नई दिल्ली: संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के तीन विशेष दूतों (special rapporteurs) ने केंद्र सरकार को पत्र लिखकर मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर गंभीर चिंता जताई है.
उनका कहना है कि इस प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम सूची से हटाए गए, जिसका सबसे अधिक असर अल्पसंख्यक समुदायों, मुख्य रूप से मुसलमानों पर पड़ा.
1 मई 2026 को भेजे गए इस संयुक्त पत्र में अल्पसंख्यक मुद्दों पर विशेष दूत निकोलस लेवरा, विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर विशेष दूत आइरीन खान और धर्म या आस्था की स्वतंत्रता पर विशेष दूत नाज़िला घाना ने कहा, ‘एसआईआर प्रक्रिया के संदर्भ में सरकार के नेताओं और वरिष्ठ सार्वजनिक हस्तियों द्वारा ऐसे बयान दिए गए, जो मुस्लिम, बंगाली और अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के खिलाफ भेदभावपूर्ण बयानबाजी के एक पैटर्न को दर्शाते और बढ़ावा देते हैं.’
पत्र में आगे कहा गया, ‘केंद्रीय गृह मंत्री (अमित शाह) सहित वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों ने कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से मतदाता सूची से नाम हटाने की प्रक्रिया को ‘अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों’ के खिलाफ कार्रवाई के रूप में पेश किया गया. यह ऐसी बयानबाज़ी है जो वैध भारतीय मुस्लिम नागरिकों को विदेशी नागरिकों के साथ एक ही श्रेणी में रखती है. ऐसी खबरें हैं कि सरकार के शीर्ष स्तरों पर बार-बार इस तरह की बातें कही गई हैं, जिसमें एसआईआर को घुसपैठियों से वोटर लिस्ट को ‘शुद्ध’ करने के तरीके के तौर पर बताया गया है.’
पत्र में संसद में पेश उस नीति का भी जिक्र किया गया, जिसमें ‘डिटेक्ट, डिलीट एंड डिपोर्ट’ (पहचानो, हटाओ और निर्वासित करो) जैसे वाक्यांश का इस्तेमाल किया गया था. दूतों ने कहा कि इसे एक धार्मिक समुदाय को ‘राज्य द्वारा संचालित चुनावी प्रक्रिया’ के जरिए निशाना बनाने के रूप में देखा जा सकता है.
पत्र में कहा गया, ‘हमें एसआईआर प्रक्रिया के तरीके को लेकर खास तौर पर चिंता है. खासकर मतदाता सूचियों से लाखों नाम हटाए जाने की खबरों को लेकर. इससे बड़ी संख्या में मुसलमान, बांग्ला मूल के लोग और दूसरे अल्पसंख्यक प्रभावित हो सकते हैं, जिन्हें अपडेटेड वोटर लिस्ट से गलत तरीके से बाहर किया जा सकता है, क्योंकि उन्हें ऐतिहासिक रूप से और अभी भी विदेशी और अवैध प्रवासी माना जाता रहा है, खासकर पश्चिम बंगाल में.
उन्होंने तर्क दिया कि ‘नेताओं और वरिष्ठ सार्वजनिक हस्तियों द्वारा भेदभावपूर्ण बयानबाजी’ ‘नागरिक और राजनीतिक अधिकारों पर अंतरराष्ट्रीय अनुबंध’ (आईसीसीपीआर) के अनुच्छेद 20(2) के तहत भेदभाव के लिए उकसाने के बराबर हो सकती है – जिसे भारत ने 1979 में मंज़ूरी दी थी – और यह ‘नस्लीय भेदभाव के सभी रूपों के उन्मूलन पर अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन’ (आईसीईआरडी) के तहत भारत की ज़िम्मेदारियों के ख़िलाफ़ भी हो सकती है.
दूतों ने कहा कि भारत चुनाव आयोग ने 4 नवंबर 2025 को नौ राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों – छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, केरल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, अंडमान एवं निकोबार द्वीप समूह, लक्षद्वीप और पुडुचेरी – में एसआईआर अभियान शुरू किया था. यह अभियान 321 जिलों और 1,843 विधानसभा क्षेत्रों में चलाया गया. यह अभियान जून और सितंबर 2025 के बीच बिहार में किए गए एक शुरुआती पायलट प्रोजेक्ट के बाद शुरू किया गया था.
जहां चुनाव आयोग का कहना था कि इस पुनरीक्षण का उद्देश्य ‘सभी पात्र नागरिकों के नाम मतदाता सूची में शामिल करना’ और ‘किसी भी अपात्र मतदाता को सूची में न रहने देना’ है, वहीं संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूतों के पत्र में जमीनी स्थिति को इससे बिल्कुल अलग बताया गया है.
पत्र के अनुसार, संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग 5.2 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जिनमें केवल पश्चिम बंगाल में 91 लाख नाम शामिल थे. रिपोर्ट के मुताबिक, प्रभावित लोगों में से कई के पास वैध पहचान दस्तावेज होने के बावजूद उनके नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए.
पत्र में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम का खास तौर पर ज़िक्र किया गया, जो एक चिंताजनक मामला है.
इसमें कहा गया, ‘नंदीग्राम निर्वाचन क्षेत्र में, कथित तौर पर हटाए गए मतदाताओं में 95 प्रतिशत मुसलमान थे, जबकि उस निर्वाचन क्षेत्र के कुल मतदाताओं में मुसलमानों की हिस्सेदारी केवल 25 प्रतिशत है. प्रभावित लोगों में पुरुष, महिलाएं और बुजुर्ग भारतीय नागरिक शामिल हैं, जिनके पास वैध पहचान दस्तावेज हैं. उन्होंने चुनाव आयोग में शिकायत और भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायिक समीक्षा सहित घरेलू कानूनी उपायों का सहारा लिया, लेकिन 6 अप्रैल 2026 को शीर्ष अदालत ने इस प्रक्रिया पर रोक लगाने से इनकार कर दिया.’
विशेष दूतों ने यह सवाल भी उठाया कि मतदाताओं के नाम हटाने का आधार क्या था. उनके अनुसार, दस्तावेजों में नामों की वर्तनी में मामूली अंतर – जो भारत में ‘प्रशासनिक चुनौतियों’ के कारण आम बात है – को भी मतदाता सूची से नाम हटाने का आधार बनाया गया.
इसके अलावा, पत्र में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता आंकड़ों में ‘अनियमितताओं’ की पहचान के लिए एआई आधारित प्रणाली के उपयोग पर भी चिंता व्यक्त की और चेतावनी दी कि इससे पारदर्शिता, गलतियों और संभावित पक्षपात को लेकर चिंताएं पैदा होती हैं.
पत्र में केंद्र सरकार से कई सवाल पूछे गए हैं. इनमें यह जानकारी भी मांगी गई है कि सरकार ने यह सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए हैं कि एसआईआर प्रक्रिया की रूपरेखा और उसका क्रियान्वयन, जिसमें दावे और आपत्तियों की सुनवाई की व्यवस्था भी शामिल है – अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार कानून और मानकों के तहत भारत की जिम्मेदारियों के अनुरूप हो.
पत्र में आगे केंद्र सरकार से यह भी पूछा गया कि ऐसे कौन-से कदम उठाए गए हैं, जिनसे यह सुनिश्चित हो सके कि एसआईआर प्रक्रिया के कारण 2026 के सार्वजनिक चुनावों में कोई भी पात्र मतदाता मतदान के अधिकार से वंचित न हुआ हो.
विशेष दूतों ने हटाए गए मतदाताओं की सही संख्या, हर बार नाम हटाने के कारण और लिस्ट से बाहर किए गए लोगों के धर्म और जातीयता के आधार पर ब्योरे की मांग की.
पत्र में नई दिल्ली से यह भी स्पष्ट करने को कहा गया कि ‘दावे और आपत्तियों’ (Claims and Objections) की अवधि के दौरान कौन-से सुरक्षा उपाय लागू किए गए थे और पश्चिम बंगाल में दो चरणों में हुए विधानसभा चुनावों से पहले प्रभावित लोगों को प्रभावी कानूनी राहत उपलब्ध कराने के लिए क्या कदम उठाए गए.
पत्र में यह जानकारी भी मांगी गई कि मुसलमानों, बंगाली मूल के लोगों और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ मतदान के अधिकार और अपने प्रतिनिधियों को स्वतंत्र रूप से चुनने के अधिकार के संबंध में किसी भी प्रकार के भेदभावपूर्ण व्यवहार को समाप्त करने के लिए सरकार ने क्या उपाय किए थे.
इसके अलावा, विशेष दूतों ने यह भी पूछा कि जिन लोगों के नाम गलत तरीके से मतदाता सूची से हटा दिए गए और परिणामस्वरूप वे मतदान के अधिकार से वंचित हो गए, खासकर उन मामलों में जहां चुनाव संपन्न होने से पहले समय रहते कोई प्रभावी राहत उपलब्ध नहीं हो सकी, उन्हें न्याय दिलाने के लिए सरकार क्या कदम उठा रही है.
उन्होंने यह भी कहा कि यह पत्राचार और इस पर केंद्र सरकार की ओर से मिलने वाला कोई भी उत्तर, पत्र जारी होने की तारीख से 60 दिनों के भीतर संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक संचार रिपोर्टिंग वेबसाइट पर सार्वजनिक किया जाएगा. साथ ही, इसका उल्लेख भविष्य में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद को प्रस्तुत की जाने वाली रिपोर्टों में भी किया जा सकता है.
फिलहाल मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) का तीसरा चरण देश के 16 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में जारी है.
