गंगूबाई हंगल की आत्मकथा एक कलाकार स्त्री का वो जीवन है जिसका केंद्र सिर्फ संगीत है. यह आत्मकथा पढ़ते हुए गाइड उपन्यास की नायिका की याद बरबस ही आती है जिसके लिए उसकी नृत्यकला ही उसका संपूर्ण जीवन था, जीवन-उद्देश्य था. ध्यान से देखा जाए तो गंगूबाई के जीवन का भी केंद्र केवल संगीत ही रहा. उनके जीवन में घटती अन्य परिस्थितियां बस पृष्ठभूमि की तरह चलती रहती हैं.
यहां तक जीवन के संबंधों को भी उन्होंने घरेलूपन की नज़र नहीं बल्कि कला को समर्पित एक साधिका स्त्री की तरह देखा. घरेलू संबंधों के संसार में वे जितनी उदारता और निरपेक्षता बरतती रहीं, उस दौर के लिए दुर्लभ बात लगती है.
1913 में धारवाड़ में जन्मी गंगूबाई हंगल शास्त्रीय संगीत की प्रसिद्ध गायिका थीं. मूलतः कन्नड़ में प्रकाशित उनकी इस आत्मकथा को उन्होंने एमके कुलकर्णी से लिपिबद्ध करवाया था. आगे चलकर कन्नड़ से अंग्रेजी में उनकी आत्मकथा का अनुवाद ‘द सांग ऑफ माई लाइफ‘ नाम से जीएन हंगल ने किया. हाल ही में इस किताब का कवि-आलोचक मृत्युंजय द्वारा किया हुआ हिंदी अनुवाद जीवन संगीत नाम से आया है.
देखा जाए तो गंगूबाई हंगल की आत्मकथा का हिंदी में अनूदित होना एक उपलब्धि है क्योंकि भारतीय शास्त्रीय संगीत पर विशेषकर हिंदी में बेहद कम किताबें लिखी गई हैं.
आत्मकथा में संगीतज्ञ-गायिका गंगूबाई का जीवन मुखरित हुआ है. वह लिखती हैं कि संगीत में मेरी दिलचस्पी तब से थी जब मैं बहुत छोटी थी और स्कूल जाना शुरू ही किया था. उनकी मां कर्नाटक शैली की गायिका थीं. गंगूबाई बताती हैं कि बचपन में कैसे उनके घर किराने घराने के संस्थापक, महान गायक अब्दुल करीम खान साहब जब आए तो गंगूबाई ने उनके सामने गाना गाया था. ख़ान साहब ने बच्ची की तारीफ़ की और पीठ ठोकते हुए बोले ‘गला अच्छा है बेटी! तुम खूब खाना और खूब गाना!’ गंगूबाई के लिए यह आशीष फला.
उनकी मां चाहती थीं कि गंगूबाई हिंदुस्तानी संगीत की गायिका बने और किराना घराने से संगीत सीखें और वह वस्तुतः उस घराने की शोभा बनीं.
इस आत्मकथा में गंगूबाई जिस हसरत से अपने जीवन को याद करती हैं, ऐसा लगता है उसमें पीड़ा का अंश नहीं रहा होगा, लेकिन क्या ऐसा संभव हो सकता है कि एक स्त्री का जीवन पुरुष आधिपत्य के संसार में पीड़ा-रहित रह सकता है?
ध्यान से देखा जाए तो गंगूबाई को सामाजिक, आर्थिक, लैंगिक संघर्षों के साथ सांस्कृतिक संघर्ष भी झेलना पड़ा. न केवल वह एक स्त्री थीं, बल्कि वह अछूत समझे जाने वाले समुदाय से आती थीं. आर्थिक रूप से कमज़ोर पृष्ठभूमि के साथ-ही-साथ एक अन्य सांस्कृतिक दंश जो उनके जीवन में था, वह यह कि वह देवदासी परंपरा वाले परिवार से संबंध रखती थीं. एक ऐसी परंपरा जहां कन्या को किसी ब्राह्मण को दे दिया जाता था, जो विवाह जैसा होकर भी स्त्री को कोई सामाजिक वैधता नहीं दिलाता था, कारण कि लड़की चूंकि देवदासी परिवार से है तो वह उस ब्राह्मण पुरुष के घर नहीं जा सकती बल्कि ब्राह्मण पुरुष ही लड़की के घर आ सकता था. अत्यंत भेदभावपूर्ण और अपमानजनक इस व्यवस्था में रहकर भी गंगूबाई एक कलाकार भी बन सकीं और अपने पूरे परिवार को चलाने वाली धुरी भी.
यह आत्मकथा एक स्त्री के मन की उदारता और क्षमा भाव के लिए भी याद रखा जाना चाहिए क्योंकि ऐसा नहीं होगा कि इतने गैरबराबरी के ढांचे में गंगूबाई ने सामाजिक दंशों को नहीं झेला होगा. लेकिन उन्होंने पहले ही इस आत्मकथा में कह दिया कि वो सिर्फ अच्छी स्मृतियों का ही ज़िक्र कर रही हैं और ख़राब स्मृतियों को नहीं याद करना चाहतीं.
एक कलाकार की हैसियत से तो गंगूबाई के संगीत को सब सुनते हैं, सराहते हैं, लेकिन उनके निजी जीवन के संघर्षों को नहीं जानते हैं. यह आत्मकथा उसी अनकहे जीवन को कहती है.
गंगूबाई के जीवन में उनकी मां का जो योगदान है वो अविस्मरणीय है. उन्होंने अपनी कला, अपना जीवन सब अपनी बेटी के उज्ज्वल भविष्य पर कुर्बान कर दिया. गंगूबाई बताती हैं कि एक बार गुरु जी को फीस देने के लिए मां ने अपने कंगन बेच दिए और कंगन बेचने के बाद भी उसमें बीस रुपये कम पड़ गए. मां के कंगन बेचने की पीड़ा शायद गंगूबाई को जीवन भर सालती रही.
गंगूबाई कहती हैं कि मां ने मेरे गायन के लिए खुद का गाना एकदम छोड़ दिया महज इसलिए कि गंगूबाई पर उनकी गायिकी का असर न पड़ जाए. गंगूबाई इस आत्मकथा में बार-बार अपने गुरु सवाई गंधर्व और मां को याद कर रही होती हैं, ज़ाहिर-सी बात है दोनों उनके जीवन के आधार थे. यही नहीं गंगूबाई जिस तरह से अपने पति और पति के परिवार का सद्भाव और अपनापन याद करती हैं वो एक दुर्लभ बात की तरह है क्योंकि सामाजिक स्थिति तो इसके विपरीत थी. आत्मकथा पढ़ते हुए ये प्रतीत भी होता है कि उन्होंने जीवन की मुश्किलों को बस थोड़ा सा छुआ भर है, गहरे नही उतरतीं.
आत्मकथा में आए प्रसंगों से समझ सकते हैं कि गंगूबाई ने अपने जीवन की चुनौतियों को अपनी ताकत बनाया. जैसे गले के एक ऑपरेशन से उनकी आवाज भारी हो गई. लेकिन उन्होंने उसी के दम पर शास्त्रीय संगीत की बुलंदियों को छुआ. गंगूबाई की मां, जो स्वयं कन्नड़ संगीत में दीक्षित थीं, उन्होंने गंगूबाई के लिए जिस जीवन का स्वप्न देखा था वो कहीं-न-कहीं स्त्री मुक्ति के जीवन से जुड़ा था. कारण कि अगर गंगूबाई शास्त्रीय संगीत की इतनी बड़ी गायिका नहीं बनतीं तो संभवतः कहीं-न-कहीं देवदासी परंपरा के उत्पीड़ित जीवन में फंस जाती.
आत्मकथा में गंगूबाई की तमाम कोशिशों के बाद भी उनके जीवन के दंश आत्मकथा में लैंगिक और वर्गीय भेदभाव के संदर्भों में दिख ही जाते हैं. मसलन, आत्मकथा में अपने गुरु की उन्होंने महती प्रशंसा की है लेकिन उनका अपना निजी भेदभावपूर्ण नज़रिया भी दिखलाई पड़ ही जाता है. जैसे प्रसिद्ध गायक भीमसेन जोशी गंगूबाई के सहपाठी थे और वे गुरु के घर पर रह सकते थे, लेकिन गंगूबाई एक स्त्री होने के कारण तीस किलोमीटर रोज चलकर गुरु के घर शिक्षा के लिए जातीं थीं.
इसी तरह एक स्थान पर वह बतलातीं हैं कि कैसे महान गायक फिरोज दस्तूर को स्वयं गुरुजी उनके घर संगीत सिखाने जाते थे क्योंकि वे उस समय के बहुत धनी और प्रतिष्ठित परिवार से आते थे. आत्मकथा दिखलाती है कि कैसे कला के संसार में भी लैंगिक भूमिकाओं से संबंधित कई तरह के पूर्वाग्रह स्थापित थे जैसे हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत की ध्रुपद गायिकी के लिए कहा जाता है कि उसे महिलाएं नहीं गा सकती हैं क्योंकि उनकी आवाज में ख़रज नहीं होती और पर कैसे बाद के दिनों में महिलाओं ने इसे गाया और बेहतरीन निभाया भी.
आत्मकथा में लैंगिक भेदभाव की एक और परंपरा का ज़िक्र करते हुए गंगूबाई दुखी दिखती हैं, वह यह कि कैसे शास्त्रीय संगीत की दुनिया में पुरुष गायक को उस्ताद या पंडित कहा जाता है और महिला गायक को बेगम या बाई , जबकि दोनों एक ही कला के विद्वान होते हैं.
इस आत्मकथा को पढ़ते हुए जो एक ख़याल बार-बार जेहन में आता है वह यह कि एक स्त्री का जीवन-विशेषकर आर्थिक रूप से कमज़ोर तथा एक देवदासी-अछूत समुदाय से संबद्ध स्त्री का जीवन- क्या इतना सहज रहा होगा जितना कि गंगूबाई अपनी आत्मकथा में कहती हैं?
एक मर्दवादी समाज की गैरबराबरी और जातीय व सांस्कृतिक दंश को झेलते हुए जीवन पार करना और आत्मकथा में उसे बहुत कम कहना ये कहीं-न-कहीं गंगूबाई के जीवन को समग्रता से देखने की उनकी अपनी निजी दृष्टि हो सकती है, क्योंकि कला ही हमें जीवन के उज्ज्वल और उत्कृष्ट पक्षों को तमाम अंधेरों और विद्रूपताओं के धुंध में भी खोज निकालने की ताकत देती है.
(रूपम मिश्र कवयित्री हैं.)
