बर्बर होते जाने का युग, बर्बर छवियों को निहारते इसके निवासी

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दुनिया विश्वयुद्ध के ही नहीं, नैतिकता और मानवीय अंतःकरण के अधःपतन के कगार पर है. सभ्यता अब बर्बरता का दूसरा नाम भर है. जो सबसे धनाढ्य, विकसित, शक्ति-संपन्न, साधनमय हैं, वे सबसे अधिक बर्बर साबित हो रहे हैं.

येनपक कथा: कवि की कहानियां

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कवि कहानियां भी कहते-लिखते हैं. पहले वे कविता में ही कहानी कहते थे और महाकाव्य, खंडकाव्य उसी का प्रमाण हैं. कहानी के क्षेत्र में यह समांतर परंपरा है. अनामिका अनु के कहानी-संग्रह ‘येनपक कथा’ को इसी परंपरा की सार्थक बढ़त के रूप में देखा जा सकता है.

शहर संभावना भी है और नरक भी…

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: कभी शहर का उत्सव है तो कहीं उसमें घटती मानवीयता पर विलाप. कई बार प्रश्नांकन, कई बार सचाई का लाचार स्वीकार. तो कहीं छूट गए गांव-कस्बों की मार्मिक यादें. अकेले शहरों पर लिखी गई कविताएं मानवीय स्थिति के इतने पक्षों को समेटे हुए हैं.

अरबी में रची जा रही है संसार की सबसे मार्मिक और विचलित करती कविता

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: अगर अरबी कविता मृत्यु अर्थात् नश्‍वरता की अनिवार्य छाया में, उसके पड़ोस में लिखी गई जिजीविषा की कविता है तो, लगता है, हिंदी कविता अपनी अदम्य जिजीविषा में मृत्यु या नश्‍वरता को नज़रअंदाज़ करती कविता है.

खामोश, सिंदूर-काल जारी है!

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: वर्तमान समय में जैसे बहुत सारे नौजवानों को काम या नौकरी के बजाय दंगा-हुड़दंग, निरपराधों को दिनदहाड़े मारने-पीटने का काम मिला हुआ है सो सिंदूर को भी नया काम मिल गया: रगों में बहने का, लहू के बजाय.

हमारा पाकिस्तान का सैन्य और राजनयिक आकलन सही नहीं निकला

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: शांति का रास्ता बहुत कठिन है और होगा. हमारा पड़ोसी भी आसानी से उस पर चलने का मन नहीं बनाएगा क्योंकि वह सैन्य-संचालित देश है. पर रास्ता यही है जो हमें बर्बादी-तबाही से बचा सकता है.

युद्धविराम हमेशा मानवता के पक्ष में होता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: संसार में युद्धों का आकलन सिर्फ़ नैतिक या रणनीतिक लक्ष्यों से नहीं होता. पश्चिम के कई देश, ख़ासकर अमेरिका, चाहते हैं कि युद्ध होते रहें ताकि वे अपने हथियार लड़ते देशों को भारी संख्या में बेचते रह सकें.

जीवन, सचाई और साहित्य, कुल मिलाकर साधारणता का अनंत है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भटकने से कुछ और होता हो या न होता हो, जीवन-जगत् की अपार विशाल जटिल विपुलता का सामना, अनुभव और बोध होते हैं. यह अदम्य विपुलता साहित्य के लिए चुनौती होती है.

नृत्य कलाकार और दर्शक दोनों की कल्पना से आकार पाता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: नृत्य हमारे सामने की जगह पर नहीं अन्यत्र होता है- नृत्य का यह अनिवार्य अन्यत्र है. नृत्य हमें दूसरे काल में भी ले जाता है- वह काल हमारे एकरैखिक दिए हुए काल से अलग और दूर होता है.

दुबई में कला: बर्बादी झेलते हुए वही मनुष्य कुछ बचा सकता है, जो मृत्यु का कला से प्रतिरोध कर सके

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दुबई के जमील आर्ट सेंटर में विएतनाम और गाज़ा से आई कलाकृतियों की दो सुविचारित प्रदर्शनियां यह अहसास गहरा करती हैं कि असंभव लगती स्थिति में कला संभव है- जीवन नहीं बच पाता, पर कला बची रहती है. सिर्फ़ गवाही की तरह नहीं, बल्कि जिजीविषा की तरह भी.

नागरीप्रचारिणी के पुनरुदय से उम्मीद बंधती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी समाज, जो इस समय सुनियोजित विस्मृति की चपेट में है, में हिंदी साहित्य की परंपरा, स्मृति और उत्तराधिकार को बहुत जतन से सजीव-सजग-सक्रिय करने का काम नागरीप्रचारिणी सभा ने किया था. ऐसी संस्था का पुनर्जीवन एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और सांस्कृतिक घटना है.

ज्ञानपीठ सम्मान का अस्वीकार ऊँचा कर देता विनोद कुमार शुक्ल का कद

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विनोद कुमार शुक्ल पर आदिवासियों पर अत्याचार के प्रति उदासीन होने की आपत्ति हिंदी में उस लोकप्रिय प्रवृत्ति से उपजी है जो किसी रचना या लेखक को उसके भीतर जो है उसके आधार पर नहीं, जो नहीं है उसके आधार पर परखती है.

आलोचना फ़ैसला नहीं देती, लेकिन कविता के कैनन का निर्माण करती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आलोचक प्रथमतः और अंततः कविता का रसिक पाठक होता है और उसकी यह रसिकता आलोचना की काया में प्रगट होती है. बिना कविता का आस्वाद लिए, आलोचना नीरस होती है. उसका एक काम समय और समाज में कविता की जगह और समझ बनाना और बढ़ाना होता है.

विनोद कुमार शुक्ल: बड़बोले, बेसुरे नायकों से आक्रांत समय में अनायकता के गाथाकार

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विनोद कुमार शुक्ल रूमानी गांव या चमकते महानगर के नहीं, बल्कि मुख्यतः घर-परिवार के, हमारे लगभग नीरस और नीरंग पड़ोस के, छोटे कस्बाई शहर के कवि-कथाकार हैं.

पुरस्कार वापसी के एक दशक बाद देश में असहिष्णुता का क्या हाल है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: यह जानना दिलचस्प होगा कि एक दशक पहले जिन लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस किए थे, वे पुरस्कार वापसी के बाद उसी असहिष्णुता के लगातार भयावह विस्तार के दौरान क्या करते-बोलते-लिखते रहे हैं.

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