यूजीसी समानता नियमों के विरोध ने भेदभाव के बदलते स्वरूप को उघाड़ के रख दिया है

जो लोग यह तर्क देते हैं कि 'भारत में अब जातिवाद नहीं होता' या 'हमने कभी पिछड़ों के साथ भेदभाव नहीं किया', उनके लिए अफ्रीकन इतिहासकार चिनुआ अचेबे का यह मत याद रखना ज़रूरी है कि इतिहास को सिर्फ शिकारी की निगाह से न देखें, बल्कि उसे शिकार होने वाले की निगाह से भी देखें, तब असली सच्चाई समझ में आती है.

सुभाष बोस और छात्र राजनीति: जब विश्वविद्यालय असहमति के केंद्र थे, डिग्री की फैक्ट्री नहीं

जब विश्वविद्यालयों को राजनीति से मुक्त करने की मांग तेज़ है, तब सुभाष चंद्र बोस की विरासत एक असहज सवाल खड़ा करती है. बोस छात्रों को बदलाव का अग्रदूत मानते थे. यह लेख बताता है कि छात्र राजनीति का उनका पक्ष आज भी क्यों प्रासंगिक और ज़रूरी है.

मोदी-आरएसएस का विरोध ‘देश-विरोध’ नहीं, ज़िंदा लोकतंत्र के सांस लेने की आवाज़ है

आज जो कहानी गढ़ी जा रही है, वह एक ख़तरनाक भ्रम पर टिकी है. सत्ताधारी पार्टी भाजपा और उसके वैचारिक संरक्षक आरएसएस को 'राष्ट्र' के बराबर रखकर, मीडिया सरकार को आलोचना से बचाने की कोशिश कर रहा है. यह एक धोखा है. आरएसएस एक ग़ैर-सरकारी संगठन है, भाजपा राजनीतिक दल है. नरेंद्र मोदी संविधान के एक निर्वाचित सेवक हैं. इनमें से कोई भी 'देश' नहीं है.

विद्यार्थी परिषद को तीन, एनएसयूआई को एक पद: दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र संघ चुनाव क्या संकेत देते हैं?

दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ का चुनाव इस बार अलग था. उच्च न्यायालय द्वारा लगी रोक के बाद बैनर और पोस्टर नॉर्थ कैंपस से गायब थे. हर जगह बैरिकेड्स लगे थे. इस चुनाव में उम्मीदवारों की जाति और क्षेत्रगत मुद्दे भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे.