केंद्रीय मंत्री का यूनियन कार्बाइड का ज़हरीला कचरा साफ़ होने का दावा, गैस पीड़ित संगठनों ने झूठा बताया

भोपाल में एक कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र सिंह ने गैस त्रासदी के कचरे के निपटान को लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव की तारीफ़ की थी. अब गैस पीड़ितों के लिए काम करने वाले चार संगठनों ने मंत्री के दावे को झूठा और भ्रामक बताते हुए कहा कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर से जो ज़हरीला कचरा हटाया गया है, वह परिसर के अंदर और बाहर दबे कुल ख़तरनाक कचरे का मात्र एक प्रतिशत है.

भोपाल-यूनियन कार्बाइड. (फोटो साभार: विकीपीड़िया)

नई दिल्ली: भोपाल गैस त्रासदी से जुड़े चार संगठनों ने केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव के उस बयान का विरोध किया है, जिसमें उन्होंने यूनियन कार्बाइड के पूरे जहरीले कचरे के निपटारे का दावा किया था. संगठनों ने इस दावे को ‘झूठा और भ्रामक’ बताया.

अमर उजाला के अनुसार, भोपाल के एक कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र सिंह ने गैस त्रासदी के कचरे के निपटान को लेकर मुख्यमंत्री मोहन यादव की तारीफ की थी.

उन्होंने कहा था, ‘दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक भोपाल गैस त्रासदी के अपशिष्ट पदार्थों का पूर्णतः निष्पादन कर आपने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण एवं सराहनीय कार्य किया है. इस उल्लेखनीय पहल के लिए मैं आपका हार्दिक अभिनंदन करता हूं.’

अब एक बयान जारी करते हुए भोपाल गैस पीड़ित महिला स्टेशनरी कर्मचारी संघ की रशीदा बी ने कहा, ‘मंत्री का दावा सच्चाई से बहुत दूर है. वास्तविकता यह है कि यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर से 400 मीट्रिक टन से भी कम जहरीला कचरा हटाया गया है. सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार यह भोपाल में फैक्ट्री परिसर के अंदर और बाहर दबे कुल खतरनाक कचरे का मात्र एक प्रतिशत है.’

भोपाल ग्रुप फॉर इन्फॉर्मेशन एंड एक्शन की रचना ढींगरा ने याद दिलाया कि, ‘स्वयं केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने 19 जून 2023 को एक बैठक की अध्यक्षता की थी, जिसमें यह स्वीकार किया गया था कि बंद पड़ी फैक्ट्री और उसके आसपास मौजूद प्रदूषण के आकलन और उपचार का कार्य अभी लंबित है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘स्पष्ट है कि मंत्री को यह पता था कि उनका बयान सच्चाई के अनुरूप नहीं है.’

भोपाल गैस पीड़ित निराश्रित पेंशनभोगी संघर्ष मोर्चा के बालकृष्ण नामदेव ने कहा, ‘भारतीय विषविज्ञान अनुसंधान संस्थान (IITR) की वैज्ञानिक रिपोर्ट के अनुसार फैक्ट्री परिसर और उसके आसपास दबे खतरनाक कचरे ने बंद पड़ी यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री के 4 किलोमीटर दायरे तक के भूजल को प्रदूषित कर दिया है. संबंधित मंत्रियों और उनके पूर्ववर्तियों की उदासीनता और निष्क्रियता के कारण यह स्थिति पैदा हुई है कि भूजल प्रदूषण अब भोपाल की प्राकृतिक विरासत झीलों की ओर फैल रहा है.’

बयान में भोपाल गैस पीड़ित महिला पुरुष संघर्ष मोर्चा की नसीरीन बी ने कहा, ‘भोपाल में जारी इस पर्यावरणीय आपदा के प्रति राज्य और केंद्र सरकारों की प्रतिक्रिया दिसंबर 1984 की गैस त्रासदी के समय की प्रतिक्रिया से भी बदतर है, और यह केवल सरकारी झूठों की गुणवत्ता तक सीमित नहीं है.’

उन्होंने आगे कहा, ‘जिस राज्य सरकार के पास यह जमीन है, उसने आज तक पर्यावरणीय क्षति के लिए यूनियन कार्बाइड या उसकी मालिक डॉव केमिकल से मुआवज़ा मांगने की पहल नहीं की है. वहीं केंद्र सरकार ने अब तक प्रदूषण की गहराई, फैलाव और प्रकृति का वैज्ञानिक आकलन भी नहीं कराया है, ताकि वास्तविक सफाई कार्य शुरू हो सके.’

उल्लेखनीय है कि भोपाल गैस कांड दुनिया की सबसे बड़ी औद्योगिक आपदाओं में से एक है. 2 और 3 दिसंबर 1984 की मध्यरात्रि को यूनियन कार्बाइड कारखाने से जहरीली ‘मिथाइल आइसोसाइनेट’ गैस रिसने के बाद 5,000 से अधिक लोग मारे गए थे और लगभग 5.68 लाख लोग प्रभावित हुए थे. इसके अलावा पशुधन की हानि हुई और लगभग 5,478 व्यक्तियों की संपत्ति का नुकसान हुआ था.

इस त्रासदी में जिन लोगों की जान बची वे जहरीली गैस के रिसाव के कारण बीमारियों का शिकार हो गए. वे पर्याप्त मुआवजे और उचित चिकित्सा उपचार के लिए लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं.

यूनियन कार्बाइड कंपनी, जिसने भोपाल में कीटनाशक दवाई बनाने का कारखाना चलाया था, जहां गैस लीक हुई थी, अभी भी फरार है, जबकि डॉव केमिकल, जिसने 2001 में यूनियन कार्बाइड को खरीदा था, भारतीय कोर्ट के समन को मना कर रही है. वॉरेन एंडरसन, जो हादसे के समय यूनियन कार्बाइड के सीईओ थे, 2014 में उनकी मृत्यु हो गई थी.