने वालों को ‘राज्य और गैर-राज्य तत्वों की ज़ोर-ज़बरदस्ती से बचाना ज़रूरी है, खासकर उन तत्वों से जिनका नेतृत्व कट्टर और असहिष्णु समूह करते हैं.’
लाइव लॉ के अनुसार, जस्टिस भुइयां ने यह भी कहा कि अभिव्यक्ति और बोलने की आजादी ‘हाशिये पर मौजूद और वंचित लोगों को संवैधानिक संस्कृति और लोकतांत्रिक विमर्श को आकार देने में भागीदारी का अवसर देती है.’
उन्होंने आगे कहा कि न्याय, स्वतंत्रता और समानता जैसे संवैधानिक सिद्धांतों की वास्तविक परीक्षा यह नहीं है कि विशेषाधिकार प्राप्त लोग कैसे जीवन जीते हैं, बल्कि इस बात से होती है कि वंचित लोगों के अनुभव कैसे हैं.
जस्टिस भुइयां की ये टिप्पणियां भारत में बोलने की आज़ादी – जिसमें प्रेस की आज़ादी भी शामिल है – में आ रही गिरावट को लेकर बढ़ती चिंताओं की पृष्ठभूमि में आई हैं; ये चिंताएं विशेष रूप से भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारों के कार्यकाल में ज़्यादा देखने को मिली हैं. हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर ऐसे कई पोस्ट हटाए जाने की घटनाएं सामने आई हैं जिनमें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना की गई थी, और साथ ही कॉमेडियन तथा अन्य असहमति रखने वालों के ख़िलाफ़ कानूनी या विधायी कार्रवाई का भी सहारा लिया गया है.
बीते महीनों में ही एक फिल्म ‘घूसखोर पंडित’ के शीर्षक को लेकर दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए भी उन्होंने बोलने की आज़ादी का ज़ोरदार समर्थन किया था. जज ने कहा था कि अभिव्यक्ति की आज़ादी को ‘प्रदर्शनों, जुलूसों या हिंसा की धमकियों के आधार पर दबाया नहीं जा सकता’, क्योंकि ऐसा करना ‘ब्लैकमेल और डराने-धमकाने के आगे घुटने टेकने’ जैसा होगा.
फरवरी में जस्टिस भुइयां ने कहा था, ‘हमें दूसरों के विचारों के प्रति सहिष्णुता का अभ्यास करना चाहिए. असहिष्णुता लोकतंत्र के लिए उतनी ही खतरनाक है जितनी स्वयं व्यक्ति के लिए.’ उन्होंने याचिका की सुनवाई के दौरान जोर देकर यह भी कहा था कि राज्य या गैर-राज्य तत्व किसी भी माध्यम से धर्म, जाति या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय को ‘बदनाम या अपमानित’ नहीं कर सकते.
