जीवन, सचाई और साहित्य, कुल मिलाकर साधारणता का अनंत है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: भटकने से कुछ और होता हो या न होता हो, जीवन-जगत् की अपार विशाल जटिल विपुलता का सामना, अनुभव और बोध होते हैं. यह अदम्य विपुलता साहित्य के लिए चुनौती होती है.

नृत्य कलाकार और दर्शक दोनों की कल्पना से आकार पाता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: नृत्य हमारे सामने की जगह पर नहीं अन्यत्र होता है- नृत्य का यह अनिवार्य अन्यत्र है. नृत्य हमें दूसरे काल में भी ले जाता है- वह काल हमारे एकरैखिक दिए हुए काल से अलग और दूर होता है.

दुबई में कला: बर्बादी झेलते हुए वही मनुष्य कुछ बचा सकता है, जो मृत्यु का कला से प्रतिरोध कर सके

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दुबई के जमील आर्ट सेंटर में विएतनाम और गाज़ा से आई कलाकृतियों की दो सुविचारित प्रदर्शनियां यह अहसास गहरा करती हैं कि असंभव लगती स्थिति में कला संभव है- जीवन नहीं बच पाता, पर कला बची रहती है. सिर्फ़ गवाही की तरह नहीं, बल्कि जिजीविषा की तरह भी.

नागरीप्रचारिणी के पुनरुदय से उम्मीद बंधती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी समाज, जो इस समय सुनियोजित विस्मृति की चपेट में है, में हिंदी साहित्य की परंपरा, स्मृति और उत्तराधिकार को बहुत जतन से सजीव-सजग-सक्रिय करने का काम नागरीप्रचारिणी सभा ने किया था. ऐसी संस्था का पुनर्जीवन एक महत्वपूर्ण साहित्यिक और सांस्कृतिक घटना है.

ज्ञानपीठ सम्मान का अस्वीकार ऊँचा कर देता विनोद कुमार शुक्ल का कद

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विनोद कुमार शुक्ल पर आदिवासियों पर अत्याचार के प्रति उदासीन होने की आपत्ति हिंदी में उस लोकप्रिय प्रवृत्ति से उपजी है जो किसी रचना या लेखक को उसके भीतर जो है उसके आधार पर नहीं, जो नहीं है उसके आधार पर परखती है.

आलोचना फ़ैसला नहीं देती, लेकिन कविता के कैनन का निर्माण करती है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आलोचक प्रथमतः और अंततः कविता का रसिक पाठक होता है और उसकी यह रसिकता आलोचना की काया में प्रगट होती है. बिना कविता का आस्वाद लिए, आलोचना नीरस होती है. उसका एक काम समय और समाज में कविता की जगह और समझ बनाना और बढ़ाना होता है.

विनोद कुमार शुक्ल: बड़बोले, बेसुरे नायकों से आक्रांत समय में अनायकता के गाथाकार

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: विनोद कुमार शुक्ल रूमानी गांव या चमकते महानगर के नहीं, बल्कि मुख्यतः घर-परिवार के, हमारे लगभग नीरस और नीरंग पड़ोस के, छोटे कस्बाई शहर के कवि-कथाकार हैं.

पुरस्कार वापसी के एक दशक बाद देश में असहिष्णुता का क्या हाल है?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: यह जानना दिलचस्प होगा कि एक दशक पहले जिन लेखकों ने अपने पुरस्कार वापस किए थे, वे पुरस्कार वापसी के बाद उसी असहिष्णुता के लगातार भयावह विस्तार के दौरान क्या करते-बोलते-लिखते रहे हैं.

साफ़बयानी की कविता आज कायरता के तिलिस्म को तोड़ रही है

कभी-कभार | आज-कल के माहौल में आम तौर पर ज़्यादातर लोग कुछ असहमति व्यक्त करने, आलोचना करने आदि से बचने लगे हैं. लेखकों और बुद्धिजीवियों तक को डर लगता है कि उनके कुछ कहने से उनके विरूद्ध कोई कार्रवाई न हो जाए. लोकतंत्र भयतंत्र में बदलता लग रहा है.

संगीत एकांत का विराग है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: मधु लिमये ने आपातकाल के दौरान जेल में कुमार गन्धर्व का संगीत सुनते हुए उन्हें पत्र में लिखा था कि उनका संगीत सुनकर लगता है कि वे संसार का रहस्य छू सा रहे हैं. संसार के बुनियादी रहस्य और उस पर होने वाले विस्मय को संगीत सहेजता है. एक ऐसे काल में जिसमें रहस्य और विस्मय दोनों ही अपदस्थ कर दिए गये हैं, संगीत उनका पुनर्वास करता है.

हिंदी लेखक अन्य कलाओं के रसास्वादन से क्यों बचता है

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: हिंदी ने कलाओं को अंगीकार कर अपना सर्जनात्मक और बौद्धिक परिवेश नहीं बनाया. जो थोड़ा-बहुत कलाओं की शुद्ध भौतिक उपस्थिति के कारण अनजाने-अनचाहे बन गया था, उसे भी अपनी जिज्ञासाहीनता और अरुचि, उपेक्षा के कारण गंवा दिया या नष्ट कर दिया.

मृत्युंजय कला: रज़ा के 103 बरस

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: आधुनिकता के बेहद बड़बोले समय में रज़ा शांति और मौन की तलाश के चित्रकार थे. जब बहुत सारी कला अपने समय का आख्यान चित्रित करने में व्यस्त थी, वे आत्मा की ज्यामिति की खोज में व्यस्त थे.

गुलाम मोहम्मद शेख़ की कृतियां और छुटभैयों की राजनीति के हवाले कला संस्थान

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: दिल्ली के एक संग्रहालय में कलाकार गुलाम मोहम्मद शेख़ की प्रदर्शनी के लिए राष्ट्रीय आधुनिक कला संग्रहालय, दिल्ली और भारत भवन, भोपाल ने उनकी कलाकृतियां नहीं दीं. इन दोनों ही ने रज़ा की शती पर कुछ भी करने से इनकार किया था.

आधुनिक मूर्ति कला के प्रतिष्ठित मूर्तिकार मदन लाल के हाथों मिट्टी ने अद्भुत रूप धरे हैं

कभी-कभार | मदन लाल देखने में कहीं से मूर्तिकार नहीं लगते जबकि उनका कला-जीवन चार दशकों से ज़्यादा का है. उन्हें उत्तर प्रदेश, गुजरात, योकोहोमा, कानागावा न्यूयार्क आदि से अनेक सम्मान मिल चुके हैं. उनकी कृतियां संसार के अनेक कला संस्थानों और संग्रहालयों में संग्रहीत हैं. इस सबके बावजूद उनका व्यवहार बेहद विनयशील, सौम्य, निश्छल है. आज की बेहद चिकनी-चुपड़ी दुनिया में वे बिरले हैं.

क्या लगातार हमलों और क्षति के बाद संवैधानिक राष्ट्र बच पाएगा?

कभी-कभार | अशोक वाजपेयी: इस क़दर लुच्चई-लफंगई-टुच्चई-दबंगई दृश्य पर छा गई हैं कि लगता है भद्रता और सिविल समाज जैसे ग़ायब या पूरी तरह से निष्क्रिय हो गए हैं.

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