गुजरात: 35 गांवों में 400 करोड़ रुपये का कथित घोटाला, आरोपी दो भाइयों में एक भाजपा पदाधिकारी

गुजरात के भावनगर के पास स्थित फरियादका गांव के दो चचेरे भाइयों ने लोगों को शेयर बाज़ार में निवेश पर 20% का पक्का रिटर्न देने का वादा कर कथित तौर पर कई सौ करोड़ का घोटाला किया है. इन दो में से एक को लेकर कहा जा रहा है कि वह पिछले दो सालों से भावनगर में सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के संगठन सचिव रहे हैं. 

(प्रतीकात्मक फोटो: Pexels/pexels license)

दो चचेरे भाई, एक गांव. और निवेश का एक ऐसा आकर्षक ऑफर, जिसके मोह में न पड़ना मुश्किल था. यह मामला गुजरात का है, जहां लोगों को शेयर बाज़ार में निवेश पर 20% का पक्का रिटर्न देने का वादा कर दो भाइयों ने कथित तौर पर कई सौ करोड़ का घोटाला किया है.

यह मामला हाल के समय में सौराष्ट्र के सबसे बड़े पोंज़ी घोटालों में से एक बताया जा रहा है. पीड़ितों का आरोप है कि उन्हें पक्के 20 प्रतिशत रिटर्न का लालच दिया गया था, जिसके चलते उन लोगों ने अपने पैसे लगाए. इसे कुल 300 से 400 करोड़ रुपये का घोटाला बताया जा रहा है और 30 से ज़्यादा गांवों के लगभग सौ लोगों ने सामने आकर कहा है कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है.

स्थानीय ख़बरों के अनुसार, शुरुआत में यह मामला इतना बड़ा नहीं था. इसकी शुरुआत भावनगर के पास स्थित फरियादका गांव से मिली कुछ शिकायतों से हुई, जहां छह लोगों ने आरोप लगाया कि योगेश धमेचा और संजय धमेचा नाम के दो भाइयों ने उनके साथ 93 लाख रुपये की धोखाधड़ी की है.

ये दोनों चचेरे भाई फरियादका गांव के ही निवासी हैं. इन पर आरोप है कि इन लोगों ने यह स्कीम सैकड़ों अन्य लोगों को भी बेची थी.

जांचकर्ताओं का कहना है कि वे इस काम को ज़्यादातर पोंज़ी स्कीम की तरह ही चलाते थे: यानी नए निवेशकों से मिले पैसे का इस्तेमाल पुराने निवेशकों को वादा किया गया रिटर्न देने में करते थे, जिससे भरोसा बना रहे और लोग दूसरों को इसके बारे में बताकर प्रचार चलता रहें. जब तक लोगों का भरोसा इस भाइयों से टूटा, वे करोड़ों रुपये इकट्ठा कर गायब हो चुके थे.

सात शिकायतों से बढ़कर मामला सौ तक पहुंचा

स्थानीय अपराध शाखा (एलसीबी) ने शुरू में इसे धोखाधड़ी की एक छोटी-सी शिकायत माना था- जिसमें सात निवेशकों के साथ 1 करोड़ रुपये से कुछ ज़्यादा की धोखाधड़ी हुई थी- लेकिन बाद में यह मामला काफ़ी बड़ा हो गया.

कुछ ही समय बाद आठ और पीड़ित सामने आए, जिससे धोखाधड़ी की कुल रकम 1.29 करोड़ रुपये तक पहुंच गई. लेकिन यह बस शुरुआत थी: जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, लगभग सौ पीड़ित क्राइम ब्रांच के पास पहुंचे. इनमें से कई लोगों का कहना था कि धोखाधड़ी का असली दायरा आधिकारिक तौर पर दर्ज आंकड़ों से कहीं ज़्यादा बड़ा है.

स्थानीय रिपोर्ट्स के अनुसार, एलसीबी के पुलिस सब-इंस्पेक्टर आरए वढेरा ने पुष्टि की कि दोनों चचेरे भाई अभी 13 जुलाई तक पुलिस रिमांड पर हैं और उनसे विस्तार से पूछताछ की जा रही है.

उन्होंने बताया कि जांच अधिकारी अब उन सभी लोगों के बयान दर्ज कर रहे हैं और दस्तावेज़ इकट्ठा कर रहे हैं, जिन्होंने निवेश करने और पैसे गंवाने का दावा किया है. इस प्रक्रिया का मुख्य मकसद यह पता लगाना है कि यह नेटवर्क असल में कितना बड़ा था.

आरोपी कौन हैं?

इस मामले की खास बात यह है कि इन दोनों आरोपियों का बैकग्राउंड बहुत आम है. 43 साल के संजय धमेचा ने 12वीं तक पढ़ाई कर आईटीआई से इलेक्ट्रीशियन की ट्रेनिंग ली है. उन्होंनेे ड्राइवर के तौर पर काम किया है. उनके परिवार का कहना है कि वे शादीशुदा हैं, उनका एक बेटा और एक बेटी है और उनके पिता रिटायर्ड स्कूल टीचर हैं. अब उनके घर पर सीसीटीवी कैमरे लग गए हैं.

उनके रिश्तेदारों का कहना है कि उन्हें ज़रा भी अंदाज़ा नहीं था कि वे कोई निवेश का बिज़नेस चला रहे थे- उन्हें लगता था कि उनका बार-बार बाहर जाना और मीटिंग करना किसी कम्युनिटी या ऑर्गनाइज़ेशन के काम से जुड़ा है.

योगेश, जिनकी उम्र लगभग 28-30 साल मानी जाती है, सिर्फ़ तीसरी क्लास तक पढ़े हैं. वह अपनी मां और तीन भाइयों के साथ रहते हैं; उनकी शादी हो चुकी है और उनके दो बच्चे हैं.

उनकी मां ने स्पष्ट बताया कि वह मज़दूरी करती हैं, सुबह जल्दी घर से निकलती हैं और शाम को लौटती हैं. उन्हें यह नहीं पता कि उनका बेटा गुज़ारा करने के लिए क्या करता है- सिवाय इसके कि वह ‘20%-20% वाला काम’ करता है. जांच करने वालों का मानना ​​है कि यह उन गारंटीड रिटर्न की ओर इशारा है जो उसने अपने निवेशकों से करने का वादा किया था.

उल्लेखनीय है कि इन दोनों भाइयों की साधारण, लगभग आम ज़िंदगी और अब उनके नाम से जुड़े बताए जा रहे सैकड़ों करोड़ रुपयों के बीच का अंतर – ऐसा है कि उनके अपने परिवार वाले भी इसे समझ नहीं पा रहे हैं.

कथित राजनीतिक कनेक्शन

इस मामले में जैसे-जैसे जांच का दायरा बढ़ा, सवाल भी बढ़ते गए – खासकर योगेश धमेचा की राजनीतिक पृष्ठभूमि को लेकर. ऐसा पता चला है कि वह पिछले दो सालों से भावनगर में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के संगठन सचिव रहे हैं.

एक स्थानीय सामाजिक कार्यकर्ता के अनुसार, वह करीब 15 सालों से पार्टी से जुड़े हुए हैं और संगठन के वरिष्ठ नेताओं तक उनकी पहुंच है.

जब सीधे तौर पर पूछा गया कि क्या योगेश भाजपा में किसी औपचारिक पद पर थे, तो पुलिस सब-इंस्पेक्टर वढेरा ने नपे-तुले शब्दों में जवाब देते हुए कहा कि अब तक की जांच में इस दावे की पुष्टि करने वाला कोई सत्यापित सबूत नहीं मिला है.

उन्होंने उन लोगों से आगे आने की अपील की जिन्हें लगता है कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है, ताकि वे दस्तावेज़ और सबूत पेश कर सकें और आरोपी के खिलाफ़ मामला मज़बूत किया जा सके.

‘मैंने भरोसे के साथ निवेश किया था. आज मेरे साथ धोखा हुआ है.’

यह फ़र्क उन लोगों के बीच भी साफ़ दिखता है जिन्होंने उन पर भरोसा किया था. इस कथित स्कीम से लोगों को जो नुकसान हुआ है, वह उन एजेंट्स की बातों से सबसे साफ पता चलता है जिन्होंने इन चचेरे भाइयों के लिए निवेशकों को लाने में मदद की थी.

ऐसे ही एक एजेंट रघुभाई वाघेला ने बताया कि अभी उनके ज़रिए 20-25 लोग निवेश कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि संजय और योगेश, दोनों ने उन्हें 20% रिटर्न की गारंटी दी थी और संजय ने इसके लिए स्टांप पेपर पर लिखकर भी दिया था.

रघुभाई ने बताया कि अकेले उनके अकाउंट से ही लगभग 56.7 लाख रुपये फंसे हुए हैं- यह पैसा ज़्यादातर उन छोटे और गरीब निवेशकों का है जिन्होंने उन पर भरोसा किया था. उन्होंने अपनी बचत भी गंवा दी: 7-8 लाख रुपये जो उन्होंने अपना घर पूरा बनाने के लिए अलग रखे थे.

उन्होंने कहा, ‘घर से अब भी पानी टपकता है, और जब मेरा पैसा डूब गया, तो मेरा यह भरोसा भी टूट गया कि घर कभी पूरा हो पाएगा.’

उनके अंदाज़े के मुताबिक, इस नेटवर्क में उनके जैसे 150 से ज़्यादा एजेंट काम कर रहे थे. इनमें से ज़्यादातर स्थानीय लोग थे जो संजय पर इसलिए भरोसा करते थे क्योंकि वह उन्हीं के बीच का एक व्यक्ति था.

अब रघुभाई का कहना है कि वह इसी स्थिति का इस्तेमाल निवेशकों का पैसा वापस दिलाने की लड़ाई में करेंगे. वह खुद को उन ‘छोटे, गरीब और शोषित’ लोगों की आवाज़ बताते हैं जिन्हें इस स्कीम में फंसाया गया था.

35 गांवों में फैला घोटाला

रघुभाई जैसे एजेंटों का कहना है कि इसी स्थानीय भरोसे की वजह से यह स्कीम इतनी दूर तक फैल पाई. फरियादका के एक सामाजिक कार्यकर्ता बलवंत बोरीचा, जिन्होंने बताया कि उन्होंने इस स्कीम के बारे में एक साल से ज़्यादा समय से अनौपचारिक रूप से सुना था, का अंदाज़ा है कि यह स्कीम लगभग ढाई साल तक चली. इसमें 30-35 गांवों के निवेशकों को शामिल किया गया और माना जाता है कि हज़ारों लोगों को नुकसान उठाना पड़ा.

उनके मुताबिक, यह घोटाला असल में 300-350 करोड़ रुपये का है, वहीं भावनगर, अवानिया, बुधेळ, सोडवदरा, सिडसर और वरतेज जैसे गांवों के पीड़ितों का कहना है कि यह आंकड़ा 400 करोड़ रुपये से ज़्यादा का है.

बोरीचा का यह बताना कि यह स्कीम व्यापक तौर पर फैली क्योंकि शुरुआती दिनों में संजय कथित तौर पर निवेशकों से व्यक्तिगत रूप से मिलते थे और अपनी बात को दोस्तों के बीच एक तरह के एहसान या मदद की तरह पेश करते थे- जैसे, ‘मैं अपना बिज़नेस ऐसे ही चलाता हूं, अगर आप चाहें तो निवेश करें.’

बोरीचा का कहना है कि इसी तरह के शांत, व्यक्तिगत भरोसे के साथ-साथ महंगाई का रोज़मर्रा का दबाव और थोड़ी अतिरिक्त कमाई की उम्मीद ने इतने सारे लोगों को इस ऑफर के प्रति आकर्षित किया.

उन्होंने जांचकर्ताओं से उन पांच से दस लोगों की भी बारीकी से जांच करने को कहा है जो कथित तौर पर हर समय संजय के साथ रहते थे और उनके खाते, यात्रा और रोज़मर्रा के लेन-देन का प्रबंधन करते थे- उनका तर्क है कि जब तक उनकी भूमिका की जांच नहीं की जाती, तब तक धोखाधड़ी की पूरी तस्वीर सामने नहीं आएगी.

इसके बाद क्या होगा?

गौरतलब है कि दोनों आरोपी अब पुलिस रिमांड में हैं और शिकायत करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है. ऐसे में क्राइम ब्रांच का सबसे पहला काम यह पता लगाना है कि यह नेटवर्क असल में कितना बड़ा था और निवेशकों का कितना पैसा सच में वापस पाया जा सकता है.

फिलहाल, यह मामला इस बात की एक बड़ी मिसाल है कि कैसे भरोसे- खासकर समुदायिक और आपसी जान-पहचान पर बने भरोसे का बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के लिए कितनी आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है.

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