पुस्तक समीक्षा: कमलानंद झा की किताब ‘विद्यापति: राजकाज और समाज’ मिथिला के उस सांस्कृतिक भूगोल में लौटने का आमंत्रण है जहां भाषा, सत्ता और कविता एक दूसरे से बात करती थीं. यह किताब उस कवि का पुनर्पाठ है जिसने राज्य को धर्म से नहीं, बल्कि लोक से जोड़ा.
छठ केवल पूजा का नहीं, बल्कि घर लौटने, पहचान हासिल करने और सवाल पूछने का पर्व है. शारदा सिन्हा सिर्फ सूरज की आराधना नहीं करती थीं, उनके गीत रेलगाड़ियों के डिब्बों में, आंगन की हवा में, रेडियो पर बजते थे. उनकी आवाज़ पीढ़ियों को जोड़ती थी. उंनका संगीत घर का मानचित्र बन जाता था.
भाषाएं कभी इतिहास से अलग नहीं होतीं. वे समाज की जटिलता, राजनीति की चाल और सत्ता के असंतुलन से गढ़ी जाती हैं. उर्दू को अक्सर मुस्लिमों की, विदेशी और अभिजात्य भाषा के रूप में देखा गया. हिंदी को राष्ट्रवाद और 'प्रामाणिक भारतीय’ पहचान से जोड़ा गया.
आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस भारत के युवाओं, किसानों और पेशेवरों के जीवन को गहराई से बदल रही है. क्या भारत तकनीक की इस क्रांति को अवसर में बदलेगा, या असमानता और बेरोज़गारी के नए दौर में फंस जाएगा?
पंडित छन्नूलाल मिश्र का निधन 2 अक्तूबर 2025 की सुबह मिर्ज़ापुर स्थित अपनी बेटी नम्रता के घर पर हुआ. वे 89 वर्ष के थे. हर महान गायक केवल सुरों को नहीं संजोता, बल्कि सुधार की पद्धति, ठहराव की संवेदना, और शब्दहीन संकेतों की परंपरा को भी रचता है.
सुशीला कार्की का कार्यकाल छोटा है, पर उनका असर स्थायी हो सकता है. अगर वे निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव करा पाती हैं, तो यह पूरे नेपाल की जीत होगी. क्या उनका कार्यकाल साबित कर पायेगा कि अधूरी क्रांतियों की इस लंबी यात्रा में उम्मीद की लौ अब भी जल रही है?
नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली का इस्तीफ़ा केवल एक राजनीतिक घटना नहीं है. यह दशकों से जमा हुई निराशा और अधूरी उम्मीदों का परिणाम है. नेपाल में वर्तमान हिंसा और अस्थिरता को समझने के लिए हमें पिछले कई दशकों की अधूरी क्रांतियों, संघर्षों और उनकी असफलताओं पर ध्यान देना होगा.
नेपाल में सोशल मीडिया बैन, बेरोज़गारी और भ्रष्टाचार के खिलाफ़ भड़के विरोध के बाद प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली को इस्तीफ़ा देना पड़ा है. राजधानी काठमांडू समेत कई शहर आग और हिंसा में डूबे हैं. प्रदर्शनकारियों ने नेताओं के घरों को निशाना बनाया है. यह असंतोष नेपाल की लोकतांत्रिक यात्रा की गहरी दरारों को उजागर करता है.
संकर्षण ठाकुर का जाना सिर्फ़ एक व्यक्ति का जाना नहीं, बल्कि उन शब्दों का मौन हो जाना है जो समाज की गंध और सच्चाई को पकड़ते थे. पटना की मिट्टी से निकले इस पत्रकार ने कश्मीर से बिहार तक कथाओं को दर्ज किया. उनका लेखन पत्रकारिता के लिए अमिट धरोहर है.
पुस्तक समीक्षा: आत्मकथाओं के भीतर निजी पीड़ा और सामूहिक इतिहास एकसाथ मौजूद रहते हैं. मदर मैरी कम्स टू मी उसी अनुक्रम का हिस्सा है. यहां मां-बेटी का रिश्ता केवल व्यक्तिगत स्मृति नहीं रह जाता; यह समाज का दर्पण बन जाता है, एक स्त्री के अकेलेपन और विद्रोह की मौन गवाही.
बैंगलोर परतों में लिपटा शहर है. क्यूबिकल और मंदिर, सड़क पर प्रदर्शन और कविता, यादें और सेल्स पिच-सब एक ही सांस में साथ चलते हैं. यहां भीड़ और एकांत एकदूसरे को जगह देते हैं.
भाषा केवल संवाद का साधन नहीं है; वह स्मृति, सांस्कृतिक पहचान और सामाजिक संरचना का वाहक भी होती है. ऐसे में जब भाषा सार्वजनिक नीति और राजनीति के केंद्र में आती है, तो वह केवल शैक्षिक या सांस्कृतिक विषय नहीं रह जाती-वह सत्ता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक संतुलन का प्रश्न बन जाती है.
भारत और नेपाल ने साथ तप किया, साथ सीखा और साथ आगे बढ़े. आज जब सीमाएं दीवारों में बदल रही हैं और राष्ट्रवाद रिश्तों की स्मृति को धुंधला कर रहा है, तब यह साझा संघर्ष हमें याद दिलाता है कि भारत और नेपाल दो राष्ट्र नहीं हैं. वे एक ही अधूरी कथा के दो पात्र हैं.
नागरी प्रचारिणी सभा के गलियारों में कभी आधुनिक हिंदी ने अपना उत्कर्ष देखा था. फिर कुछ ऐसा हुआ कि दशकों तक यह संस्था उपेक्षा और विस्मृति के अंधेरे में डूबी रही. कुछ बरस पहले इसकी बागडोर कवि-गद्यकार व्योमेश शुक्ल के पास आयी, और आरंभ हुआ एक नया अध्याय.
कृष्णमोहन झा की कविता हिंदी साहित्य की उस समृद्ध परंपरा की वाहक है, जहां कविता निजी अनुभवों की भूमि से उठकर सामाजिक चेतना की ज़मीन तक पहुंचती है. यह कविता एक पुल बनाती है, आत्मा और समाज के बीच, अतीत और वर्तमान के बीच, स्मृति और संभावना के बीच. यहां कविता केवल निजी नहीं रहती, साझेदारी में अभिव्यक्त होती है.