रतन थियाम ऐसे संस्कृतिकर्मी नहीं थे जो चुप रहकर कला में तल्लीन रहते. भीषण संकट और चुप्पी के इस दौर में भी वे सत्ता से सच कह सकते थे. जब मणिपुर जल रहा था, वे देश के सर्वोच्च पदों पर आसीन व्यक्तियों से चुभते हुए प्रश्न पूछ रहे थे.
हिंदी समाज हर शहर में एक नौजवान भी नहीं तैयार कर पा रहा है जो अपने शहर के रंगमंच से राब्ता रखकर उसका विश्लेषण या परिचय हिंदी के पाठक को उपलब्ध कराता रहे. शिक्षण संस्थान क्या कर रहे हैं? रंग समूह शैक्षणिक परिसर से जुड़ने के लिए क्या कोशिश कर रहे हैं? क्या हिंदी साहित्यकारों का अपने शहर के रंगमंच से कोई वास्ता है?